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  • https://www.aranyapurefood.com/blogs/news/mahua-tree-kalpvriksra-of-tribal-area
  • https://www.sourcedjourneys.com/post/the-tree-of-life
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मधुका लॉन्गीफोलिया अथवा इंडियन बटर ट्री जिसे सामान्य भाषा में महुआ कहते हैं सैपोटेसी परिवार का एक महत्वपूर्ण वृक्ष है । यह वृक्ष मध्य भारतीय राज्यों की जनजातीय आबादी के लिए सामाजिक तथा आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है । भारत में यह वृक्ष मुख्य रूप से पश्चिमी, मध्य तथा दक्षिणी भारत के अर्ध-पर्णपाती शुष्क वनों में पाया जाता है तथा इसका विस्तार मुख्यतः आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में है । यह एक बहुउद्देशीय वृक्ष है जिससे भोजन, ईंधन, लकड़ी, हरित खाद, तेल, खली, शराब प्राप्त होती है तथा यह अनेक उत्पादों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराता है।

 

वृक्ष विवरण

महुआ एक मध्यम से बड़े आकार का पर्णपाती एवं तीव्रता से बढ़ने वाला वृक्ष है जिसकी ऊँचाई 20-25 मीटर तक हो सकती है। इसकी लकड़ी कठोर से अति कठोर श्रेणी की होती है जिसमें सैपवुड की मात्रा अधिक होती है तथा हार्डवुड भूरे-लाल रंग की होती है । पत्तियाँ जो शाखाओं के सिरों के पास एकत्रित होती हैं, अण्डाकार या लंबाकार-अण्डाकार, चिकनी तथा रोमरहित होती हैं। युवा पत्तियाँ गुलाबी-लाल और निचली सतह पर रोमिल होती हैं। फूल सफेद-क्रीम रंग के तथा ट्यूबुलर मांसल और रसदार कोरोलायुक्त होते हैं तथा शाखाओं के अंत में गुच्छों में लगते हैं। फल अंडाकार बेर के आकार के होते हैं, परिपक्व होने पर हरे और पकने पर गुलाबी-पीले रंग के हो जाते हैं । फल बड़े अंडाकार बीज वाले व गूदेदार होते हैं, प्रत्येक फल में  बीजों की संख्या 1 से 4 तक हो सकती है। फल 20-30 के झुंड में लगते हैं। बीज हल्के भूरे से काले रंग के, 3-4 सेमी लंबे, अण्डाकार तथा एक तरफ चपटे होते हैं। फरवरी से अप्रैल के बीच में वृक्ष की अधिकांश पत्तियाँ झड़ जाती हैं तथा उसी समय वृक्ष में पुष्पन प्रारंभ होता है । पुष्प रात्रि में खिलते हैं तथा प्रातःकाल में भूमि पर गिर जाते हैं, जिन्हें व्यावसायिक उपयोग के लिए स्थानीय जनजातीय आबादी द्वारा एकत्र कर लिया जाता है। फल सामान्यतः मई-जून के महीने में परिपक्व होते हैं।

 

उपयोग एवं स्वदेशी तकनीकी ज्ञान

स्थानीय और जनजातीय लोगों द्वारा महुए के वृक्ष के प्रत्येक भाग को आर्थिक एवं औषधीय प्रयोजनों हेतु उपयोग में लाया जाता है। उनके द्वारा वृक्ष के विभिन्न हिस्सों को वन से संग्रहित करके एवं उनसे निर्मित उत्पादों को स्थानीय बाज़ार में बेचकर अपनी आजीविका अर्जित की जाती है। महुए के पुष्पों का आर्थिक मूल्य काफी अधिक होता है तथा आदिवासी महिलाओं द्वारा इन्हें प्रातःकाल में संग्रहित किया जाता है। ये शर्करा का एक समृद्ध स्रोत हैं और इसमें काफी मात्रा में विटामिन और कैल्शियम होते हैं।अधिकतर सूखे फूलों का उपयोग महुआ शराब के आसवन के लिए किया जाता है, जिसे स्थानीय रूप से “महुदी” कहा जाता है, जो कि आदिवासी क्षेत्र में एक बहुत ही आम मादक पेय है। महुआ के पुष्पों से शराब का उत्पादन सदियों से एक पारंपरिक प्रथा है। महुए के एक टन पुष्पों से लगभग 340 लीटर अल्कोहल प्राप्त होता है। महुए के बीजों से तेल भी प्राप्त किया जाता है। इस तेल का उपयोग त्वचा की देखभाल, साबुन और डिटर्जेंट के निर्माण और वनस्पति मक्खन के रूप में भी किया जाता है। तेल निकालने के बाद प्राप्त बीज की खली का उपयोग बहुत अच्छे उर्वरक के रूप में किया जाता है।

 

महुए के वृक्षों को इसके सामाजिक-आर्थिक महत्व के कारण खेतों और सीमांत भूमि पर बनाए रखा और संरक्षित किया जाता है। इसलिए, उष्णकटिबंधीय वनों में बड़ी आबादी के अलावा गाँवों, सड़क के किनारों पर और पंचायत भूमि पर बड़ी संख्या में इसके वृक्ष मौजूद होते हैं।

 

वृक्षों का प्रवर्धन

महुआ को बीज और वेजिटेटिव तरीकों से प्रवर्धित किया जा सकता है। परिपक्व फलों से गूदे को अलग करने तुरंत बाद बीजों के अंकुरण के लिए बोया जा सकता है। महुए के बीजों की भंडारण अवधि काफी कम लगभग बीस दिनों की होती है, उसके बाद इनकी अंकुरण क्षमता समाप्त हो जाती है । यदि ताजे बीजों को 15° सेल्सियस पर संग्रहित किया जाए तो अंकुरण क्षमता अधिकतम 30 दिनों तक रह सकती है।

 

वेजिटेटिव तरीकों से प्रवर्धन सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग, वेज ग्राफ्टिंग, विनियर ग्राफ्टिंग और एयर लेयरिंग का उपयोग करके किया जा सकता है।

 

संरक्षण

वन क्षेत्रों और संरक्षित वनों के आसपास रहने वाली आदिवासी आबादी के लिए इस वृक्ष प्रजाति का सामाजिक-आर्थिक महत्व बहुत अधिक होने के कारण, आजीविका सहायक प्रजाति के रूप में इसका महत्व बहुत अधिक है। देश के कुछ हिस्सों में इन वृक्षों को पवित्र भी माना जाता है, इसलिए इन्हें आदिवासी लोगों और राज्य वन विभागों द्वारा संरक्षित किया जाता है। हालाँकि, बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाओं, नगरीकरण और कृषि के लिए भूमि की मांग के कारण इस प्रजाति की कुछ आबादी या तो पूरी तरह से नष्ट हो गई है और या बड़े खतरे के मुहाने पर हैं।

 

मौजूदा आनुवंशिक विविधता की रक्षा के लिए वनों और सीमांत भूमि में महुए का यथास्थान (in situ) संरक्षण सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। वृक्षों के संरक्षण के बारे में जागरूकता और ऐसी गतिविधियों में आदिवासी किसानों की समान भागीदारी अपरिहार्य है क्योंकि उपज (फूल, छाल और फल) के संग्रह के लिए मुख्य शाखाओं को काटने से पूरे वृक्ष को नुकसान होता है ।

 

महुआ मूलतः एक वन्य फसल है जिसकी अब तक किसानों द्वारा कोई संगठित खेती नहीं की गई है। इसकी आर्थिक क्षमता के प्रति सीमित जागरूकता और वन या सीमांत भूमि का वृक्ष होने के कारण इस वृक्ष प्रजाति के आनुवंशिक संसाधनों पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। महुए की विशाल आनुवंशिक विविधता का संरक्षण के लिए in situ और ex situ दोनों रणनीतियों के उपयोग की आवश्यकता है । चूंकि इस वृक्ष के बीज अत्यधिक रिकैल्सित्रैन्ट तथा कम भंडारण अवधि वाले होते हैं अतएव ex situ  संरक्षण भ्रूणो॑ के क्रायोप्रिजर्वेशन का उपयोग करके किया जा सकता है।

 

 

अजय कुमार झा
वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)