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Business Responsibility and Sustainability Reporting (BRSR): a way to achieve Sustainable Development Goals

Transforming our world: the 2030 Agenda for Sustainable Development” comprising of 17 Sustainable Development Goals (SDGs) was adopted by 193 countries of the UN General Assembly at the Sustainable Development Summit in September 2015. SDGs include important elements like ‘no poverty”, ‘zero hunger’, ‘quality education’, ‘clean energy’ etc. India along with other countries signed the declaration on the 2030 Agenda and the NITI Ayog, the apex body of GOI in co-ordination with State Governments is making all out efforts to achieve the targets under the SDGs.

Given the diverse socio-economic scenario of India, holistic achievement of SDGs will require collective efforts and active participation of all business sectors in the country.  The step taken by SEBI for mandatory non-financial disclosure by listed company (ies) in BRSR format w.e.f. FY 2022-23 is a significant step for sustainable business practices. The BRSR format has been designed as per National Guidelines on Responsible Business Conduct (NGRBC-2019) which has nine principles (P1 to P9) aligning business module to incorporate all the 17 SDGs.  It is envisaged that such business modules aligned with SDGs will go a long way in transforming the economic development processes in India. The mandatory disclosure will enable companies to review and revisit their business process/practices in order to ensure compliance of Environmental, Social and Governance (ESG).  In view of this, company (ies) will have to work upon aligning their business module as per SDGs, management of data bank supported by policy(ies)/guidelines in order to achieve the best output of company as envisaged in BRSR framework. This will empower company to gain better acceptability among investors, stakeholders, local community etc.

Ref: web portal of SEBI and Ministry of Corporate Affairs

Manoj Kumar Singh

SM(Environment), Environment & Diversity Mamagement Division,

NHPC, Faridabad

Pic ref: https://learning.icai.org/committee/sr/business-responsibility-and-sustainability-reporting/

Category:  Environment


 |    January 27, 2023 |   1 comment

Floating Biomass of Loktak Lake (Phumdi)

Loktak Lake is not only the largest freshwater lake in northeast India but is also home to unique floating islands called “Phumdis”. These circular landmasses are made of vegetation, soil, and organic matter (at different stages of decomposition) that have been thickened into a solid form. Most of the mass of Phumdis lies below the water surface. The thickness of these floating islands varies from a few centimeters to around two meters. During the dry season, when water levels drop, the living roots of the Phumdis can reach the lake-bed and absorb nutrients. When the wet season returns, they again float, and the biomass, which has enough nutrients stored in the plants’ roots, survives.

 

The largest mass of Phumdis are in the southern part of Loktak lake and the area has been notified as Keibul Lamjao National Park.  Phumdis are habitat of over 83 species of plants. Mammals like the sangai, hog deer, common otter, jungle cat, bamboo rat, fox, Indian civets, musk shrew, flying fox, and others live in the phumdis in Keibul Lamjao National Park. A large number of reptiles including tortoises, common lizards, and poisonous snakes like krait, viper, cobra, and python also inhabit the park. Both migratory and resident bird species are also found in the park including Burmese sarus crane, spotbill duck, black kite, northern hill myna, and others. It is also the home to the endangered Manipur brow-antlered deer (Cervus eldi eldi), locally known as the Sangai. Brow-antlered deer is also the state animal of Manipur.

 

Loktak Lake and its countless phumdis support not just rich diversity of birds and aquatic life, but also thousands of fishermen, who have developed an entire way of life on these floating islands, navigating through them on narrow boats, easily turning landmasses into waterways whenever needed, to negotiate their way through them.

 

 D.A. Jaya Sheeli,

 Manager (Environment),

Environment & Diversity Management Division,

NHPC Corporate Office.

Reference (text & pic):

  • https://en.wikipedia.org/wiki/Phumdi,//www.outlookindia.com/outlooktraveller/,
  • //www.google.com/url?sa=i&url=https%3A%2F%2Fwww.researchgate.net%2Ffigure%2FSchematic-diagram-showing-the-anatomy-of-floating-phumdi-from-creating-habitat-
  • https://www.worldatlas.com/articles/what-is-a-phumdi.html
Category:  Environment


 |    January 27, 2023 |   0 comment

कृषि वानिकी (एग्रोफारेस्ट्री) – एक नवीन धारणा

सरल शब्दों में वनीय वृक्षों तथा फसलों की संयुक्त कृषि को कृषि वानिकी या एग्रोफारेस्ट्री कहते हैं । जबकि विस्तृत रूप में कृषिवानिकी एक प्रतिपालनीय भूमि प्रबंधन तंत्र है जो भूमि की उत्पादन शक्ति को बढ़ाता है एवं एक साथ अथवा क्रमिक रूप में फसलों (वृक्षीय फसलों सहित) तथा वन पौधों तथा/ अथवा जन्तुओं के उत्पादन को जोड़ता है । साथ ही साथ स्थानीय समुदाय द्वारा प्रयोग की जाने वाली कृषि रीतियों के अनुरूप प्रबंधन रीतियों को प्रवृत करता है ।

नम उष्ण क्षेत्रों में वृक्षों के रक्षण के अभाव में एक वर्षीय खाद्य फसलों का उत्पादन प्रायः कठिन होता है । इन क्षेत्रों की मृदा में पोषक तत्व शीघ्र रिसकर नीचे चले जाते हैं तथा इस क्षय को कृत्रिम रूप से पूरित करने का प्रयास किया जाता है, जबकि परंपरागत लघुस्तरीय तंत्रों के लिए यह निषेधार्थक है । वृक्षों के बिना सम्पूर्ण जैविक तथा भौतिक पर्यावरण शीघ्र विघटित हो जाता है । नम उष्ण क्षेत्रों की जंगली वनस्पतियों में वृक्षों का प्रमुख स्थान है तथा फसल उत्पादन अथवा पशुपालन अथवा दोनों के साथ वृक्ष उत्पादन के लिए समान भूमि का बहुप्रयोग, नम उष्ण मृदा की संरचना एवं उर्वरा शक्ति तथा जैविक एवं भौतिक पर्यावरण के अन्य घटकों के संरक्षण के लिए प्रयोग की जाने वाली कम-लागत की तकनीकी में सर्वश्रेष्ठ है । साथ ही उष्ण विकासशील देशों में जनसंख्या की वृद्धि के साथ भूमि एक सीमित संसाधन होती जा रही है तथा योजनाकर्ताओं का ध्यान अपेक्षाकृत कम महत्व के उत्पादन क्षेत्रों की ओर आकर्षित हो रहा है । कम महत्व की भूमि पर प्रतिकूल जैविक तथा भौतिक दशाओं में भी फसलों के साथ वृक्षों के उचित अन्तरारोपण से शुद्ध पारिस्थितिक लाभों के अतिरिक्त फसल उत्पादन तथा वृक्षों की खाद्य एवं अन्य वस्तुओं के उत्पादन की क्षमता में वृद्धि सर्वविदित है । नम उष्ण पर्यावरण के सम्पूर्ण दोहन में वृक्षों की संभावित भूमिका महत्वपूर्ण है ।

कृषि वानिकी के प्रकार

घटकों की प्रकृति के आधार पर भारत में कृषि वानिकी का विस्तृत विवरण निम्नांकित है-

1. एग्री-सिल्वीकल्चर : यह फसलों तथा वृक्षों को जोड़ता है ।
2. एग्री-हार्टीकल्चर : यह फसलों तथा फल प्रदान करने वाले वृक्षों को जोड़ता है ।
3. एग्री-सिल्वीपाश्चर : यह फसलों, वृक्षों तथा चारागाहों को जोड़ता है ।
4. एग्री-हार्टी-सिल्वीकल्चर : यह फसलों, फल प्रदान करने वाले वृक्षों तथा बहुउद्देश्यीय वृक्षों एवं झाड़ियों (एम.पी.टी.एस.) को जोड़ता है ।
5. सिल्वीपाश्चर : यह चारा प्रदान करने वाले वृक्षों तथा चारागाहों/ जन्तुओं को जोड़ता है ।
6. एग्री-हार्टी-पाश्चर : यह फसलों, फल प्रदान करने वाले वृक्षों तथा चारागाहों को जोड़ता है ।
7. हार्टी-पाश्चर : यह फल प्रदान करने वाले वृक्षों तथा चारागाहों को जोड़ता है ।
8. सिल्वी-हार्टीपाश्चर यह बहुउद्देशीय वृक्षों एवं झाड़ियों, फल प्रदान करने वाले वृक्षों तथा चारागाहों को जोड़ता है ।

भारत में कृषि वानिकी का महत्व

  1. भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों की शुष्क तथा अर्धशुष्क भूमि में गर्म वायु लाखों टन महत्वपूर्ण ऊपरी मृदा को उड़ा ले जाती है, जबकि प्रकृति द्वारा इस मृदा के निर्माण में शताब्दियाँ लग जाती हैं । यदि वृक्षों को रक्षक- पट्टी के रूप में रोपित किया जाता है तो वे वायु को अपनी ऊँचाई से बीस गुना अधिक दूरी तक विस्थापित कर देते हैं । रक्षक-पट्टियों से वायु की गति 20 से 46 प्रतिशत कम हो जाती है तथा ऐसा पाया गया है कि इनके द्वारा रक्षित भूमि पर अरहर, बाजरा तथा मूँगफली का उत्पादन अरक्षित फसलों की तुलना में अधिक होता है । राजस्थान तथा गुजरात के शुष्क क्षेत्रों में खेजरी (प्रोसोपिस सिनेरेरिया) को कुछ फसलों जैसे बाजरा, मूंग तथा मोठ के साथ उगाने के लिए सर्वोत्तम पाया गया है । कम वर्षा वाले क्षेत्रों में खेजरी के 10 वृक्ष, जबकि पर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्र में इसके 120 वृक्ष एक हेक्टेअर भूमि के लिए पर्याप्त होते है । इन क्षेत्रों में फसलों के साथ उगाने के लिए झाड़िया बेर (ज़िज़ाइफस न्यूमुलेरिया) भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है । अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में कृषिवानिकी के लिए बेर (ज़िज़ाइफस मॉरिशियाना) भी उपयोगी सिद्ध हुआ है । ऐसा देखा गया है कि बेर के वृक्षों की पट्टियों के बीच में रोपित सेम की फसल का उत्पादन 5 क्विंटल फली प्रति हेक्टेयर बढ़ जाता है । ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि खेजरी (प्रोसोपिस सिनेरेरिया) तथा इस्राइली बबूल (एकेशिया टॉर्टिलिस) के वृक्षों को 400 वृक्ष प्रति हेक्टेअर के घनत्व से रोपित करने से उनके मध्य एक उन्नत चारागाह विकसित करके ईंधन की लकड़ी प्राप्त की जा सकती है । चूंकि प्रूनिंग के पश्चात वृक्षों में पुनः वृद्धि हो जाती है, अतः एक वृक्ष को पूर्णतया काटने की तुलना में उसकी बारंबार प्रूनिंग करके अधिक मात्रा में लकड़ी प्राप्त की जा सकती है । पत्तियों का पशुओं के चारे तथा मल्श के रूप में प्रयोग किया जा सकता है । मल्श का मृदा की संरचना में सुधार, वाष्पीकरण में कमी, जल वहन क्षमता में वृद्धि तथा मृदा को जैविक कार्बन एवं पोषक तत्वों से परिपूर्ण करने में उपयोग होता है ।          कृषि वानिकी के लाभ इन क्षेत्रों के अतिरिक्त दूसरे क्षेत्रों में भी पाये गए हैं । सौराष्ट्र के अधिक वर्षा वाले काली मृदा के क्षेत्रों में सू-बबूल या विलायती बबूल (ल्यूसीना ल्यूकोसिफेला) की पट्टियों के मध्य उगाई गई मूँगफली, मूंग तथा उर्द की फसलें अधिक उत्पादन देती हैं ।
  1. राष्ट्रीय कृषि वानिकी अनुसंधान केंद्र, झांसी में किए गए अनुसन्धानों के अनुसार कृषि फसलें 12 बहुउद्देशीय वृक्षों (500 से 1250 वृक्ष प्रति हेक्टेअर) मुख्यतः रामकांटी (एकेशिया निलोटिका उपजाति क्यूप्रेसीफार्मिस) तथा कैजुएराइना इक्वीसेटीफोलिया के साथ सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है । ज्वार, मूँगफली तथा गेहूँ को बेर, अनार, नींबू की किन्नो उपजाति एवं अमरूद (100 से 400 वृक्ष पार्टी हेक्टअर) तथा बहुउद्देशीय नाइट्रोजन स्थरीकारक वृक्षों जैसे सू-बबूल (ल्यूसीना ल्यूकोसिफेला, 250 से 300 वृक्ष प्रति हेक्टेअर) के साथ उगाया जा सकता है । इसमें फसलों की उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है । आगरा में किए गए अध्यनों के अनुसार रोपण के पूर्व मृदा में सू-बबूल की पत्तियों के सम्मिलन से गेहूं की फसल में 15 से 23 प्रतिशत की वृद्धि होती है । अनुपजाऊ मृदा में उगाये गए गेहूं-लोबिया-गेहूं सस्यावर्तन की लगभग आधी नाइट्रोजन की आवश्यकताओं की पूर्ति सू-बबूल करता है । बंजर भूमि पर सेन्क्रस तथा स्टाइलोंजैंथिस की इस्राइली बबूल (एकेशिया टॉर्टिलिस, 300 वृक्ष प्रति हेक्टेयर) के साथ कृषि करने पर 3.0 से 3.5 टन प्रति हेक्टेअर प्रति वर्ष चारे का तथा वृक्ष घटक द्वारा 7 टन प्रति हेक्टेअर प्रति वर्ष लकड़ी का उत्पादन किया जा सकता है । लकड़ी तथा पशु चारा प्रदान करने वाले वृक्षों जैसे अंजन (हार्डविकिया बाइनेट) तथा सिरिस (एल्बिज़िया लिबेक) के साथ भी उन्नत चारागाह विकसित किए जा सकते हैं । विघटित बंजर भूमि के सुधार के लिए लकड़ी तथा चारा प्रदान करने वाले वृक्षों की उपयुक्त जातियों जैसे एकेशिया निलोटिका उपजाति क्यूप्रेसीफार्मिस, ल्यूसीना ल्यूकोसिफेला, डेन्ड्रोकैलेमस स्ट्रिक्टस, डाइक्रोस्टैकिस सिनेरिया, एल्बीज़िया एमारा, डेल्बरजिया सीसू आदि की संस्तुति की गई है ।
  1. सोलन में पाया गया है कि 5 x 5 मी. की दूरी पर रोपित पॉपलर (पापुलस एल्बा) वृक्षों के मध्य के स्थान में गेहूं सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है । पूर्वी हिमालय क्षेत्र में मक्का/ अदरख तथा सोयाबीन/ अदरख का यूटिस (एल्नस निपालेन्सिस) के साथ उगाना लाभप्रद है । सिक्किम में बांस के द्वारा छायित भूमि में अदरख तथा हल्दी की कृषि लाभप्रद है । देहरादून में कैम्फर (सिनेमोमम कैम्फोरा) तथा सागौन (टेक्टोना ग्रैंडिस) को सरसों के साथ 6-8 मीटर की दूरी पर सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है । करनाल क्षेत्र की ऊसर एवं क्षारीय भूमि के काबुली कीकर (प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा) के साथ करनाल-घास (डिपलैक्ने फस्का) उगाने में प्रभावी रूप से उपयोग किया गया है । अनुसंधानों से विदित हुआ है कि जयन्ती (सेस्बानिया सेस्बान) मृदा को पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन प्रदान करती है ।
  1. छोटा नागपुर तथा पश्चिम बंगाल के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में ऑस्ट्रेलियन बबूल (एकेशिया ऑरिकुलीफॉर्मिस) के साथ उगाने पर मक्के की फसल में 10.2 किलोग्राम प्रति हेक्टेअर की वृद्धि होती है । इसी प्रकार अमरूद + चंदन एवं अमरूद + शीशम भी अधिक उत्पादन देते हैं । उड़ीसा में लीची + पत्तागोभी तथा नींबू + पत्तागोभी के मध्य कुछ स्थानों पर जयन्ती तथा सू-बबूल उगाकर अधिक उत्पा व अन्य कार्यों में उपयोगी लकड़ी के लिए दन किया जा सका है ।

निष्कर्ष

लघुस्तरीय कृषि व्यवसायों में कृषि वानिकी की विस्तृत बहुउद्देशीय संसाधन प्रयोग धारणा का अनुप्रयोग किया जा सकता है, क्योंकि इनमें पहले से ही ईंधन की लकड़ी, पशुचारा, खाद्यफल, फलियाँ व पत्तियां, मृदा के स्थरीकरण व उर्वराशक्ति में सुधार एवं निर्माण व अन्य कार्यों में उपयोगी लकड़ी के लिए विविध फसलें उगाई जा रही हैं । विस्तृत रूप में विचार करने पर विदित होता है कि कृषि वानिकी की सहायता से कृषि उत्पादन में वृद्धि व विविधता लाई जा सकती है, पारिस्थितिकीय रूप में सार्थक कृषि-पारिस्थितिक तंत्रों को प्रेरित किया जा सकता है, तथा ग्रामीण व्यवसायों के लिए अवसरों में विविधता का समावेश किया जा सकता है । यद्यपि नम उष्णकटिबंधीय तथा शुष्क क्षेत्रों के अनेक भागों में इसकी उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है तथा देश के अन्य क्षेत्रों में भी इसके अच्छे परिणाम आने की संभावना है, किन्तु अपेक्षाकृत आदर्श एवं अस्थायी एकल संवर्धन को विस्थापित करके उसके स्थान पर इस प्रकार के विविध पारिस्थितिक तंत्र की स्थापना के लिए राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक संकल्पशक्ति एवं समर्पण, कृषि एवं वानिकी का पूर्णसंगठित राष्ट्रीय एवं प्रांतीय प्रशासन, वानिकी अधिकारियों के अनुसंधान व प्रशिक्षण में वृद्धि, कृषि व वानिकी सेवाओं में वृद्धि तथा लघुस्तरीय कृषकों में संकल्पशक्ति व अनुशासन के समावेश की आवश्यकता होगी ।

-द्वारा

डॉ. अजय कुमार झा

वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

तीस्ता-VI परियोजना, सिक्किम

Pic source: https://www.fs.usda.gov/ccrc/topics/agroforestry

Category:  Environment


 |    January 27, 2023 |   0 comment

अपने ध्वंस और पुनर्निर्माण के लिए इतिहास मे दर्ज है सुदर्शन बांध

सौराष्ट्र में गिरिनगर से निकलती सुवर्नरेखा (सुवर्णसुकता) नदी पर निर्मित सुदर्शन झील को भारत के आरम्भिक मानव-निर्मित झीलों में से एक माना जाता है, जिसके निर्माण-ध्वंस और पुनर्निर्माण की लोमहर्षक गाथा में लोककल्याण के लिये शासकों और तत्कालीन अभियंताओं का गहन संघर्ष परिलक्षित होता है। सुदर्शन झील का निर्माण चंद्रगुप्त मौर्य के शासन समय में उनके द्वारा नियुक्त सौराष्ट्र के  प्रान्तीय शासक पुष्यगुप्त ने कराया था। कालांतर में सम्राट अशोक के राज्यपाल तुशाष्प ने इस बांध तथा उससे जनित जलाशय में से सिंचन हेतु नहरें निकाली। अब चंद्रगुप्त मौर्य के समय का उल्लेख है तो महाविद्वान चाणक्य की चर्चा के बिना बात अधूरी रह जायेगी। यह सुख़द है कि चाणक्य ने अर्थशास्त्र में बांध के निर्माण, सिंचन व्यवस्था और कृषि पर बहुत विस्तार से लिखा है। उन्होंने अर्थशास्त्र में जल संग्रहण के लिए सेतु, नहर के लिए परिवह, जलाशय के लिए तातक, नदी जल के लिए नद्ययतना, नदी पर बनने वाले बांध के लिए नदिनीबंधयतन, इस बांध से निकली नहर के लिए निबंधयतन शब्दों का प्रयोग किया है। कौटिल्य ने लिखा है- आधारपरिवाहकेद्रोपभोग्या जिसका अर्थ है “जलागार की नहरों से सिंचित खेतों का उपयोग।” ये उदाहरण संक्षेप में इसलिये जिससे कि हम आश्वस्त हो सकें कि मौर्य शासन समय मे भी बांध निर्माण या कि नहर बना कर सिंचन करने के तरीकों की जानकारी थी।

 

मौर्यकाल मे निर्मित जिस सुदर्शन बांध के ध्वंस की हम बात करने जा रहे है यह घटना अतिवर्षा के कारण शक शासक रुद्रदामन के कालखण्ड मे हुई थी। रुद्रदामन के विषय में विस्तृत जानकारी उनके शक संवत 72 अर्थात वर्ष 150 ई. के जूनागढ अभिलेख से प्राप्त होती है। जूनागढ़ अभिलेख से ही हमें जानकारी मिलती है कि यह कोई साधारण तूफान नहीं था, वर्णन है कि जल से भरे मेघों ने सम्पूर्ण धरती को आच्छादित कर दिया। इतनी घनघोर वर्षा हुई कि सारी धरती ही मानो महासागर में परिवर्तित हो गई हो। इस समय उरजयत अथवा गिरनार पर्वत से निकलने वाली सुवर्नासिकता, प्लासीनी तथा अन्य स्थानीय नदियों में विकराल बाढ़ आ गयी। प्रलंयकारी तूफान जिसने पर्वतों को, वृक्षों को, कंगूरों को, किनारों को, दो मंजिलें भवनों को, प्रवेश द्वारों को, ऊंचाई पर बने प्रासादों को और सभी आश्रयों को ध्वस्त कर दिया, इससे लग रहा था मानो सृष्टि का अंत होने जा रहा है। शिलाएं, वृक्ष, झाड़ी और लताएं चारों ओर अस्त व्यस्त हो गई थीं, इस तूफान ने 420 क्यूबिट लम्बे और चौड़े तथा 75 क्यूबिट गहरे हिस्से को उखाड़ दिया, जिससे जलाशय का सम्पूर्ण जल बाहर आ गया और जब तूफान थमा तब झील बालूका राशि वाली मरूभूमि के सद्श्य दिखलाई पड़ने लगी। यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि यदि हम भारत में बांध निर्माण का इतिहास देखें तो हमें चोल राजा करिकाल का संदर्भ भी मिलता है तो मालवा के राजा भोज का भी तथापि किसी बांध के टूटने और उससे होने वाली तबाही का संदर्भ रुद्रदामन के कालखण्ड का ही प्राप्त होता है।

 

विनाश के आयाम इतने भयंकर थे कि रुद्रदामन के सलाहकारों और प्रधान अधिकारियों ने यह सोच लिया था कि अब सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण संभव नहीं है। रुद्रदामन इस विकट घड़ी में उठ खड़े हुए और उन्होंने जलाशय के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। पुनर्निर्माण कार्य अनर्ता और सुराष्ट्र के प्रान्तीय प्रशासक अमात्य सुविशाखा की देखरेख में शुरू हुआ। सुविशाखा का आज भी एक योग्य अधिकारी के रूप में दृष्टांत दिया जाता है। रुद्रदामन के आदेश पर निर्मित की जा रही झील की लम्बाई व चौड़ाई को, सभी ओर से, अत्यंत अल्प समय में, पहले से तीन गुणा अधिक मजबूत बनाया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि राज्य द्वारा इस बांध के  पुनर्निर्माण के लिए अपनी प्रजा पर किसी तरह का कोई कर नहीं थोपा गया था। अभिलेख स्पष्ट करता है कि महाक्षत्रप रुद्रदामन ने यह कार्य जनहित में एवं धर्म के पालनार्थ करवाया था। कौटिल्य का हमने उदाहरण लिया था जिन्होंने तटबंध के लिए सेतु शब्द का प्रयोग किया है। सेतु और सेतुबंधन शब्द कई संस्कृत ग्रंथों में भी मिलते हैं। रुद्रदमन के शिलालेख में इन शब्दों के अतिरिक्त जो दूसरे शब्द प्रयोग किए गए हैं वे हैं- नहर के लिए ‘प्रणाली’, कचरा बंधारा के लिए ‘परिवह’, झील से गाद की सफाई के लिए ‘मिधविधान’। इन सभी शब्दों की परिभाषायें हमें तत्कालीन बांध निर्माण के तरीकों से परिचित कराती हैं। सुदर्शन झील के निर्माण के लिये आरम्भ में तटबंधों को मिट्टी से बनाया गया जिनके दोनों तरफ पत्थर लगाए गए थे।

 

कहते हैं कि समय अपने आपको दोहराता है। अब समय था गुप्त शासक स्कंदगुप्त विक्रमादित्य स्कन्दगुप्त (455-467 ई.) का। एकबार पुन:, वर्ष 455 ई. में अर्त्याधिक वर्षा होने के कारण सुदर्शन झील के तटबंध नष्ट हो गये। यह समय था जब स्कंदगुप्त ने सिंहासन सम्भाला ही था। सम्राट स्कंदगुप्त ने सौराष्ट्र के प्रान्तकाल पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालिन को इस झील के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। चक्रपालिन की देखरेख में सुदर्शन झील के तटबंधों को सुधारा गया। कार्य के पूर्ण होने के बाद सम्राट ने पिता की स्मृति में झील के किनारे भव्य विष्णुमंदिर का निर्माण करवाया। अपने तटबंधों के नष्ट हो जाने के कारण सुदर्शन झील सम्भवत: आठवीं या नौंवी ई. में प्रयोग के लिये उपयुक्त नहीं रही थी तथापि इस जलाशय का जीवन लगभग एक हजार वर्षो का रहा है। यह विवरण हमें इतिहास ही नहीं प्राचीन पर्यावरण और अभियांत्रिकी जैसे संदर्भों से भी परिचित कराता है।

 

राजीव रंजन प्रसाद

उप महाप्रबंधक (पर्यावरण)

Category:  Environment


 |    January 27, 2023 |   0 comment

Pandas of the plant world

The IUCN web link on orchids describes orchids as a charismatic group of plants called the “pandas of the plant world“. The intriguing description traces its roots to Stephen Jay Gould’s essay “The Panda’s Thumb”, which is a popular scientific essay that takes cue from the lesser-known work of Charles Darwin “On the Various Contrivances by Which British and Foreign Orchids are Fertilized by Insects (1862)”. Gould quotes Darwin, “…continued self-fertilization is a poor strategy for long-term survival, since offspring carry only the genes of their single parent, and populations do not maintain enough variation for evolutionary flexibility in the face of environmental change. Thus, plants bearing flowers with both male and female parts usually evolve mechanisms to ensure cross-pollination. Orchids have formed an alliance with insects. They have evolved an astonishing variety of “contrivances” to attract insects, guarantee that sticky pollen adheres to their visitor, and ensure that the attached pollen comes in contact with female parts of the next orchid visited by the insect.”

Gould quotes Darwin’s interpretations of evolutionary adaptations in orchids to elaborate his observations and hypotheses about the adaptations in Giant Panda. The essay is an interesting treatise on the contrivances by which the Giant Panda’s sixth thumb is an evolutionary adaptation of its wrist bone for holding the bamboo shoots which it chews for ten to twelve hours each day.

 

Pandas have widespread popular appeal and are recognized all over the world as harmless, attractive animals. Ecologically, pandas who feed predominantly on bamboo shoots have always been threatened due to habitat loss. IUCN has taken many initiatives to conserve this beautiful and charming animal, and categorize as ENDANGERED in their red list categories (now vulnerable). Panda is also the conservation symbol of IUCN. In a similar way, orchids are a group of plants which attracted the imaginations of the colonizers even as they colonized several tropical regions. The vanilla orchid easily gained a prominent place in western cuisine, while several others became widely popular in interior decorations due to their lingering fragrance as well as long shelf life. They were transported from the tropics to the drawing rooms of Europe. A charismatic species among the plants, they require abundant rain and specific fungal associations to grow and thrive. Like the giant panda, orchids are also considered threatened due to habitat destruction, and presently all orchids are listed under CITES appendix.

 

In India, Arunachal Pradesh, Assam, Meghalaya, Mizoram & Sikkim have orchids as their state flower. Likewise, many countries including Brazil, Belize, Colombia, Costa Rica, Guatemela, Honduras, Panama, Singapore and Venezuela have orchids as their national flower.

 

Orchids are the second largest plant family. There are at least 25,000 species of orchids.  8% of all flowering plants are orchids. They are nearly cosmopolitan, but the majority of species are found in the tropics and subtropics, ranging from sea level to almost 5000 m in nearly all environments except open water and true desert. In some places they are dominant, particularly in nutrient-deficient habitats. Over half of the species are epiphytic (an organism that grows on the surface of a plant and derives its moisture and nutrients from the air, rain or from debris accumulating around it). Orchids’ life cycle is complex, often involving a fungal partner (mycorrhiza) at least for germination, and specific pollinators. Therefore, they offer much in the study of the interactions of plants, fungi and animals. Many are extremely sensitive to environmental changes, a subject of increasing concern at present. Phylogenic and evolutionary relationships have been studied intensively using DNA sequences and other data, leading to a much increased knowledge of the family. It is a family of considerable economic importance, particularly in horticulture and floristry, but also increasingly in the pharmaceutical and fragrance industries. Orchids are a major source of income in some countries.

Orchids have highly evolved flowers adapted to ensure cross pollination by insects. The floral structure of an orchid flower consists of highly modified mostly brightly coloured sepals, petals and highly modified stamens (male reproductive organ) and pistil (female reproductive organ). Such modifications create an amazing diversity in shape, size and colours of flowers. The plant body of orchids also exhibit a high degree of diversity.

 

The seeds of orchids are formed in pods and every single pod contains innumerable number of dust like microscopic seeds which are light in weight and devoid of food reserves. When the ripened pods bursts and opens, the seeds are dispersed by the wind. Out of the millions of seeds, only a few germinate. As the seeds are devoid of food reserves, they invariably need an associate to supplement the nutrition required for germination. Orchid seeds germinate with the help of specific fungal associations, the mycorrhizae providing nutrients required for germination. These fungi are mostly saprotrophic in nature. The types of orchids and their symbiotic fungi vary depending on the environmental niches they occupy, whether terrestrial or growing on other plants (epiphytes). The seedlings that germinate, grow and reach flowering stage in a period ranging from 3 to 8 years.

Orchids have different kinds of roots depending upon their habitat. Terrestrial orchids have fleshy roots with root hairs, which in some species form tuber-like structures that store food. Epiphytic orchids have two types of roots, clinging roots and aerial roots. Clinging roots help in attaching to the host plant while aerial roots which are fleshy with thick layer of greyish cells called ‘Velamen tissue’, helps absorb moisture from the air.

 

The morphologically diverse orchids exhibit various different shapes due to which they are known by various popular names. A few of them with particular shapes of flowers and leaves and matching popular names are depicted below:

 

Cylindrical Vanda

Species name: Papilionanthe teres

Desc: A giant orchid with cylindrical cactus-like fleshy leaves growing to a height of about 5m forming large bunches on tall trees. Handsome flowers measuring upto 10 cm across in a bunch of 2-6 flowers.

Location of picture: Orchidarium, Subansiri Lower HEP, NHPC Ltd., Gerukamukh

 

Moth orchid

Species name: Phalaenopsis

Desc: One of the most popular orchids amongst hobbyists and commercial growers due to the long lasting exquisitely beautiful flowers. The flowers are characterized by the lip with forked appendage at the base.

Location of picture: Orchidarium, Subansiri Lower HEP, NHPC Ltd., Gerukamukh

 

Aloe-leafed cymbidium

Species name: Cymbidium aloifolium

Desc: Orchids with stout pseudo bulbs and linear-oblong fleshy leaves measuring 30-40 cm long. The inflorescence is pendulous, long, bearing several flowers. Flowers are 4cm across in size.

Location of picture: Orchidarium, Subansiri Lower HEP, NHPC Ltd., Gerukamukh

 

Comb Trudelia

Species name: Vanda cristata

Desc: In nature, the stem has a twisted appearance. Inflorescence short, 1-2 flowered, sometimes more. Flowers about 4-5cm across, yellowish green, lip yellow with purple lines.

Location of picture: Orchidarium, Subansiri Lower HEP, NHPC Ltd., Gerukamukh

 

Sharry baby orchid (Ruby doll)

Species name: Oncidium

Desc: Plant consists of pseudobulbs growing tightly to each other, inflorescence straight, strongly branched,with a very large number of small flowers, red to dark red coloration, ranging in size from 2-4cm, have a very pleasant chocolate fragrance with varying degrees of intensity.

Location of picture: Orchid Research Centre, Tipi, Ar. Pradesh.

 

Dancing lady

Species name: Oncidium

Desc: Oncidium is a very large and diverse genus of orchids and are commonly found in florist arrangements. A hybrid, they were named “Dancing-lady orchids” for their dance-like fluttering in the wind.

Location of picture: Orchid Research Centre, Tipi, Arunachal Pradesh.

 

Pineapple orchid

Species name: Dendrobium densiflorum

Desc: An orchid which is easily identified by the densely packed clusters of yellow flowers hanging down, looking like pineapples. Flowers are 3.5-4 cm across, densely packed into large dense hanging clusters. When in bud, the clusters looks like cones.

Location of picture: State Orchid Nursery, Sessa, Arunachal Pradesh

 

Foxtail orchid (Kopou phool)

Species name: Rhynchostylis retusa

Desc: The state flower of Assam and Arunachal Pradesh, the Kopou phool are borne on densely flowered blooming racemes originating from the leaf axils. The fragrant flowers consist of white sepals and petals with pink blotches and a pink flower lip.

Location of picture: Orchidarium, Subansiri Lower HEP, NHPC Ltd., Gerukamukh

 

Fragrant Fox Brush orchid

Species name: Aerides odorata

Desc: A large to giant sized, epiphytic orchid, with very stout, drooping, branching stems. The flowers are highly fragrant and blooms on sharply pendant cylindric inflorescence that arise out of the leaf axils.

Location of picture: Orchidarium, Subansiri Lower HEP, NHPC Ltd., Gerukamukh

 

 Anitha Joy,

 Senior Manager (Environment),

Subansiri Lower Project.   

  

References:

  1. Hegde, Sadanand N. Orchids of Arunachal Pradesh. Forest Department Arunachal Pradesh, 1984, 2017 (Second Revised Edition).
  2. Gould, Stephen Jay. The panda’s thumb: More reflections in natural history. WW Norton & company, 2010.
  3. Darwin, Charles. The various contrivances by which orchids are fertilised by insects. John Murray, 1877.
  4. https://www.iucn.org/fr/node/24682
  5. https://stateoftheworldsplants.org/2017/report/SOTWP2017_1_naming_and_counting_the_worlds_plant_families.pdf
  6. http://nv-os.org/index.php/the-potting-bench/orchids-cared-for-by-nvos-members/item/504-oncidium-sharry-baby
  7. https://www.nparks.gov.sg/florafaunaweb/flora
  8. https://www.flowersofindia.net/
  9. https://en.wikipedia.org/

 

Photo courtesy: Anitha Joy, Abhijit Purushan, Subi K Joy, Hemam Dhanashyam Singh

Category:  Environment


 |    January 27, 2023 |   0 comment

अंक की तस्वीर

नववर्ष के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम

एनएचपीसी में सांस्कृतिक कार्यक्रम के माध्यम से नववर्ष 2023 हर्षोल्लास और सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का आयोजन ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ पहल के तहत किया गया था। इस अवसर पर श्री वाई.के. चौबे, निदेशक (तकनीकी/कार्मिक), एनएचपीसी;  मुख्य अतिथि थे। इस अवसर पर श्री आर.पी. गोयल, निदेशक (वित्त),  एनएचपीसी; सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी, कर्मचारियों और VC के माध्यम से परियोजनाओ/ पावर स्टेशनों मे स्थित एनएचपीसी के अन्य कार्मिक भी सम्मलित हुए। कार्यक्रम का विशेष आकर्षण कथक केंद्र, नई दिल्ली के कलाकारों द्वारा भव्य सांस्कृतिक प्रस्तुति हुई, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।

Category:  Environment


 |    January 27, 2023 |   0 comment

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