NHPC Blog

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में जंगल सफारी

[ Picture Source : विशाल शर्मा, समूह वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)]

 

 

काजीरंगा नेशनल पार्क, डिब्रूगढ़ से 235 km एवं गुवाहाटी से लगभग 220 km की दूरी पर है । जोरहाट रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी 90 km है। काजीरंगा नेशनल पार्क की यात्रा मैंने परिवार के साथ डिब्रुगढ़ से शुरू की। डिब्रूगढ़, रेल एवं वायु मार्ग द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों से जुड़ा हुआ है। डिब्रूगढ़ से काजीरंगा नेशनल पार्क टॅक्सी एवं बस से जाया जा सकता है। काजीरंगा नेशनल पार्क असम के गोलाघाट, नगाँव और शोणितपुर जिलों में स्थित है। डिब्रूगढ़ से सुबह 10 बजे निकलने पर हम 4 बजे तक काजीरंगा नेशनल पार्क के कोहोरा रेंज पहुँच चुके थे जहाँ एक रेस्ट हाउस में हमारे ठहरने की व्यवस्था थी। रेस्ट हाउस के माध्यम से हमने सुबह 6 से 7 बजे के लिए कोहोरा रेंज से एलिफ़ेंट सफारी के लिए बुकिंग की। उसी दिन के लिए हमने बागोरी रेंज से जीप सफारी के लिए 10 बजे से 12 बजे के लिए बुकिंग की ।

 

काजीरंगा का एक संरक्षित क्षेत्र के रूप में इतिहास वर्ष 1904 से प्रारंभ होता  है, जब मेरी कर्ज़न, जो तत्कालीन भारत के वायसराय लॉर्ड कर्ज़न की पत्नी थीं, ने क्षेत्र का दौरा किया। जिस वजह से काजीरंगा प्रसिद्ध था, वह एक सिंगल-हॉर्न गैंडा नहीं देख सकी, तब उन्होने अपने पति को नष्ट होते हुए प्रजातियों की सुरक्षा के लिए तत्काल उपाय करने के लिए प्रेरित किया, जिसके उपरांत लॉर्ड कर्ज़न ने सिंगल-हॉर्न राइनो की सुरक्षा के लिए योजना आरंभ की। 1 जून 1905 को, 232 वर्ग किमी (90 वर्ग मील) के क्षेत्र के साथ काजीरंगा प्रस्तावित अनुरक्षित वन क्षेत्र बनाया गया। वर्ष 1968 के असम नेशनल पार्क अधिनियम के प्रावधान के साथ वर्ष 1974 में इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया। वर्ष 1985 में काजीरंगा को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया। वर्तमान में काजीरंगा राष्ट्रीय वन उद्यान का क्षेत्रफल 919.49 वर्ग किलोमीटर है एवं काजीरंगा बाघ रिजर्व अभयारण्य का क्षेत्रफल 1307.49 वर्ग किलोमीटर है।

 

काजीरंगा राष्ट्रीय वन उद्यान उष्णकटिबंधीय जलवायु का अनुभव करता है; इसलिए वन्यजीवन दर्शन के लिए सबसे अच्छा समय नवंबर से अप्रैल के बीच होता है। मानसून के मौसम में यहाँ जाने से बचना चाहिए क्योंकि ब्रह्मपुत्र नदी का पानी वन को बाढ़ से भर देता है। यह पार्क दर्शकों के लिए 1 मई से 31 अक्टूबर तक बंद रहता है। यह एक संरक्षित क्षेत्र है जो प्राकृतिक सौंदर्य और वनस्पति-जीव विविधता से समृद्ध है। काजीरंगा नेशनल पार्क को चार पर्यटन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है जो मध्य ज़ोन या कोहोरा ज़ोन, पश्चिमी ज़ोन या बागोरी ज़ोन, पूर्वी ज़ोन या आगरटोली ज़ोन और बुरापहार ज़ोन हैं। जीप सफारी हर क्षेत्र में आयोजित की जाती है जबकि हाथी सफारी केवल मध्य ज़ोन और पश्चिमी ज़ोन में आयोजित की जाती है।

 

कोहोरा क्षेत्र वन विभाग के सौजन्य से लगभग 20 हाथियों पर पर्यटकों की सफारी एक साथ शुरू होती है जो वन उद्यान का विहंगम दृश्य दिखाती है। एलिफ़ेंट सफारी एक घंटे तक एवं जीप सफारी लगभग 2 घंटे तक होती है। वन उद्यान के भीतर के कच्चे रेतीले रास्तों, दलदली भूमि एवं घास के विस्तृत मैदानों मे अनेक जानवर विचरण करते हुए देखे जा सकते हैं।

 

काजीरंगा वन उद्यान 35 स्तनधारी प्राणी जातियों के लिए महत्वपूर्ण प्रजनन स्थान है, जिनमें से 15 को IUCN की रेड डाटा बुक के अनुसार संकट ग्रस्त प्रजाति (threatened species) में रखा गया है । पार्क की विशेषता है कि यह भारतीय गैंडे (संख्या 2613) जंगली भैंसे और ईस्टर्न स्वांप हिरण की दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या का प्राकृतिक आवास है। समय के साथ, काजीरंगा में बाघ की जनसंख्या भी बढ़ी है, और यही कारण है कि काजीरंगा को 2007 में टाइगर अभ्यारण्य के रूप में भी घोषित किया गया।

 

बड़े शाकाहारी जानवर जैसे भारतीय हाथी, गौर, सांभर इत्यादि यहाँ बहुतायत में निवास करते हैं । भारतीय गैंडा, रॉयल बंगाल टाइगर, एशियन हाथी, जंगली भैंसा और स्वांप हिरण को सामूहिक रूप से ‘काजीरंगा के बड़े पाँच जन्तु समूह के रूप में जाना जाता है। वन क्षेत्र में प्राकृतिक झीलों की संख्या भी बहुतायत में है जिनमें विभिन्न पक्षियों की 478 प्रजातियां पायी जाती हैं जिनमें से 25 प्रजाति संकट ग्रस्त श्रेणी की हैं ।

 

एलिफ़ेंट सफारी एवं जीप सफारी से विभिन्न जन्तु समूहों को उनके प्राकृतिक आवास क्षेत्र में विचरण करते हुए देखा जा सकता है । वैसे तो दोनों सफारी का अनुभव रोमांचकारी है अपितु एलिफ़ेंट सफारी का रोमांच विशेष रूप से अनुभव करने योग्य है ।

विशाल शर्मा
 समूह वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)
Category:  Environment


 |    May 15, 2024 |   44 comments

महुआ – भारत की जनजातीय आबादी के लिए वरदान

Picture Source :
  • https://www.aranyapurefood.com/blogs/news/mahua-tree-kalpvriksra-of-tribal-area
  • https://www.sourcedjourneys.com/post/the-tree-of-life
  • http://anyflip.com/zptxm/ambt

 

मधुका लॉन्गीफोलिया अथवा इंडियन बटर ट्री जिसे सामान्य भाषा में महुआ कहते हैं सैपोटेसी परिवार का एक महत्वपूर्ण वृक्ष है । यह वृक्ष मध्य भारतीय राज्यों की जनजातीय आबादी के लिए सामाजिक तथा आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है । भारत में यह वृक्ष मुख्य रूप से पश्चिमी, मध्य तथा दक्षिणी भारत के अर्ध-पर्णपाती शुष्क वनों में पाया जाता है तथा इसका विस्तार मुख्यतः आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में है । यह एक बहुउद्देशीय वृक्ष है जिससे भोजन, ईंधन, लकड़ी, हरित खाद, तेल, खली, शराब प्राप्त होती है तथा यह अनेक उत्पादों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराता है।

 

वृक्ष विवरण

महुआ एक मध्यम से बड़े आकार का पर्णपाती एवं तीव्रता से बढ़ने वाला वृक्ष है जिसकी ऊँचाई 20-25 मीटर तक हो सकती है। इसकी लकड़ी कठोर से अति कठोर श्रेणी की होती है जिसमें सैपवुड की मात्रा अधिक होती है तथा हार्डवुड भूरे-लाल रंग की होती है । पत्तियाँ जो शाखाओं के सिरों के पास एकत्रित होती हैं, अण्डाकार या लंबाकार-अण्डाकार, चिकनी तथा रोमरहित होती हैं। युवा पत्तियाँ गुलाबी-लाल और निचली सतह पर रोमिल होती हैं। फूल सफेद-क्रीम रंग के तथा ट्यूबुलर मांसल और रसदार कोरोलायुक्त होते हैं तथा शाखाओं के अंत में गुच्छों में लगते हैं। फल अंडाकार बेर के आकार के होते हैं, परिपक्व होने पर हरे और पकने पर गुलाबी-पीले रंग के हो जाते हैं । फल बड़े अंडाकार बीज वाले व गूदेदार होते हैं, प्रत्येक फल में  बीजों की संख्या 1 से 4 तक हो सकती है। फल 20-30 के झुंड में लगते हैं। बीज हल्के भूरे से काले रंग के, 3-4 सेमी लंबे, अण्डाकार तथा एक तरफ चपटे होते हैं। फरवरी से अप्रैल के बीच में वृक्ष की अधिकांश पत्तियाँ झड़ जाती हैं तथा उसी समय वृक्ष में पुष्पन प्रारंभ होता है । पुष्प रात्रि में खिलते हैं तथा प्रातःकाल में भूमि पर गिर जाते हैं, जिन्हें व्यावसायिक उपयोग के लिए स्थानीय जनजातीय आबादी द्वारा एकत्र कर लिया जाता है। फल सामान्यतः मई-जून के महीने में परिपक्व होते हैं।

 

उपयोग एवं स्वदेशी तकनीकी ज्ञान

स्थानीय और जनजातीय लोगों द्वारा महुए के वृक्ष के प्रत्येक भाग को आर्थिक एवं औषधीय प्रयोजनों हेतु उपयोग में लाया जाता है। उनके द्वारा वृक्ष के विभिन्न हिस्सों को वन से संग्रहित करके एवं उनसे निर्मित उत्पादों को स्थानीय बाज़ार में बेचकर अपनी आजीविका अर्जित की जाती है। महुए के पुष्पों का आर्थिक मूल्य काफी अधिक होता है तथा आदिवासी महिलाओं द्वारा इन्हें प्रातःकाल में संग्रहित किया जाता है। ये शर्करा का एक समृद्ध स्रोत हैं और इसमें काफी मात्रा में विटामिन और कैल्शियम होते हैं।अधिकतर सूखे फूलों का उपयोग महुआ शराब के आसवन के लिए किया जाता है, जिसे स्थानीय रूप से “महुदी” कहा जाता है, जो कि आदिवासी क्षेत्र में एक बहुत ही आम मादक पेय है। महुआ के पुष्पों से शराब का उत्पादन सदियों से एक पारंपरिक प्रथा है। महुए के एक टन पुष्पों से लगभग 340 लीटर अल्कोहल प्राप्त होता है। महुए के बीजों से तेल भी प्राप्त किया जाता है। इस तेल का उपयोग त्वचा की देखभाल, साबुन और डिटर्जेंट के निर्माण और वनस्पति मक्खन के रूप में भी किया जाता है। तेल निकालने के बाद प्राप्त बीज की खली का उपयोग बहुत अच्छे उर्वरक के रूप में किया जाता है।

 

महुए के वृक्षों को इसके सामाजिक-आर्थिक महत्व के कारण खेतों और सीमांत भूमि पर बनाए रखा और संरक्षित किया जाता है। इसलिए, उष्णकटिबंधीय वनों में बड़ी आबादी के अलावा गाँवों, सड़क के किनारों पर और पंचायत भूमि पर बड़ी संख्या में इसके वृक्ष मौजूद होते हैं।

 

वृक्षों का प्रवर्धन

महुआ को बीज और वेजिटेटिव तरीकों से प्रवर्धित किया जा सकता है। परिपक्व फलों से गूदे को अलग करने तुरंत बाद बीजों के अंकुरण के लिए बोया जा सकता है। महुए के बीजों की भंडारण अवधि काफी कम लगभग बीस दिनों की होती है, उसके बाद इनकी अंकुरण क्षमता समाप्त हो जाती है । यदि ताजे बीजों को 15° सेल्सियस पर संग्रहित किया जाए तो अंकुरण क्षमता अधिकतम 30 दिनों तक रह सकती है।

 

वेजिटेटिव तरीकों से प्रवर्धन सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग, वेज ग्राफ्टिंग, विनियर ग्राफ्टिंग और एयर लेयरिंग का उपयोग करके किया जा सकता है।

 

संरक्षण

वन क्षेत्रों और संरक्षित वनों के आसपास रहने वाली आदिवासी आबादी के लिए इस वृक्ष प्रजाति का सामाजिक-आर्थिक महत्व बहुत अधिक होने के कारण, आजीविका सहायक प्रजाति के रूप में इसका महत्व बहुत अधिक है। देश के कुछ हिस्सों में इन वृक्षों को पवित्र भी माना जाता है, इसलिए इन्हें आदिवासी लोगों और राज्य वन विभागों द्वारा संरक्षित किया जाता है। हालाँकि, बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाओं, नगरीकरण और कृषि के लिए भूमि की मांग के कारण इस प्रजाति की कुछ आबादी या तो पूरी तरह से नष्ट हो गई है और या बड़े खतरे के मुहाने पर हैं।

 

मौजूदा आनुवंशिक विविधता की रक्षा के लिए वनों और सीमांत भूमि में महुए का यथास्थान (in situ) संरक्षण सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। वृक्षों के संरक्षण के बारे में जागरूकता और ऐसी गतिविधियों में आदिवासी किसानों की समान भागीदारी अपरिहार्य है क्योंकि उपज (फूल, छाल और फल) के संग्रह के लिए मुख्य शाखाओं को काटने से पूरे वृक्ष को नुकसान होता है ।

 

महुआ मूलतः एक वन्य फसल है जिसकी अब तक किसानों द्वारा कोई संगठित खेती नहीं की गई है। इसकी आर्थिक क्षमता के प्रति सीमित जागरूकता और वन या सीमांत भूमि का वृक्ष होने के कारण इस वृक्ष प्रजाति के आनुवंशिक संसाधनों पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। महुए की विशाल आनुवंशिक विविधता का संरक्षण के लिए in situ और ex situ दोनों रणनीतियों के उपयोग की आवश्यकता है । चूंकि इस वृक्ष के बीज अत्यधिक रिकैल्सित्रैन्ट तथा कम भंडारण अवधि वाले होते हैं अतएव ex situ  संरक्षण भ्रूणो॑ के क्रायोप्रिजर्वेशन का उपयोग करके किया जा सकता है।

 

 

अजय कुमार झा
वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

 

Category:  Environment


 |    May 15, 2024 |   0 comment

रोडोडेंड्रोन नीवियम (Rhododendron niveum)- सिक्किम का राज्य वृक्ष

[ Picture Source : https://www.treesandshrubsonline.org/articles/rhododendron/rhododendron-niveum/ ]

 

  • स्थानीय नाम: ह्युनपाटे गुरांस
  • परिवार: एरिकेसी
  • कॉमन नाम: रोडोडेंड्रोन (इंग्लिश); बुरांस (कुमाऊनी); गुराँस (नेपाली)
  • पाया जाता है: 3000-3700 मीटर की ऊंचाई पर
  • IUCN स्थिति: गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered (CR))

 

रोडोडेंड्रोन नीवियम का स्थानीय नाम से ह्युनपाटे गुरांश है। मूल रूप से यह  केवल उत्तरी सिक्किम में लाचुंग के ऊपर शिंगबा रोडोडेंड्रोन अभयारण्य के आसपास पाया जाता था। यह सिक्किम की संस्कृति की खूबसूरती,  सुघड़ता और दृढ़ता का प्रतिनिधित्व करता है इस लिए इसे सिक्किम के ‘राज्य वृक्ष’ होने का का दर्जा  प्राप्त है।

 

रोडोडेंड्रोन नीवियम के विषय में:

रोडोडेंड्रोन नीवियम या Bell Snow Rhododendron एक छोटा पेड़ है जो 2-6 मीटर तक ऊँचा होता है। इसमें अनोखे धुएँ के रंग के नीले या बैंगनी- मॉव रंग के फूल होते हैं और पत्तियों के निचले हिस्सों में बर्फ के समान सफेद रंग होता है। नीवियम रोडोडेंड्रोन की प्रजाति का नाम लैटिन शब्द “निवेस” से लिया गया है जिसका अर्थ बर्फीला या बर्फ जैसा सफेद।  इस पौधे के फूल गोलाकार घने 15-20 के गुच्छे में लगते हैं, जिनके बीच में पीला मखमली रंग होता है। फूल अप्रैल-मई में आते हैं और फल जुलाई के माह मे । युवा अंकुर भूरे हरे, घने मखमली बालों वाले होते हैं। पत्ती के डंठल लंबे होते हैं, पत्तियाँ चमड़े सदृश्य होती हैं। पत्तियों का निचला भाग सघन, भूरा, सफेद, चमकीला, बाल वाला होता है ।खुली हुई पत्तियों की ऊपरी सतह पर सफेद फ्लोकोस बिखरा हुआ होता है। परिपक्वता पर पत्ती बाल रहित हो जाती है। रोडोडेंड्रोन नीवियम सिक्किम के लिए स्थानिक है और उत्तरी सिक्किम में याकची में एक माइक्रोनिच तक सीमित है।

 

उपयोग:

रोडोडेंड्रोन का स्थानीय लोग विभिन स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों के उपचार के लिए उपयोग करते हैं जैसे हृदय, पेचिश, दस्त, विषहरण, सूजन, बुखार, कब्ज, ब्रोंकाइटिस और अस्थमा । पत्तियों में प्रभावी एंटीऑक्सीडेंट होते हैं।

 

ख़तरा और संरक्षण:

चूंकि रोडोडेंड्रोन निवियम स्थानिक है और बहुत छोटे क्षेत्र में पाया जाता है, इसलिए यह गंभीर रूप से खतरे में है। अन्य वन रोडोडेंड्रोन की तरह इसका  आवास भी मुख्य रूप से विकासात्मक गतिविधियों के लिए वनों की कटाई और पर्यटकों के दबाव के कारण गंभीर रूप से खतरे में हैं। सिक्किम सरकार ने रोडोडेंड्रोन के संरक्षण के लिए काम शुरू किया है। सिक्किम में एक बायोस्फीयर रिजर्व, दो राष्ट्रीय उद्यान और छह वन्यजीव अभयारण्य हैं, जहाँ क्षेत्रीय रोडोडेंड्रोन की 36 प्रजातियों को संरक्षित किया जाता हैं। रोडोडेंड्रोन के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए शिंगबा रोडोडेंड्रोन और बर्सी रोडोडेंड्रोन अभयारण्यों को विशेष रूप से संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। हाल में, रोडोडेंड्रोन नीवियम के संरक्षण के प्रयासों मे सफलता प्राप्त हुई है और उसका सफल रूप से growth और propagation पूर्वी सिक्किम के  क्योंगनोसला अल्पाइन अभयारण्य में किया गया है (टेलीग्राफ, 24 अप्रैल, 2024)।

डा. अनुराधा बाजपेयी 
समूह वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

 

संदर्भ:

  • https://www.telegraphindia.com/west-bengal/sikkims-state-tree-gets-new-home/cid/1901259
  • https://www.flowersofindia.net/catalog/slides/Bell%20Snow%20Rhododendron.html
  • https://journals.tubitak.gov.tr/cgi/viewcontent.cgi?article=1944&context=botany
  • https://www.treesandshrubsonline.org/articles/rhododendron/rhododendron-niveum/
Category:  Environment


 |    May 15, 2024 |   0 comment

ईएसजी रिपोर्टिंग में डाटा प्रबंधन की भूमिका

[ Picture Source : https://community.nasscom.in/communities/ai/how-ai-can-help-esg-data-standardization-bfsi ]

 

पर्यावरणीय (Environmental), सामाजिक (Social) और गवर्नेंस (Governance) अर्थात  ‘ईएसजी रिपोर्टिंग’ एक मापदंड है जिसका उपयोग किसी कंपनी के व्यावसायिक कार्यप्रणाली की स्थिरता (Sustainability) को प्रभावी करने वाले मूल गैर-वित्तीय तत्वों के प्रदर्शन (परफॉर्मेंस) का मूल्यांकन करने के लिए किया जाता है। यह व्यावसायिक जोखिमों और अवसरों को मापने का तरीका भी प्रदान करता है। पूंजी बाजारों में कुछ निवेशक कंपनियों का मूल्यांकन करने और निवेश योजनाओं को निर्धारित करने के लिए ईएसजी रिपोर्ट का उपयोग करती हैं। ईएसजी रिपोर्ट में प्रदान किए गए विवरणों से निवेशकों को कंपनियों की पहचान करके निर्णय लेने में सक्षमता प्राप्त होती है। इस रिपोर्टिंग या प्रदत्त विवरणों से कंपनी को अपनी कार्य-प्रणाली में मौजूद अच्छाई व कमी का भी आकलन करने में सहजता होती है एवं मूल्यांकन के आधार पर यदि आवश्यकता हो तो समय रहते सुधार किया जा सकता है।

 

कंपनी की ‘ईएसजी (ESG) रिपोर्टिंग’ के लिए ‘ग्लोबल रेपोर्टिंग इनिसिएटिव (जीआरआई)’ स्टैंडर्ड एवं सेबी (SEBI) के निर्धारित फ़ारमैट में ‘ईएसजी (ESG) के प्रमुख कारक व संकेतक के बारे में वित्त-वर्ष के अनुसार वृहद डाटा की आवश्यकता होती है।  इस डाटा के विश्लेषण व विवेचना के अनुसार कंपनी की Sustainability Report एवं बीआरएसआर तैयार किया जाता है। इसे पब्लिक डोमेन में डाला जाता है तथा इसी डाटा के आधार पर कंपनी की ईएसजी रेटिंग निर्धारित की जाती है। साथ ही, इस रिपोर्ट का एश्योरेंस करना आवश्यक होता है। अत: इसके दृष्टिगत, कंपनी की ईएसजी रिपोर्टिंग’ के लिए डाटा-प्रबंधन करना अति महत्वपूर्ण है।  इससे समय के साथ ‘ईएसजी रेटिंग’ में भी सतत सुधार होगा एवं कंपनी की छवि वैश्विक पटल पर अच्छी होगी, जिससे निवेशकों को एनएचपीसी में निवेश करने के बारे में निर्णय लेने में रुचि होगी।

 

एनएचपीसी द्वारा डाटा प्रबंधन के लिए उचित कदम उठाए जा रहे हैं। सभी परियोजनाओं/पावर स्टेशनों को डाटा प्रबंधन की आवश्यकता के बारे में जागरूक किया गया है एवं इंट्रानेट पर ‘बीआरएसआर पोर्टल’ का प्रावधान किया गया है, जिसके माध्यम से सभी परियोजनाओं/पावर स्टेशनों द्वारा निगम मुख्यालय को रिपोर्ट तैयार करने हेतु डाटा जमा किया जाता है। इस दिशा में एनएचपीसी के सतत प्रयास एवं  ‘ईएसजी रिपोर्टिंग’ के आधार पर S&P Global द्वारा मार्च 2024 में एनएचपीसी ने ‘ईएसजी रेटिंग’ 48 प्राप्त की है जो पहले नवंबर,2022 में 17 थी।

 

मनोज कुमार सिंह,
समूह वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)
Category:  Environment


 |    May 15, 2024 |   0 comment

तीस्ता VI जलविद्युत परियोजना द्वारा पर्यावरण स्वच्छता के अंतर्गत फोगिंग कार्यक्रम का आयोजन

तीस्ता-VI जलविद्युत परियोजना द्वारा दिनांक 30.04.2024 को पीएम श्री राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय एवं राजकीय प्राथमिक विद्यालय, सिंगताम, जिला-गंगटोक, सिक्किम में मलेरिया एवं डेंगू जैसी बीमारियों एवं जहरीले कीटों से बचाव हेतु फोगिंग किया गया।

 

कार्यक्रम के अंतर्गत विद्यालय के सभी कक्षाओं एवं परिसर में फोगिंग किया गया। इस आयोजन के लिए विद्यालय के प्रधानाचार्य एवं शिक्षकों ने एनएचपीसी का आभार व्यक्त किया एवं इसकी प्रशंसा की। उन्होंने भविष्य में इस प्रकार के कार्यक्रम के आयोजन की आशा व्यक्त की।

Category:  Environment


 |    May 15, 2024 |   0 comment

अंक की तस्वीर ( अंक : 23 )

[ चित्र आभार : पूजा सुन्डी, प्रबंधक (पर्यावरण), निगम मुख्यालय ]

 

 

भारतीय हाथी : जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान, रामनगर, उत्तराखंड

 

  • स्थिति: संकटग्रस्त
  • जनसंख्या : 20,000 – 25,000
  • वैज्ञानिक नाम : एलीफस मैक्सिमस इंडिकस (Elephas maximus indicus)
  • ऊंचाई : 6-11 फीट (कंधे तक)
  • वज़न: 5 टन
  • लंबाई: 21 फीट तक
  • निवास: उपोष्णकटिबंधीय चौड़ी पत्ती वाले वन, उष्णकटिबंधीय चौड़ी पत्ती वाले नम वन, शुष्क वन, घास के मैदान (Subtropical broadleaf forest, tropical broadleaf moist forest, dry forest, grassland)

 

हाथी भारत के साथ-साथ पूरे एशिया में एक सांस्कृतिक प्रतीक है। ये समूह में रहना पसंद करते हैं तथा अपनी सामाजिक संवेदना एवं बुद्धिमता (intelligence) के कारण प्राणिजगत में इनका खास स्थान है। भारतीय हाथी का मुख्य भोजन घास होता है, लेकिन बड़ी मात्रा में ये पेड़ों की छाल, जड़ें, पत्तियां और छोटे तने भी खाते हैं। कृषि फसलें जैसे केले, धान, गन्ना आदि भी इनके पसंदीदा भोजन हैं। प्रतिदिन भोजन करते हुए एवं अपने आवास के एक बड़े क्षेत्र में घूमते हुए ये गोबर का उत्पादन करते हैं, इससे अंकुरित बीजों को फैलाने में मदद मिलती है। इस तरह ये अपने जंगल तथा घास के मैदानों के आवास की अखंडता को बनाए रखने तथा  पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) में संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन्हें दिन में कम से कम एक बार पानी पीने की ज़रूरत होती है अत: ये हमेशा ताजे पानी के स्रोत के करीब रहते हैं।

 

(संदर्भ : https://www.worldwildlife.org/species/indian-elephant)

 

 

Category:  Environment


 |    May 15, 2024 |   10 comments

अंक की तस्वीर (अंक : 22)

एनएचपीसी लिमिटेड की ओर से पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग तथा नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (एनआरएससी), हैदराबाद के मध्य “अंतरिक्ष चित्र आधारित ग्लोफ अध्ययन” के लिए अनुसंधान एवं विकास परियोजना के तहत दिनांक 20.03.2024 को एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए। इस अवसर पर एनएचपीसी ओर से श्री रजत गुप्ता, कार्यपालक निदेशक (पर्यावरण व विविधता प्रबंधन), डॉ. अविनाश कुमार , महाप्रबंधक (पर्यावरण), श्री राजीव रंजन प्रसाद, उप- महाप्रबंधक (पर्यावरण) तथा श्री अमित भदुला, प्रबंधक (पर्यावरण) उपस्थित थे। एनआरएससी की ओर से डॉ. प्रकाश चौहान, निदेशक, डॉ. के श्री निवास, उप निदेशक, डॉ. पी वी राजू, समूह निदेशक (जल संसाधन), डॉ. एम सिम्हाद्री, वैज्ञानिक-जी, श्री अब्दुल हकीम, वैज्ञानिक-जी, श्री के चंद्रशेखर, वैज्ञानिक-जी तथा श्री सक्षम जोशी, वैज्ञानिक-डी उपस्थित थे।

Category:  Environment


 |    April 5, 2024 |   0 comment

ESG Rating of NHPC

NHPC Limited had actively participated in S&P Global Corporate Sustainability Assessment (CSA) Survey (Dow Jones Sustainability World index) for the methodology year 2023. The CSA survey Form was submitted at the web portal of S&P Global in January 2024 for ESG rating of NHPC. Based on CSA analysis, NHPC has achieved S&P Global ESG Score of 48 (March, 2024). ESG Score is available on the website of S&P Global (https://www.spglobal.com/esg/solutions/data-intelligenceesg-scores).

 

Earlier, S&P Global had provided ESG Score of 17 to NHPC (November, 2022) based on publically available information. Enhanced ESG score of NHPC will improve the brand image, open access to new investors and improve transparency & operational efficiency.It is also to inform that the 1st Sustainability Report for FY 2021-22 of NHPC is available on the website of NHPC under the Tab: Sustainability. The preparation of Sustainability Report for FY 2022-23 is under progress in EDM Division.

Category:  Environment


 |    April 5, 2024 |   0 comment

अंक की तस्वीर (अंक : 21)

 मालागिर / नारंगी कस्तुरा

मालागिर / नारंगी कस्तुरा (Geokichla citrina) ) थ्रश परिवार का एक पक्षी है।यह सामान्यता भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया के घने जंगली इलाकों में पाया जाता है। यह प्रजाति छायादार नम क्षेत्रों को प्राथमिकता देती है ।यह पक्षी सर्वाहारी होता है जो  कई प्रकार के कीड़े, केंचुए और फल खाता है। यह पेड़ों पर घोंसला बनाता है लेकिन झुंड नहीं बनाता। इसके नर का ऊपरी हिस्सा एक समान भूरे रंग का होता है और सिर और नीचे का हिस्सा नारंगी रंग का होता है। मादा और युवा पक्षियों का ऊपरी भाग भूरा होता है। यह तस्वीर तीस्ता V पावर स्टेशन परिसर में खींची गई है ।

 

अजय कुमार झा 

वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

निगम मुख्यालय

 

 

Category:  Environment


 |    September 22, 2023 |   2 comments

मिथुन – अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड का राजकीय पशु

Picture source= https://www.researchgate.net/figure/A-female-Mithun-Bos-frontalis-in-her-natural-habitat_fig2_345850491

 

 

गेयल (बोस फ्रंटलिस – Bos frontalis) जिसे मिथुन या ड्रंग ऑक्स के नाम से भी जाना जाता है, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश का राज्य पशु है। यह बोविडी परिवार से संबंधित एक लुप्तप्राय जुगाली करने वाली प्रजाति (ruminant species) है, जो पूर्वी हिमालय में पाया जाता है। इसे ‘हाईलैंड्स का जहाज’ और ‘पहाड़ों के मवेशी’ के रूप में भी जाना जाता है। असमिया में, मिथुन को ‘मेथन’ कहा जाता है, इसे अरुणाचल प्रदेश में ‘एसो’ या ‘होहो’ या ‘सेबे’ कहा जाता है, मिज़ोरम में इसे ‘सियाल’ कहते हैं ।यह मणिपुर में ‘सैंडंग’ या ‘वी’ तथा मणिपुर की नागा जनजातियों के बीच ‘सीज़ंग’ के नाम से प्रचलित है। मिथुन पालन एक महत्वपूर्ण परंपरा है जो उत्तर-पूर्व भारत में स्थायी आजीविका से जुड़ी हुई है।

 

मिथुन की उत्पत्ति

ऐसा माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति 8000 साल से भी पहले हुई है। मिथुन को नागा जनजातियों के ‘Ceremonial Ox’ के रूप में वर्णित किया गया है और भारत-म्यांमार सीमा को मिथुन की उत्पत्ति का स्थान बताया गया है। इसकी उत्पत्ति जंगली गौर (बॉस गौरस) या भारतीय बाइसन के प्रत्यक्ष पालतू जानवरों से भी मानी जाती है।

 

भारत में मिथुन की संख्या

पशुधन गणना, 2019 के अनुसार, मिथुन की संख्या ने पूर्ववर्ती गणना (2012) की तुलना में 26.66% की वृद्धि दर्ज की है और देश में कुल मिथुन संख्या लगभग 3.8 लाख है। अरुणाचल प्रदेश में सबसे अधिक मिथुन आबादी (लगभग 3.5 लाख) है, इसके बाद नागालैंड (लगभग 23 हजार), मणिपुर (लगभग 0.9 हजार) और मिजोरम (लगभग 4 हजार) है।

 

विशेषताएं

मिथुन की विशेषता इसका बड़ा सिर, भारी शरीर के साथ मजबूत पैर है। माथा आमतौर पर चौड़ा और अवतल होता है। मिथुन विभिन्न रंगों में पाया जाता है लेकिन काला सबसे प्रचुर रंग है। मिथुन के नवजात बछड़े, सुनहरे पीले और भूरे रंग के होते हैं, हालांकि, जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वे गहरे काले से गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं। मिथुन में कूबड़ अनुपस्थित होता है और साथ ही, घरेलू मवेशियों की तुलना में इसकी पूंछ और पैर छोटे होते हैं। इसके कान चौड़े एवं ओसलेप बड़े आकार के होते हैं। 4-5 साल की उम्र के वयस्क मिथुन के शरीर का औसत वजन आमतौर पर 400-500 किलोग्राम होता है। भारत में मिथुन का अधिकतम जीवन काल लगभग 15 वर्ष दर्ज किया गया है। मिथुन ठंडी जलवायु पसंद करता है तथा एक शाकाहारी जानवर है जो घास, झाड़ियां एवं जंगली पत्ते खाता है। उत्तर पूर्व भारत के किसान पहाड़ी, झाड़ीदार जंगलों में समुद्र तल से 1000 से 3000 मीटर की ऊँचाई पर मिथुन का पालन करते हैं।

 

मिथुन का सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व

मिथुन का संबंध आदिवासी संस्कृति से है और कुछ प्राचीन लोककथाओं में मिथुन को सूर्य का वंशज माना गया है। यह स्थानीय जनजातीय आबादी के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अरुणाचल प्रदेश के पारंपरिक लोग, इदु मिश्मी तथा आदि लोग मिथुन को पवित्र मानते हैं। उनके लिए मिथुन का मालिक होना परिवार की संपत्ति, समृद्धि और समाज में श्रेष्ठता का प्रतीक माना जाता है। वे न तो मिथुन का दूध पीते हैं और न ही उससे कोई काम करवाते हैं, बल्कि वे मिथुन की देखभाल करते हैं और उसे अपने बच्चे की तरह मानते हैं। वे मिथुन को तब तक जंगल में चरने देते है जब तक कि वे अनुष्ठान या स्थानीय उपभोग के लिए उनका प्रयोग नहीं करते। एक वयस्क मिथुन की औसत कीमत ₹ 60,000-80,000 से लेकर ₹ 1,000,000 रुपए तक होती है। यह परिवार के लिए विवाह फिक्सर भी हैं! दूल्हे के परिवार को शादी तय करने के लिए दुल्हन के परिवार को कम से कम एक मिथुन देना होता है। इसे दुल्हन की कीमत और मुआवजे के रूप में दिया जाता है। इनका मांस विवाह समारोहों, सामुदायिक दावत और अन्य महत्वपूर्ण समारोहों में बहुत ही लोकप्रिय होता है। इस धरती पर मिथुन के जन्म और आगमन के अनुरूप अरुणाचल प्रदेश की आदि जनजातियों द्वारा प्रतिवर्ष ‘सोलुंग’ उत्सव मनाया जाता है। ऐसे त्योहारों के दौरान जानवर की बलि दी जाती है और उनका मांस खाया जाता है।

 

वर्तमान स्थिति

शिकार और आवास परिवर्तन के कारण इनकी आबादी में गिरावट आ रही है। यह प्रजाति घरेलू पशुओं की बीमारियों जैसे खुर और मुंह की बीमारी एवं रिंडरपेस्ट के लिए भी अतिसंवेदनशील है। यह रोग घरेलू मवेशियों द्वारा फैलते हैं जिन्हें चरने के लिए इनके आवास में ले जाया जाता है। जंगल में प्रजातियों का संरक्षण इसके अस्तित्व और आनुवंशिक विविधता के लिए आवश्यक है।

 

 

– डा. अनुराधा बाजपेयी
समूह वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)
पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग

संदर्भ:
• http://epao.net/epSubPageExtractor.asp?src=education.Jobs_Career.Status_and_prospects_of_Mithun_farming_in_NE_India_By_ICAR_Dimapur
• https://byjus.com/currentaffairs/mithun/#:~:text=Mithun%20animal%20is%20the%20state,%2C%20China%2C%20Bangladesh%20and%20Myanmar.
• Apum, N; Nimasow, G; Nimasow, O; Bapu, T; Bushi, D: Population Status and Conservation Efforts of Bos frontalis (Mithun) in Adi Tribe Inhabited Areas of Arunachal Pradesh, India. NGJI, An International Peer-Reviewed Journal. Vol. 66, No. 1, March 2020 pp- 59-68.
• https://nrcmithun.icar.gov.in
Category:  Environment


 |    September 22, 2023 |   0 comment

LiFE- Lifestyle for Environment

Picture source = https://www.thelancet.com/journals/lansea/article/PIIS2772-3682%2823%2900098-7/fulltext

 

India has always inspired the world on environmental protection and now is the time India leads the world by example and conserves our environment. India’s per capita carbon footprint is significantly lower than world average because lifestyle is still rooted in sustainable traditional practices.

 

Ever noticed why you feel rejuvenated when you inhale fresh clean breeze of air with no pollutants? There is a great sense of belongingness and an invisible connection towards mother Earth while doing so. Breathing unpolluted air has become a rare phenomenon in a city like Delhi and it is spreading fast to other cities as well. This time (winter months of year 2022), Bombay and Bangalore too witnessed very poor levels of Air Quality Index. Air pollution alone is reducing solar power generation by 29%. Himalayan ice sheets have shrunk and there is a global sea level rise prediction between 2-6 feet by year 2100. Reasons can be attributed towards a cumulative effect of all environment damaging activities we do on day to day basis. The sad part is we acknowledge the facts that our habits have degraded the planet to an extent that it is time to act on it but we seldom act. However, our simple habits can bring about myriads of changes towards betterment of the environment and that’s the beauty of it. With this aim, at the 2021 UN Climate Change Conference (UNFCCC COP26), Hon’ble Prime Minister of India, Shri Narendra Modi announced Mission LiFE, to bring individual behaviours at the forefront of the global climate action narrative. The mission named Pro-Planet People (P3) aims to adopt environment friendly lifestyles and drive LiFE as an international mass movement towards “mindful and deliberate utilisation, instead of mindless and destructive consumption” to protect and preserve the environment.It is time to take mindful day-to-day decisions with the sole aim towards improvement of environment.

 

Water harvesting techniques have been prevalent in India since a very long time- an example of deep rooted traditional practices in India. A visit to Gujarat and Rajasthan will depict popular technique of rain water harvesting via construction of step wells. Even the underground tanks (tankaa) of Tamil Nadu, check dams (johads) of Rajasthan and the Zabo system of Nagaland that deposit the water in pond-like structures on terraced hillsides have been in use for a long time.

 

For majority of people, happiness lies in buying new clothes but buying quality garments and making them last is all together a different experience. Our grandparents had only those many clothes that they could take care of. With minimal clothing they led a happy and satisfied life. Unfortunately clothes from fast fashion brands aren’t meant to last really, and it’s important that we realise that, and switch to buying thoughtfully. Vintage and pre-loved clothing should gain momentum. There is a need for a change from throw away culture to circular economy. Simple actions like carrying a steel water bottle/ tumbler to office meetings can be a good start. This will greatly reduce generation of plastic waste from commercial buildings. In addition, minimising electricity consumption and hand-washing and sun-drying of clothes can serve as foundations for LiFE.

 

Each and every individual must take the responsibility to take care of Mother Earth. Such simple actions can be easily practiced by us for betterment of the environment and save the planet from climate change. Let’s aim to be PRO-PLANET PEOPLE.

 

Shreya

DM(Env.)

Corporate Office

 

References:

  • https://www.mygov.in/life/
  • https://www.wto.org/english/tratop_e/envir_e/session_13_life_deck_for_global_delegates_20_oct_2022.pdf
  • https://mopng.gov.in/files/uploads/Concept-Note—Mission-LiFE-(1).pdf
Category:  Environment


 |    September 22, 2023 |   0 comment

ENERGY TRANSITION IN INDIA

Picture source = https://vajiramias.com/current-affairs/global-energy-transition-index/5c99d4491d5def13690f1126/

 

 

India’s energy transition phase started in the early 1980s when it set up a dedicated governing body for non-conventional energy matters, called the Ministry of New and Renewable Energy (MNRE), the first country to do so in the world. In 1986, India set up its first wind power plants in Maharashtra, Gujarat and Tamil Nadu and has reached total wind power installed capacity of about 13 GW by 2010. In 2009, India had set up its first solar power plant in Punjab with a capacity of 02 MW. Since then, India has been working toward increasing its dependency on non-conventional renewable and non-emission energy sources.

 

Contribution of India to clean energy

 

India has installed electricity capacity of 172.72 GW from non-fossil fuels sources as on 31.10.2022. In fact, India’s new draft National Electricity Plan 2022 sees about 18GW reduction in coal capacity by 2030 when compared to the Optimal Generation Capacity Mix report released in 2020.

 

India is one of the largest energy consumers and the third-largest renewable energy producer in the world. To strengthen its energy transition, the Government has implemented several policies and schemes to encourage manufacturing and research in renewable energy sector. In the recent Budget 2022–23, India allocated Rs. 19,500 crore (US$ 2.61 billion) for domestic solar cells and module manufacturing. Similarly, Rs. 1,050 crore (US$ 141 million) was allocated to the wind power sector. India aims to become a major manufacturer in various sectors including solar equipment, batteries and semiconductors.

 

 

Financial Support for Energy Transition

 

Government has started a range of initiatives to support India’s Energy Transition including a Rs 21,650 Crore scheme to encourage the setting up the Grid scale Battery Energy Storage System (BESS) and Rs 3,765 Crore in viability grant for such projects and reduced import duties on parts to build BESS. Furthermore, Government may offer a 5% interest subvention for new energy efficient technologies and a credit guarantee of 75% of the loan amount or Rs. 15 Crore per project to small and medium enterprises deploying energy efficient technologies. Help in creating job opportunities in these states and with revenue generation for their economy.

 

Transitioning to clean energy from fossil fuels is need for combating global warming. By helping to control global warming, India can help to mitigate the danger associated with the climate change. Energy storage is expected to play key role in helping India meet its commitment to net zero carbon emission by 2070 increasing non fossil energy capacity to 500 GW by 2030 and reducing the carbon intensity of its economy by 45% from 2005 level.

 

– Dharam Pal Rathore
Deputy General Manager (Environment)
Teesta-VI HE Project

Reference:
1. India Brand Equity Foundation; INDIA’S ENERGY TRANSITION AND INNOVATION COLLABORATION
2. Mint New Delhi, 21-12-2022 Budget to press for Energy Transition

Category:  Environment


 |    September 22, 2023 |   0 comment

किसिंग गौरामी : एक्वेरियम परिदृश्य

Picture source =https://aquariumfishonline.com.au/product/pink-kissing-gourami-helostoma-temminkii-7cm/

 

किसिंग गौरामी (Helostoma temminkii), जिसे किसिंग फिश या किसर के रूप में भी जाना जाता है, हेलोस्टोमैटिडी (Helostomatidae ) परिवार की मध्यम आकार की उष्णकटिबंधीय क्षेत्र व मीठे पानी में पाये जानी मछली है। इस मछली का उद्गम स्थल थाईलैंड से लेकर इंडोनेशिया तक है। वैसे तो यह सजावटी मछली के तौर पर सर्वत्र प्रसिद्ध है, लेकिन इन मछलियों के मूल देशों (दक्षिण पूर्व एशिया) में ये खाद्य मछली के रूप में भी प्रचलित हैं, क्यूंकी वहाँ इनकी खेती फार्म स्तर पर की जाती है। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में इन मछलियों को स्टीमिंग, बेकिंग, ब्रोइलिंग और पैन फ्राइंग के उद्देश्य से ताजा उपयोग में लाया जाता है।

 

किसिंग गौरामी मछली का सबसे विशिष्ट भाग इसका मुंह होता है, क्यूंकी इसके मुंह की बनावट की वजह से ही यह बाकी मछलियों से भिन्न होती है। इसी विशेषता के कारण इनका अनोखा नामकरण प्रतीत होता है। इन मछलियों में किसी भी प्रकार की बाहरी यौन द्विरूपता नहीं होती, इसलिए इनके लिंगों में बाह्य तरीके से अंतर कर पाना सरल कार्य नहीं होता। यह मछली अन्य मछलियों, पौधों और आस-पास के वस्तुओं पर अपनी अजीबो-गरीब “किसिंग” व्यवहार के कारण जलशालाविद के बीच काफी लोकप्रिय है। नर एवं मादा किसिंग गौरामी आपस में अक्सर मुंह से मुंह लड़ाते हैं, और एक दूसरे को विपरीत दिशा में धकेलते है, जो प्रायः किसिंग प्रक्रिया जैसा प्रतीत होता है। इन मछलियों का निर्यात जापान, यूरोप, उत्तरी अमेरिका, आस्ट्रेलिया और दुनिया के अन्य हिस्सों में वृहत पैमाने पर किया जाता है।

 

ये मछलियाँ अपने से समान आकार की दूसरे मछलियों के प्रति सहिष्णुता का परिचय देती हैं, लेकिन बाकी अन्य मछलियों का पीछा कर, तंग कर उन्हें पीड़ा पहुंचाती है, जिससे टैंक (एक्वेरियम) में मौजूद अन्य मछलियाँ असहज महसूस करती हैं। नर मछलियाँ प्रायः एक दूसरे को किसिंग गतिविधि की चुनौती देते रहते हैं। हालांकि, यह प्रक्रिया इनके लिए कभी भी घातक नहीं होता, लेकिन लगातार ऐसा करने से दूसरी मछलियाँ तनाव में आकार अपनी जान गवा सकती हैं। फलस्वरूप एक्वेरियम में इन मछलियों के साथ अगर दूसरे प्रजाति के मछलियों को रखना हो, तो इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि वे सभी इनके आकार के बराबर हो।किसिंग गौरामी अपने भोजन के उद्देश्य से अक्सर अन्य मछलियों की त्वचा से बलगम चूसते हैं, जिससे शिकार मछलियों की त्वचा पर संक्रमण होने से जान जाने का खतरा बना रहता है।

 

ये मछलियाँ एक्वेरियम टैंक में मौजूद शैवाल को अपना आहार बना लेती हैं, इसलिए एक्वेरियम टैंक में शैवाल के विकास को नियंत्रित करने के लिए ये मछलियाँ बहुत उपयोगी होती हैं।  मछलियों द्वारा टैंक में मौजूद आधार सतह की खुदाई को रोकने के लिए और शैवाल के विकास हेतु पर्याप्त सतह क्षेत्र उपलब्ध कराने के लिए, सब्सट्रेट में बड़े-व्यास वाली बजरी और पत्थरों का होना आवश्यक होता है। एक्वेरियम के पिछले शीशे को नियमित रखरखाव के दौरान साफ नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि वहां उगने वाले शैवाल, इन मछलियों के लिए भोजन आपूर्ति का कार्य करते हैं।अधिकांश जीवित पौधे, मछलियों के चरने से समाप्त हो जाते हैं, इसलिए अक्वेरियम को अलंकृत रूप में बरकरार रखने के उद्देश्य से अक्वेरियम में ज्यादातर अखाद्य पौधों जैसे: जावा फ़र्न, जावा मॉस या प्लास्टिक के पौधों को अधिष्ठापित करना उचित रहता है।

 

किसिंग गौरामी मछलियाँ सर्वाहारी होती हैं और इन्हें अपने आहार में पौधे और पशु पदार्थ, दोनों की आवश्यकता होती है। ये किचन में पके हुए सब्जियों जैसे लेट्यूस  (Lactuca sativa) और सूक्ष्म जीवजन्तु भोजन के रूप में स्वीकार करती हैं। एक्वेरियम में इनके लिए पानी की कठोरता (Hardness) 5 से 30 dGH और pH 6.8 और 8.5 के मध्य होना चाहिए तथा पानी का तापमान 22 और 28 डिग्री सेल्सियस (72 और 82 डिग्री फारेनहाइट) के मध्य होना चाहिए। हालांकि प्रजनन करते समय, शीतल जल (सॉफ्ट वॉटर) को प्राथमिकता दी जाती है। चूंकि ये मछलियाँ घोंसले का निर्माण नहीं करती है, इसलिए पानी की सतह पर रखे लेट्यूस के पत्ते स्पौनिंग हेतु माध्यम के रूप में कार्य करते हैं। लेट्यूस (Lactuca sativa) पर बैक्टीरिया और इन्फ्यूसोरिया जैसे सूक्ष्म जीवजन्तु के पनपने से इनकी भोजन आपूर्ति पूरी हो जाती है। एक्वैरियम में किसिंग गौरामी की अधिकतम लंबाई 30 से 40 सेमी (12 और 15.5 इंच) के मध्य होती है। सामान्य तौर पर टैंक और स्ट्रीम में इन मछलियों का औसत जीवन काल 5 से 7 वर्ष तक दर्ज किया गया है।

 

-मनीष कुमार, उप प्रबंधक (फिशरीज)

 निगम मुख्यालय

 

संदर्भ :

  • https://www.fishbase.de/summary/500
  • https://animaldiversity.org/accounts/Helostoma_temminkii/
  • https://www.cabi.org/isc/datasheet/80320
Category:  Environment


 |    September 22, 2023 |   0 comment

SUSTAINABLE DEVELOPMENT GOALS

Picture Source = https://education.nationalgeographic.org/resource/sustainable-development-goals/

 

The Sustainable Development Goals (SDGs) are the shared blueprint to achieve a better and more sustainable future for all. They address the global challenges faced which include poverty, inequality, climate change, environmental degradation, peace and justice. The SDGs aim to transform our world. The 17 Goals were adopted by all United Nations Member States in September 2015 as part of the 2030 Agenda for Sustainable Development and sets out a 15-year plan to achieve the Goals and their related targets. The 17 Goals are interconnected, apply to all countries, and need to be carried out by all stakeholders – governments, private sector, civil society, the United Nations and others, in a collaborative partnership. The 17 Sustainable Development Goals in brief are as under:​

 

SDG-1: No Poverty:  To ensure that all men and women, in particular the poor and the vulnerable, have equal rights to use economic resources, as well as to access basic services, ownership and control over land and other forms of property, inheritance, natural resources, appropriate new technology and financial services.

 

SDG-2: Zero Hunger: To ensure sustainable food production systems and implement resilient agricultural practices that increase productivity and production, that help sustain the ecosystems, that strengthen capacity for adaptation to climate change, extreme weather, drought, flooding and other disasters and that progressively improve land and soil quality.

 

SDG-3: Good Health and Wellbeing: To strengthen the prevention and treatment of substance abuse, including narcotic drug abuse and harmful use of alcohol; end the epidemics of AIDS, tuberculosis, malaria, water-borne diseases and other communicable diseases; universal health coverage, to support the research and development of vaccines and medicines etc.

 

SDG-4: Quality Education: To ensure all learners acquire knowledge and skills needed to promote sustainable development, including among others through education for sustainable development and sustainable lifestyles, human rights, gender equality, promotion of a culture of peace and non-violence, global citizenship, and appreciation of cultural diversity and culture’s contribution to sustainable development.

 

SDG-5: Gender Equality: To end discrimination, eliminate all forms of violence against women and girls; to ensure effective participation and equal opportunities for leadership at all levels of decision-making in political, economic and public life.

 

SDG-6: Clean Water and sanitation: To improve water quality by reducing pollution, eliminating dumping and minimizing release of hazardous chemicals and materials, halving the proportion of untreated wastewater and substantially increasing recycling and safe reuse globally; access to adequate and equitable sanitation and hygiene.

 

SDG-7: Affordable and Clean Energy: To ensure universal access to affordable, reliable and modern energy services.

 

SDG-8: Decent Work and Economic Growth: To eradicate forced labour, end modern slavery and human trafficking, and prohibition of child labour. To promote development-oriented policies that support productive activities, decent job creation, entrepreneurship, creativity and innovation, and encourage the formalization and growth of micro, small and medium-sized enterprises, including through access to financial services.

 

SDG-9: Industry, innovation and Infrastructure: Develop quality, reliable, sustainable and resilient infrastructure, including regional and transborder infrastructure, to support economic development and human well-being, with a focus on affordable and equitable access for all.

 

 

SDG-10: Reduce Inequalities: Facilitate orderly, safe, regular and responsible migration and mobility of people, official development assistance and financial flows.

 

SDG-11: Sustainable Cities and Communities: Access to adequate, safe and affordable housing and basic services; sustainable transport systems; sustainable urbanization; public spaces; strengthening national and regional development planning; holistic disaster risk management.

 

SDG-12: Responsible Consumption and Production: To achieve the environmentally sound management of chemicals and all wastes throughout their life cycle, in accordance with agreed international frameworks, and significantly reduce their release to air, water and soil in order to minimize their adverse impacts on human health and the environment.

 

SDG-13: Climate Action: Take urgent action to combat climate change and its impacts; maintenance of environment and natural resources.

 

SDG-14: Life below Water: Conserve and sustainably use the oceans, seas and marine resources for sustainable development.

 

SDG-15: Life on Land: Protect, restore and promote sustainable use of terrestrial ecosystems, sustainably manage forests, combat desertification, and halt and reverse land degradation and halt biodiversity loss; to end poaching and trafficking of protected species of flora and fauna and address both demand and supply of illegal wildlife products.

 

SDG-16: Peace, Justice and strong Institutions: Promote peaceful inclusive societies for sustainable development, provide access to justice for all and build effective, accountable and inclusive institutions at all levels.

 

SDG-17: Partnership for the Goals: Strengthen the means of implementation and revitalize the global partnership for sustainable development.

 

 

Sustainable Development Goals and India

NITI Aayog has constructed the SDG India Index spanning across 13 out of 17 SDGs (except SDGs 12, 13, 14 and 17). The Index tracks the progress of all the States and Union Territories (UTs) on a set of 62 National Indicators, measuring their progress on the outcomes of the interventions and schemes of the Government of India. The SDG India Index is intended to provide a holistic view on the social, economic and environmental status of the country and its States and UTs. The SDG India Index is an aggregate measure which can be understood and used by everyone—policymakers, businesses, civil society and the general public. It has been designed to provide an aggregate assessment of the performance of all Indian States and UTs, and to help leaders and change makers evaluate their performance on social, economic and environmental parameters. It aims to measure India and its States’ progress towards the SDGs for 2030.

Ritumala Gupta
Senior Manager (Environment)
Corporate Office

Reference:
1. https://www.un.org/
2. https://niti.gov.in/

Category:  Environment


 |    September 22, 2023 |   0 comment

नागफनी

Picture source = https://www.plantaeparadise.com/Echinopsis-hybrid-p543258858

 

(बतकही/ प्रसंग)

 

फूलों की दुकान का मुआयना करती रूतु की सरसरी नजरें कंटीली नागफनी की खूबसूरती पर जा कर अटक गईं और अब नागफनी का वो नन्हा पौधा उसके शयनकक्ष की सजीवता को बढ़ा रहा था। वस्तुतः रूतु गई तो थी फूल के पौधे लेने पर उसने कंटीली नागफनी में ज्यादा अपनापन पाया। रूतु को नागफनी अपनी फ़ितरत से मिलती-जुलती सी लगी तो उसे संग ले आई। लंबे अरसे से सिरहाने पड़ा खाली तिपाया उसे कचोट रहा था। वैसे भी कहने वाले से ज्यादा उसे सुनने वाले की जरूरत थी – एक मौन श्रोता !

 

नागफनी (कैक्टस) को सामान्यतः घर के अंदर क्या, घर के आस-पास भी देखना पसंद नहीं किया जाता है, पर  “रूतु” उसे अपने घर के अंदर ही नहीं बल्कि अपने शयनकक्ष में रखने के लिए खरीद लाई थी। “नागफनी” – खाद/पानी व देखभाल के बिना भी जीवित रहने की कूवत रखती है। अपनी जिजीविषा को खुद में समेटे, संरक्षित किए – काफी हद तक आत्मनिर्भर ! कांटों के खूबसूरत लिबास में इठलाती हुई,  और … कांटे भी तेज़, धारदार, नुकीले और तीखे।

 

वास्तव में ये कांटे नागफनी की पत्तियां हैं, जो कि कांटों में तब्दील हो गई हैं – वातावरणवश/ परिस्थितिवश ताकि तने में सहेजी गई नमी/ प्राणऊर्जा उड़न-छू न हो पाए। प्रकृति की गोद में तपती धूप का सामना करना है, भीषण गर्म हवा के थपेड़े झेलने हैं, चुभती ठंढ भी सिहरा के गुजर जानी है और वो भी …. अनवरत/ निरंतर। जड़ें जितनी गहरी होंगी, उतना जीवन रस सोखेंगी, उतनी ही मजबूती रहेगी स्वाभिमान सहित तन कर खड़े होने में।

 

रूतु अब पहले से भी ज्यादा खुश है। सुबह घर से निकलते वह नागफनी को कमरे से बाहर धूप में रख जाती है ताकि नागफनी को अकेलापन न महसूस हो और फिर शाम को वापस नागफनी को कमरे के अंदर ले आती है। रात के ढलने तक रूतु और नागफनी खामोशी में बातें करते हैं।

 

-पूजा सुन्डी

उप प्रबंधक (पर्यावरण)

निगम मुख्यालय

Category:  Environment


 |    September 22, 2023 |   0 comment

Business Responsibility and Sustainability Reporting (BRSR): a way to achieve Sustainable Development Goals

Transforming our world: the 2030 Agenda for Sustainable Development” comprising of 17 Sustainable Development Goals (SDGs) was adopted by 193 countries of the UN General Assembly at the Sustainable Development Summit in September 2015. SDGs include important elements like ‘no poverty”, ‘zero hunger’, ‘quality education’, ‘clean energy’ etc. India along with other countries signed the declaration on the 2030 Agenda and the NITI Ayog, the apex body of GOI in co-ordination with State Governments is making all out efforts to achieve the targets under the SDGs.

Given the diverse socio-economic scenario of India, holistic achievement of SDGs will require collective efforts and active participation of all business sectors in the country.  The step taken by SEBI for mandatory non-financial disclosure by listed company (ies) in BRSR format w.e.f. FY 2022-23 is a significant step for sustainable business practices. The BRSR format has been designed as per National Guidelines on Responsible Business Conduct (NGRBC-2019) which has nine principles (P1 to P9) aligning business module to incorporate all the 17 SDGs.  It is envisaged that such business modules aligned with SDGs will go a long way in transforming the economic development processes in India. The mandatory disclosure will enable companies to review and revisit their business process/practices in order to ensure compliance of Environmental, Social and Governance (ESG).  In view of this, company (ies) will have to work upon aligning their business module as per SDGs, management of data bank supported by policy(ies)/guidelines in order to achieve the best output of company as envisaged in BRSR framework. This will empower company to gain better acceptability among investors, stakeholders, local community etc.

Ref: web portal of SEBI and Ministry of Corporate Affairs

Manoj Kumar Singh

SM(Environment), Environment & Diversity Mamagement Division,

NHPC, Faridabad

Pic ref: https://learning.icai.org/committee/sr/business-responsibility-and-sustainability-reporting/

Category:  Environment


 |    January 27, 2023 |   1 comment

Floating Biomass of Loktak Lake (Phumdi)

Loktak Lake is not only the largest freshwater lake in northeast India but is also home to unique floating islands called “Phumdis”. These circular landmasses are made of vegetation, soil, and organic matter (at different stages of decomposition) that have been thickened into a solid form. Most of the mass of Phumdis lies below the water surface. The thickness of these floating islands varies from a few centimeters to around two meters. During the dry season, when water levels drop, the living roots of the Phumdis can reach the lake-bed and absorb nutrients. When the wet season returns, they again float, and the biomass, which has enough nutrients stored in the plants’ roots, survives.

 

The largest mass of Phumdis are in the southern part of Loktak lake and the area has been notified as Keibul Lamjao National Park.  Phumdis are habitat of over 83 species of plants. Mammals like the sangai, hog deer, common otter, jungle cat, bamboo rat, fox, Indian civets, musk shrew, flying fox, and others live in the phumdis in Keibul Lamjao National Park. A large number of reptiles including tortoises, common lizards, and poisonous snakes like krait, viper, cobra, and python also inhabit the park. Both migratory and resident bird species are also found in the park including Burmese sarus crane, spotbill duck, black kite, northern hill myna, and others. It is also the home to the endangered Manipur brow-antlered deer (Cervus eldi eldi), locally known as the Sangai. Brow-antlered deer is also the state animal of Manipur.

 

Loktak Lake and its countless phumdis support not just rich diversity of birds and aquatic life, but also thousands of fishermen, who have developed an entire way of life on these floating islands, navigating through them on narrow boats, easily turning landmasses into waterways whenever needed, to negotiate their way through them.

 

 D.A. Jaya Sheeli,

 Manager (Environment),

Environment & Diversity Management Division,

NHPC Corporate Office.

Reference (text & pic):

  • https://en.wikipedia.org/wiki/Phumdi,//www.outlookindia.com/outlooktraveller/,
  • //www.google.com/url?sa=i&url=https%3A%2F%2Fwww.researchgate.net%2Ffigure%2FSchematic-diagram-showing-the-anatomy-of-floating-phumdi-from-creating-habitat-
  • https://www.worldatlas.com/articles/what-is-a-phumdi.html
Category:  Environment


 |    January 27, 2023 |   0 comment

कृषि वानिकी (एग्रोफारेस्ट्री) – एक नवीन धारणा

सरल शब्दों में वनीय वृक्षों तथा फसलों की संयुक्त कृषि को कृषि वानिकी या एग्रोफारेस्ट्री कहते हैं । जबकि विस्तृत रूप में कृषिवानिकी एक प्रतिपालनीय भूमि प्रबंधन तंत्र है जो भूमि की उत्पादन शक्ति को बढ़ाता है एवं एक साथ अथवा क्रमिक रूप में फसलों (वृक्षीय फसलों सहित) तथा वन पौधों तथा/ अथवा जन्तुओं के उत्पादन को जोड़ता है । साथ ही साथ स्थानीय समुदाय द्वारा प्रयोग की जाने वाली कृषि रीतियों के अनुरूप प्रबंधन रीतियों को प्रवृत करता है ।

नम उष्ण क्षेत्रों में वृक्षों के रक्षण के अभाव में एक वर्षीय खाद्य फसलों का उत्पादन प्रायः कठिन होता है । इन क्षेत्रों की मृदा में पोषक तत्व शीघ्र रिसकर नीचे चले जाते हैं तथा इस क्षय को कृत्रिम रूप से पूरित करने का प्रयास किया जाता है, जबकि परंपरागत लघुस्तरीय तंत्रों के लिए यह निषेधार्थक है । वृक्षों के बिना सम्पूर्ण जैविक तथा भौतिक पर्यावरण शीघ्र विघटित हो जाता है । नम उष्ण क्षेत्रों की जंगली वनस्पतियों में वृक्षों का प्रमुख स्थान है तथा फसल उत्पादन अथवा पशुपालन अथवा दोनों के साथ वृक्ष उत्पादन के लिए समान भूमि का बहुप्रयोग, नम उष्ण मृदा की संरचना एवं उर्वरा शक्ति तथा जैविक एवं भौतिक पर्यावरण के अन्य घटकों के संरक्षण के लिए प्रयोग की जाने वाली कम-लागत की तकनीकी में सर्वश्रेष्ठ है । साथ ही उष्ण विकासशील देशों में जनसंख्या की वृद्धि के साथ भूमि एक सीमित संसाधन होती जा रही है तथा योजनाकर्ताओं का ध्यान अपेक्षाकृत कम महत्व के उत्पादन क्षेत्रों की ओर आकर्षित हो रहा है । कम महत्व की भूमि पर प्रतिकूल जैविक तथा भौतिक दशाओं में भी फसलों के साथ वृक्षों के उचित अन्तरारोपण से शुद्ध पारिस्थितिक लाभों के अतिरिक्त फसल उत्पादन तथा वृक्षों की खाद्य एवं अन्य वस्तुओं के उत्पादन की क्षमता में वृद्धि सर्वविदित है । नम उष्ण पर्यावरण के सम्पूर्ण दोहन में वृक्षों की संभावित भूमिका महत्वपूर्ण है ।

कृषि वानिकी के प्रकार

घटकों की प्रकृति के आधार पर भारत में कृषि वानिकी का विस्तृत विवरण निम्नांकित है-

1. एग्री-सिल्वीकल्चर : यह फसलों तथा वृक्षों को जोड़ता है ।
2. एग्री-हार्टीकल्चर : यह फसलों तथा फल प्रदान करने वाले वृक्षों को जोड़ता है ।
3. एग्री-सिल्वीपाश्चर : यह फसलों, वृक्षों तथा चारागाहों को जोड़ता है ।
4. एग्री-हार्टी-सिल्वीकल्चर : यह फसलों, फल प्रदान करने वाले वृक्षों तथा बहुउद्देश्यीय वृक्षों एवं झाड़ियों (एम.पी.टी.एस.) को जोड़ता है ।
5. सिल्वीपाश्चर : यह चारा प्रदान करने वाले वृक्षों तथा चारागाहों/ जन्तुओं को जोड़ता है ।
6. एग्री-हार्टी-पाश्चर : यह फसलों, फल प्रदान करने वाले वृक्षों तथा चारागाहों को जोड़ता है ।
7. हार्टी-पाश्चर : यह फल प्रदान करने वाले वृक्षों तथा चारागाहों को जोड़ता है ।
8. सिल्वी-हार्टीपाश्चर यह बहुउद्देशीय वृक्षों एवं झाड़ियों, फल प्रदान करने वाले वृक्षों तथा चारागाहों को जोड़ता है ।

भारत में कृषि वानिकी का महत्व

  1. भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों की शुष्क तथा अर्धशुष्क भूमि में गर्म वायु लाखों टन महत्वपूर्ण ऊपरी मृदा को उड़ा ले जाती है, जबकि प्रकृति द्वारा इस मृदा के निर्माण में शताब्दियाँ लग जाती हैं । यदि वृक्षों को रक्षक- पट्टी के रूप में रोपित किया जाता है तो वे वायु को अपनी ऊँचाई से बीस गुना अधिक दूरी तक विस्थापित कर देते हैं । रक्षक-पट्टियों से वायु की गति 20 से 46 प्रतिशत कम हो जाती है तथा ऐसा पाया गया है कि इनके द्वारा रक्षित भूमि पर अरहर, बाजरा तथा मूँगफली का उत्पादन अरक्षित फसलों की तुलना में अधिक होता है । राजस्थान तथा गुजरात के शुष्क क्षेत्रों में खेजरी (प्रोसोपिस सिनेरेरिया) को कुछ फसलों जैसे बाजरा, मूंग तथा मोठ के साथ उगाने के लिए सर्वोत्तम पाया गया है । कम वर्षा वाले क्षेत्रों में खेजरी के 10 वृक्ष, जबकि पर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्र में इसके 120 वृक्ष एक हेक्टेअर भूमि के लिए पर्याप्त होते है । इन क्षेत्रों में फसलों के साथ उगाने के लिए झाड़िया बेर (ज़िज़ाइफस न्यूमुलेरिया) भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है । अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में कृषिवानिकी के लिए बेर (ज़िज़ाइफस मॉरिशियाना) भी उपयोगी सिद्ध हुआ है । ऐसा देखा गया है कि बेर के वृक्षों की पट्टियों के बीच में रोपित सेम की फसल का उत्पादन 5 क्विंटल फली प्रति हेक्टेयर बढ़ जाता है । ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि खेजरी (प्रोसोपिस सिनेरेरिया) तथा इस्राइली बबूल (एकेशिया टॉर्टिलिस) के वृक्षों को 400 वृक्ष प्रति हेक्टेअर के घनत्व से रोपित करने से उनके मध्य एक उन्नत चारागाह विकसित करके ईंधन की लकड़ी प्राप्त की जा सकती है । चूंकि प्रूनिंग के पश्चात वृक्षों में पुनः वृद्धि हो जाती है, अतः एक वृक्ष को पूर्णतया काटने की तुलना में उसकी बारंबार प्रूनिंग करके अधिक मात्रा में लकड़ी प्राप्त की जा सकती है । पत्तियों का पशुओं के चारे तथा मल्श के रूप में प्रयोग किया जा सकता है । मल्श का मृदा की संरचना में सुधार, वाष्पीकरण में कमी, जल वहन क्षमता में वृद्धि तथा मृदा को जैविक कार्बन एवं पोषक तत्वों से परिपूर्ण करने में उपयोग होता है ।          कृषि वानिकी के लाभ इन क्षेत्रों के अतिरिक्त दूसरे क्षेत्रों में भी पाये गए हैं । सौराष्ट्र के अधिक वर्षा वाले काली मृदा के क्षेत्रों में सू-बबूल या विलायती बबूल (ल्यूसीना ल्यूकोसिफेला) की पट्टियों के मध्य उगाई गई मूँगफली, मूंग तथा उर्द की फसलें अधिक उत्पादन देती हैं ।
  1. राष्ट्रीय कृषि वानिकी अनुसंधान केंद्र, झांसी में किए गए अनुसन्धानों के अनुसार कृषि फसलें 12 बहुउद्देशीय वृक्षों (500 से 1250 वृक्ष प्रति हेक्टेअर) मुख्यतः रामकांटी (एकेशिया निलोटिका उपजाति क्यूप्रेसीफार्मिस) तथा कैजुएराइना इक्वीसेटीफोलिया के साथ सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है । ज्वार, मूँगफली तथा गेहूँ को बेर, अनार, नींबू की किन्नो उपजाति एवं अमरूद (100 से 400 वृक्ष पार्टी हेक्टअर) तथा बहुउद्देशीय नाइट्रोजन स्थरीकारक वृक्षों जैसे सू-बबूल (ल्यूसीना ल्यूकोसिफेला, 250 से 300 वृक्ष प्रति हेक्टेअर) के साथ उगाया जा सकता है । इसमें फसलों की उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है । आगरा में किए गए अध्यनों के अनुसार रोपण के पूर्व मृदा में सू-बबूल की पत्तियों के सम्मिलन से गेहूं की फसल में 15 से 23 प्रतिशत की वृद्धि होती है । अनुपजाऊ मृदा में उगाये गए गेहूं-लोबिया-गेहूं सस्यावर्तन की लगभग आधी नाइट्रोजन की आवश्यकताओं की पूर्ति सू-बबूल करता है । बंजर भूमि पर सेन्क्रस तथा स्टाइलोंजैंथिस की इस्राइली बबूल (एकेशिया टॉर्टिलिस, 300 वृक्ष प्रति हेक्टेयर) के साथ कृषि करने पर 3.0 से 3.5 टन प्रति हेक्टेअर प्रति वर्ष चारे का तथा वृक्ष घटक द्वारा 7 टन प्रति हेक्टेअर प्रति वर्ष लकड़ी का उत्पादन किया जा सकता है । लकड़ी तथा पशु चारा प्रदान करने वाले वृक्षों जैसे अंजन (हार्डविकिया बाइनेट) तथा सिरिस (एल्बिज़िया लिबेक) के साथ भी उन्नत चारागाह विकसित किए जा सकते हैं । विघटित बंजर भूमि के सुधार के लिए लकड़ी तथा चारा प्रदान करने वाले वृक्षों की उपयुक्त जातियों जैसे एकेशिया निलोटिका उपजाति क्यूप्रेसीफार्मिस, ल्यूसीना ल्यूकोसिफेला, डेन्ड्रोकैलेमस स्ट्रिक्टस, डाइक्रोस्टैकिस सिनेरिया, एल्बीज़िया एमारा, डेल्बरजिया सीसू आदि की संस्तुति की गई है ।
  1. सोलन में पाया गया है कि 5 x 5 मी. की दूरी पर रोपित पॉपलर (पापुलस एल्बा) वृक्षों के मध्य के स्थान में गेहूं सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है । पूर्वी हिमालय क्षेत्र में मक्का/ अदरख तथा सोयाबीन/ अदरख का यूटिस (एल्नस निपालेन्सिस) के साथ उगाना लाभप्रद है । सिक्किम में बांस के द्वारा छायित भूमि में अदरख तथा हल्दी की कृषि लाभप्रद है । देहरादून में कैम्फर (सिनेमोमम कैम्फोरा) तथा सागौन (टेक्टोना ग्रैंडिस) को सरसों के साथ 6-8 मीटर की दूरी पर सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है । करनाल क्षेत्र की ऊसर एवं क्षारीय भूमि के काबुली कीकर (प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा) के साथ करनाल-घास (डिपलैक्ने फस्का) उगाने में प्रभावी रूप से उपयोग किया गया है । अनुसंधानों से विदित हुआ है कि जयन्ती (सेस्बानिया सेस्बान) मृदा को पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन प्रदान करती है ।
  1. छोटा नागपुर तथा पश्चिम बंगाल के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में ऑस्ट्रेलियन बबूल (एकेशिया ऑरिकुलीफॉर्मिस) के साथ उगाने पर मक्के की फसल में 10.2 किलोग्राम प्रति हेक्टेअर की वृद्धि होती है । इसी प्रकार अमरूद + चंदन एवं अमरूद + शीशम भी अधिक उत्पादन देते हैं । उड़ीसा में लीची + पत्तागोभी तथा नींबू + पत्तागोभी के मध्य कुछ स्थानों पर जयन्ती तथा सू-बबूल उगाकर अधिक उत्पा व अन्य कार्यों में उपयोगी लकड़ी के लिए दन किया जा सका है ।

निष्कर्ष

लघुस्तरीय कृषि व्यवसायों में कृषि वानिकी की विस्तृत बहुउद्देशीय संसाधन प्रयोग धारणा का अनुप्रयोग किया जा सकता है, क्योंकि इनमें पहले से ही ईंधन की लकड़ी, पशुचारा, खाद्यफल, फलियाँ व पत्तियां, मृदा के स्थरीकरण व उर्वराशक्ति में सुधार एवं निर्माण व अन्य कार्यों में उपयोगी लकड़ी के लिए विविध फसलें उगाई जा रही हैं । विस्तृत रूप में विचार करने पर विदित होता है कि कृषि वानिकी की सहायता से कृषि उत्पादन में वृद्धि व विविधता लाई जा सकती है, पारिस्थितिकीय रूप में सार्थक कृषि-पारिस्थितिक तंत्रों को प्रेरित किया जा सकता है, तथा ग्रामीण व्यवसायों के लिए अवसरों में विविधता का समावेश किया जा सकता है । यद्यपि नम उष्णकटिबंधीय तथा शुष्क क्षेत्रों के अनेक भागों में इसकी उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है तथा देश के अन्य क्षेत्रों में भी इसके अच्छे परिणाम आने की संभावना है, किन्तु अपेक्षाकृत आदर्श एवं अस्थायी एकल संवर्धन को विस्थापित करके उसके स्थान पर इस प्रकार के विविध पारिस्थितिक तंत्र की स्थापना के लिए राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक संकल्पशक्ति एवं समर्पण, कृषि एवं वानिकी का पूर्णसंगठित राष्ट्रीय एवं प्रांतीय प्रशासन, वानिकी अधिकारियों के अनुसंधान व प्रशिक्षण में वृद्धि, कृषि व वानिकी सेवाओं में वृद्धि तथा लघुस्तरीय कृषकों में संकल्पशक्ति व अनुशासन के समावेश की आवश्यकता होगी ।

-द्वारा

डॉ. अजय कुमार झा

वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

तीस्ता-VI परियोजना, सिक्किम

Pic source: https://www.fs.usda.gov/ccrc/topics/agroforestry

Category:  Environment


 |    January 27, 2023 |   0 comment

अपने ध्वंस और पुनर्निर्माण के लिए इतिहास मे दर्ज है सुदर्शन बांध

सौराष्ट्र में गिरिनगर से निकलती सुवर्नरेखा (सुवर्णसुकता) नदी पर निर्मित सुदर्शन झील को भारत के आरम्भिक मानव-निर्मित झीलों में से एक माना जाता है, जिसके निर्माण-ध्वंस और पुनर्निर्माण की लोमहर्षक गाथा में लोककल्याण के लिये शासकों और तत्कालीन अभियंताओं का गहन संघर्ष परिलक्षित होता है। सुदर्शन झील का निर्माण चंद्रगुप्त मौर्य के शासन समय में उनके द्वारा नियुक्त सौराष्ट्र के  प्रान्तीय शासक पुष्यगुप्त ने कराया था। कालांतर में सम्राट अशोक के राज्यपाल तुशाष्प ने इस बांध तथा उससे जनित जलाशय में से सिंचन हेतु नहरें निकाली। अब चंद्रगुप्त मौर्य के समय का उल्लेख है तो महाविद्वान चाणक्य की चर्चा के बिना बात अधूरी रह जायेगी। यह सुख़द है कि चाणक्य ने अर्थशास्त्र में बांध के निर्माण, सिंचन व्यवस्था और कृषि पर बहुत विस्तार से लिखा है। उन्होंने अर्थशास्त्र में जल संग्रहण के लिए सेतु, नहर के लिए परिवह, जलाशय के लिए तातक, नदी जल के लिए नद्ययतना, नदी पर बनने वाले बांध के लिए नदिनीबंधयतन, इस बांध से निकली नहर के लिए निबंधयतन शब्दों का प्रयोग किया है। कौटिल्य ने लिखा है- आधारपरिवाहकेद्रोपभोग्या जिसका अर्थ है “जलागार की नहरों से सिंचित खेतों का उपयोग।” ये उदाहरण संक्षेप में इसलिये जिससे कि हम आश्वस्त हो सकें कि मौर्य शासन समय मे भी बांध निर्माण या कि नहर बना कर सिंचन करने के तरीकों की जानकारी थी।

 

मौर्यकाल मे निर्मित जिस सुदर्शन बांध के ध्वंस की हम बात करने जा रहे है यह घटना अतिवर्षा के कारण शक शासक रुद्रदामन के कालखण्ड मे हुई थी। रुद्रदामन के विषय में विस्तृत जानकारी उनके शक संवत 72 अर्थात वर्ष 150 ई. के जूनागढ अभिलेख से प्राप्त होती है। जूनागढ़ अभिलेख से ही हमें जानकारी मिलती है कि यह कोई साधारण तूफान नहीं था, वर्णन है कि जल से भरे मेघों ने सम्पूर्ण धरती को आच्छादित कर दिया। इतनी घनघोर वर्षा हुई कि सारी धरती ही मानो महासागर में परिवर्तित हो गई हो। इस समय उरजयत अथवा गिरनार पर्वत से निकलने वाली सुवर्नासिकता, प्लासीनी तथा अन्य स्थानीय नदियों में विकराल बाढ़ आ गयी। प्रलंयकारी तूफान जिसने पर्वतों को, वृक्षों को, कंगूरों को, किनारों को, दो मंजिलें भवनों को, प्रवेश द्वारों को, ऊंचाई पर बने प्रासादों को और सभी आश्रयों को ध्वस्त कर दिया, इससे लग रहा था मानो सृष्टि का अंत होने जा रहा है। शिलाएं, वृक्ष, झाड़ी और लताएं चारों ओर अस्त व्यस्त हो गई थीं, इस तूफान ने 420 क्यूबिट लम्बे और चौड़े तथा 75 क्यूबिट गहरे हिस्से को उखाड़ दिया, जिससे जलाशय का सम्पूर्ण जल बाहर आ गया और जब तूफान थमा तब झील बालूका राशि वाली मरूभूमि के सद्श्य दिखलाई पड़ने लगी। यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि यदि हम भारत में बांध निर्माण का इतिहास देखें तो हमें चोल राजा करिकाल का संदर्भ भी मिलता है तो मालवा के राजा भोज का भी तथापि किसी बांध के टूटने और उससे होने वाली तबाही का संदर्भ रुद्रदामन के कालखण्ड का ही प्राप्त होता है।

 

विनाश के आयाम इतने भयंकर थे कि रुद्रदामन के सलाहकारों और प्रधान अधिकारियों ने यह सोच लिया था कि अब सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण संभव नहीं है। रुद्रदामन इस विकट घड़ी में उठ खड़े हुए और उन्होंने जलाशय के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। पुनर्निर्माण कार्य अनर्ता और सुराष्ट्र के प्रान्तीय प्रशासक अमात्य सुविशाखा की देखरेख में शुरू हुआ। सुविशाखा का आज भी एक योग्य अधिकारी के रूप में दृष्टांत दिया जाता है। रुद्रदामन के आदेश पर निर्मित की जा रही झील की लम्बाई व चौड़ाई को, सभी ओर से, अत्यंत अल्प समय में, पहले से तीन गुणा अधिक मजबूत बनाया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि राज्य द्वारा इस बांध के  पुनर्निर्माण के लिए अपनी प्रजा पर किसी तरह का कोई कर नहीं थोपा गया था। अभिलेख स्पष्ट करता है कि महाक्षत्रप रुद्रदामन ने यह कार्य जनहित में एवं धर्म के पालनार्थ करवाया था। कौटिल्य का हमने उदाहरण लिया था जिन्होंने तटबंध के लिए सेतु शब्द का प्रयोग किया है। सेतु और सेतुबंधन शब्द कई संस्कृत ग्रंथों में भी मिलते हैं। रुद्रदमन के शिलालेख में इन शब्दों के अतिरिक्त जो दूसरे शब्द प्रयोग किए गए हैं वे हैं- नहर के लिए ‘प्रणाली’, कचरा बंधारा के लिए ‘परिवह’, झील से गाद की सफाई के लिए ‘मिधविधान’। इन सभी शब्दों की परिभाषायें हमें तत्कालीन बांध निर्माण के तरीकों से परिचित कराती हैं। सुदर्शन झील के निर्माण के लिये आरम्भ में तटबंधों को मिट्टी से बनाया गया जिनके दोनों तरफ पत्थर लगाए गए थे।

 

कहते हैं कि समय अपने आपको दोहराता है। अब समय था गुप्त शासक स्कंदगुप्त विक्रमादित्य स्कन्दगुप्त (455-467 ई.) का। एकबार पुन:, वर्ष 455 ई. में अर्त्याधिक वर्षा होने के कारण सुदर्शन झील के तटबंध नष्ट हो गये। यह समय था जब स्कंदगुप्त ने सिंहासन सम्भाला ही था। सम्राट स्कंदगुप्त ने सौराष्ट्र के प्रान्तकाल पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालिन को इस झील के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। चक्रपालिन की देखरेख में सुदर्शन झील के तटबंधों को सुधारा गया। कार्य के पूर्ण होने के बाद सम्राट ने पिता की स्मृति में झील के किनारे भव्य विष्णुमंदिर का निर्माण करवाया। अपने तटबंधों के नष्ट हो जाने के कारण सुदर्शन झील सम्भवत: आठवीं या नौंवी ई. में प्रयोग के लिये उपयुक्त नहीं रही थी तथापि इस जलाशय का जीवन लगभग एक हजार वर्षो का रहा है। यह विवरण हमें इतिहास ही नहीं प्राचीन पर्यावरण और अभियांत्रिकी जैसे संदर्भों से भी परिचित कराता है।

 

राजीव रंजन प्रसाद

उप महाप्रबंधक (पर्यावरण)

Category:  Environment


 |    January 27, 2023 |   0 comment

Pandas of the plant world

The IUCN web link on orchids describes orchids as a charismatic group of plants called the “pandas of the plant world“. The intriguing description traces its roots to Stephen Jay Gould’s essay “The Panda’s Thumb”, which is a popular scientific essay that takes cue from the lesser-known work of Charles Darwin “On the Various Contrivances by Which British and Foreign Orchids are Fertilized by Insects (1862)”. Gould quotes Darwin, “…continued self-fertilization is a poor strategy for long-term survival, since offspring carry only the genes of their single parent, and populations do not maintain enough variation for evolutionary flexibility in the face of environmental change. Thus, plants bearing flowers with both male and female parts usually evolve mechanisms to ensure cross-pollination. Orchids have formed an alliance with insects. They have evolved an astonishing variety of “contrivances” to attract insects, guarantee that sticky pollen adheres to their visitor, and ensure that the attached pollen comes in contact with female parts of the next orchid visited by the insect.”

Gould quotes Darwin’s interpretations of evolutionary adaptations in orchids to elaborate his observations and hypotheses about the adaptations in Giant Panda. The essay is an interesting treatise on the contrivances by which the Giant Panda’s sixth thumb is an evolutionary adaptation of its wrist bone for holding the bamboo shoots which it chews for ten to twelve hours each day.

 

Pandas have widespread popular appeal and are recognized all over the world as harmless, attractive animals. Ecologically, pandas who feed predominantly on bamboo shoots have always been threatened due to habitat loss. IUCN has taken many initiatives to conserve this beautiful and charming animal, and categorize as ENDANGERED in their red list categories (now vulnerable). Panda is also the conservation symbol of IUCN. In a similar way, orchids are a group of plants which attracted the imaginations of the colonizers even as they colonized several tropical regions. The vanilla orchid easily gained a prominent place in western cuisine, while several others became widely popular in interior decorations due to their lingering fragrance as well as long shelf life. They were transported from the tropics to the drawing rooms of Europe. A charismatic species among the plants, they require abundant rain and specific fungal associations to grow and thrive. Like the giant panda, orchids are also considered threatened due to habitat destruction, and presently all orchids are listed under CITES appendix.

 

In India, Arunachal Pradesh, Assam, Meghalaya, Mizoram & Sikkim have orchids as their state flower. Likewise, many countries including Brazil, Belize, Colombia, Costa Rica, Guatemela, Honduras, Panama, Singapore and Venezuela have orchids as their national flower.

 

Orchids are the second largest plant family. There are at least 25,000 species of orchids.  8% of all flowering plants are orchids. They are nearly cosmopolitan, but the majority of species are found in the tropics and subtropics, ranging from sea level to almost 5000 m in nearly all environments except open water and true desert. In some places they are dominant, particularly in nutrient-deficient habitats. Over half of the species are epiphytic (an organism that grows on the surface of a plant and derives its moisture and nutrients from the air, rain or from debris accumulating around it). Orchids’ life cycle is complex, often involving a fungal partner (mycorrhiza) at least for germination, and specific pollinators. Therefore, they offer much in the study of the interactions of plants, fungi and animals. Many are extremely sensitive to environmental changes, a subject of increasing concern at present. Phylogenic and evolutionary relationships have been studied intensively using DNA sequences and other data, leading to a much increased knowledge of the family. It is a family of considerable economic importance, particularly in horticulture and floristry, but also increasingly in the pharmaceutical and fragrance industries. Orchids are a major source of income in some countries.

Orchids have highly evolved flowers adapted to ensure cross pollination by insects. The floral structure of an orchid flower consists of highly modified mostly brightly coloured sepals, petals and highly modified stamens (male reproductive organ) and pistil (female reproductive organ). Such modifications create an amazing diversity in shape, size and colours of flowers. The plant body of orchids also exhibit a high degree of diversity.

 

The seeds of orchids are formed in pods and every single pod contains innumerable number of dust like microscopic seeds which are light in weight and devoid of food reserves. When the ripened pods bursts and opens, the seeds are dispersed by the wind. Out of the millions of seeds, only a few germinate. As the seeds are devoid of food reserves, they invariably need an associate to supplement the nutrition required for germination. Orchid seeds germinate with the help of specific fungal associations, the mycorrhizae providing nutrients required for germination. These fungi are mostly saprotrophic in nature. The types of orchids and their symbiotic fungi vary depending on the environmental niches they occupy, whether terrestrial or growing on other plants (epiphytes). The seedlings that germinate, grow and reach flowering stage in a period ranging from 3 to 8 years.

Orchids have different kinds of roots depending upon their habitat. Terrestrial orchids have fleshy roots with root hairs, which in some species form tuber-like structures that store food. Epiphytic orchids have two types of roots, clinging roots and aerial roots. Clinging roots help in attaching to the host plant while aerial roots which are fleshy with thick layer of greyish cells called ‘Velamen tissue’, helps absorb moisture from the air.

 

The morphologically diverse orchids exhibit various different shapes due to which they are known by various popular names. A few of them with particular shapes of flowers and leaves and matching popular names are depicted below:

 

Cylindrical Vanda

Species name: Papilionanthe teres

Desc: A giant orchid with cylindrical cactus-like fleshy leaves growing to a height of about 5m forming large bunches on tall trees. Handsome flowers measuring upto 10 cm across in a bunch of 2-6 flowers.

Location of picture: Orchidarium, Subansiri Lower HEP, NHPC Ltd., Gerukamukh

 

Moth orchid

Species name: Phalaenopsis

Desc: One of the most popular orchids amongst hobbyists and commercial growers due to the long lasting exquisitely beautiful flowers. The flowers are characterized by the lip with forked appendage at the base.

Location of picture: Orchidarium, Subansiri Lower HEP, NHPC Ltd., Gerukamukh

 

Aloe-leafed cymbidium

Species name: Cymbidium aloifolium

Desc: Orchids with stout pseudo bulbs and linear-oblong fleshy leaves measuring 30-40 cm long. The inflorescence is pendulous, long, bearing several flowers. Flowers are 4cm across in size.

Location of picture: Orchidarium, Subansiri Lower HEP, NHPC Ltd., Gerukamukh

 

Comb Trudelia

Species name: Vanda cristata

Desc: In nature, the stem has a twisted appearance. Inflorescence short, 1-2 flowered, sometimes more. Flowers about 4-5cm across, yellowish green, lip yellow with purple lines.

Location of picture: Orchidarium, Subansiri Lower HEP, NHPC Ltd., Gerukamukh

 

Sharry baby orchid (Ruby doll)

Species name: Oncidium

Desc: Plant consists of pseudobulbs growing tightly to each other, inflorescence straight, strongly branched,with a very large number of small flowers, red to dark red coloration, ranging in size from 2-4cm, have a very pleasant chocolate fragrance with varying degrees of intensity.

Location of picture: Orchid Research Centre, Tipi, Ar. Pradesh.

 

Dancing lady

Species name: Oncidium

Desc: Oncidium is a very large and diverse genus of orchids and are commonly found in florist arrangements. A hybrid, they were named “Dancing-lady orchids” for their dance-like fluttering in the wind.

Location of picture: Orchid Research Centre, Tipi, Arunachal Pradesh.

 

Pineapple orchid

Species name: Dendrobium densiflorum

Desc: An orchid which is easily identified by the densely packed clusters of yellow flowers hanging down, looking like pineapples. Flowers are 3.5-4 cm across, densely packed into large dense hanging clusters. When in bud, the clusters looks like cones.

Location of picture: State Orchid Nursery, Sessa, Arunachal Pradesh

 

Foxtail orchid (Kopou phool)

Species name: Rhynchostylis retusa

Desc: The state flower of Assam and Arunachal Pradesh, the Kopou phool are borne on densely flowered blooming racemes originating from the leaf axils. The fragrant flowers consist of white sepals and petals with pink blotches and a pink flower lip.

Location of picture: Orchidarium, Subansiri Lower HEP, NHPC Ltd., Gerukamukh

 

Fragrant Fox Brush orchid

Species name: Aerides odorata

Desc: A large to giant sized, epiphytic orchid, with very stout, drooping, branching stems. The flowers are highly fragrant and blooms on sharply pendant cylindric inflorescence that arise out of the leaf axils.

Location of picture: Orchidarium, Subansiri Lower HEP, NHPC Ltd., Gerukamukh

 

 Anitha Joy,

 Senior Manager (Environment),

Subansiri Lower Project.   

  

References:

  1. Hegde, Sadanand N. Orchids of Arunachal Pradesh. Forest Department Arunachal Pradesh, 1984, 2017 (Second Revised Edition).
  2. Gould, Stephen Jay. The panda’s thumb: More reflections in natural history. WW Norton & company, 2010.
  3. Darwin, Charles. The various contrivances by which orchids are fertilised by insects. John Murray, 1877.
  4. https://www.iucn.org/fr/node/24682
  5. https://stateoftheworldsplants.org/2017/report/SOTWP2017_1_naming_and_counting_the_worlds_plant_families.pdf
  6. http://nv-os.org/index.php/the-potting-bench/orchids-cared-for-by-nvos-members/item/504-oncidium-sharry-baby
  7. https://www.nparks.gov.sg/florafaunaweb/flora
  8. https://www.flowersofindia.net/
  9. https://en.wikipedia.org/

 

Photo courtesy: Anitha Joy, Abhijit Purushan, Subi K Joy, Hemam Dhanashyam Singh

Category:  Environment


 |    January 27, 2023 |   0 comment

अंक की तस्वीर

नववर्ष के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम

एनएचपीसी में सांस्कृतिक कार्यक्रम के माध्यम से नववर्ष 2023 हर्षोल्लास और सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का आयोजन ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ पहल के तहत किया गया था। इस अवसर पर श्री वाई.के. चौबे, निदेशक (तकनीकी/कार्मिक), एनएचपीसी;  मुख्य अतिथि थे। इस अवसर पर श्री आर.पी. गोयल, निदेशक (वित्त),  एनएचपीसी; सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी, कर्मचारियों और VC के माध्यम से परियोजनाओ/ पावर स्टेशनों मे स्थित एनएचपीसी के अन्य कार्मिक भी सम्मलित हुए। कार्यक्रम का विशेष आकर्षण कथक केंद्र, नई दिल्ली के कलाकारों द्वारा भव्य सांस्कृतिक प्रस्तुति हुई, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।

Category:  Environment


 |    January 27, 2023 |   0 comment

अंक की तस्वीर

महसीर मछली फार्म – मछियाल, जिला मंडी, हिमाचल प्रदेश

 

पार्वती-II (800 MW) पावर स्टेशन, हिमाचल प्रदेश के पर्यावरण प्रबंधन योजना के तहत मछियाल, जिला मंडी, हिमाचल प्रदेश में महसीर फार्म को विकसित किया गया है। फार्म में उत्पादित फिंगरलिंग्स का उपयोग ब्यास नदी और पार्वती चरण- II पावर स्टेशन के जलाशय के डाला (stocking) जाता है।

Category:  Environment


 |    October 25, 2022 |   0 comment

पर्यावरण वार्ता (अंक 19 )

दीपपर्व की मैं एनएचपीसी परिवार, सभी हितधारकों तथा इस ब्लॉग के सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामना प्रदान करता हूँ।

 

भारतीय संस्कृति का सबसे प्रमुख आयाम है जोड़ना। यही दीपावली पर्व भी परिलक्षित करता है। ‘दीप’ अर्थात प्रकाशमान दीपक और ‘आवली’ का अर्थ होता है ‘पंक्ति’। प्रकाश और पंक्ति दोनों ही ऐसे प्रतीक हैं जो राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया मे लोक-भागीदारी को सुनिश्चित करते हैं। अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व प्रतीक है कि अंधेरा कितना ही गहरा हो छोटे छोटे दीपकों की पाँति इससे लड़ने मे सक्षम है हमें केवल एकजुट होना है, दीप से दीप जलाना है। यही कारण है कि दीपावली का पर्व हमें कर्मठता का संदेश देने मे भी समर्थ है जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री और कवि श्री अटल बिहारी बाजपेयी की कविता की पंक्तियाँ भी हैं –

हम पड़ाव को समझे मंज़िल,

लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल,

वतर्मान के मोहजाल में,

आने वाला कल न भुलाएँ;

आओ फिर से दिया जलाएँ।

 

 जल से विद्युत का निर्माण करते हुए एनएचपीसी इस देश को प्रकाशमान और गतिशील करने में अपनी पूरी क्षमता और निष्ठा से लगी हुई है। हमें इस बात का गर्व है कि आज जब देश का कोना- कोना और गाँव-गाँव सम्पूर्ण विद्युतीकरण के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा मे अग्रसर है तो इस कार्य में हमारी संस्था द्वारा किया गया महत्वपूर्ण योगदान भी एक महत्व रखता है। विद्युत है तो प्रगति का प्रकाश है, इसलिए हम गर्व के साथ यह मानते हैं कि हमारा उद्यम, प्रत्येक दिवस को दीपावली की तरह मनाने के लिए है।

 

पुनश्च हार्दिक शुभकामनाएँ।

(वी. आर. श्रीवास्तव)

कार्यपालक निदेशक

पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग

 

Image source: https://www.bbcgoodfood.com/howto/guide/what-is-diwali-and-how-is-it-celebrated

Category:  Environment


 |    October 25, 2022 |   0 comment

E-WASTE: How dangerous is it?

Electronic waste or e-waste is essentially old, end-of-life electrical and electronic equipment (EEE) that users have discarded. There exists three types of e-waste: White that include refrigerators, washing machines and air-conditioners; Brown that includes televisions, cameras and recorders and Grey that includes computers, laptops, cell phones and printers. Toxic substances like lead, mercury, lithium, cadmium, plastics, nickel, barium, beryllium, chromium etc. form an integral part of e-waste. All of the aforementioned metals have dangerous effects on brain, nervous, blood, reproductive, respiratory and urinary systems.

It is a fact that a tonne of electronic waste can give us hundred times more gold than a tonne of gold ore. It is worth mentioning that today; India is facing a herculean task of disposing its discarded mobiles, fridges, TV sets and computers filled with toxic substances. It is estimated that India has over one billion devices in active use. The average life cycle of phones is about three to four years. In addition, India is today the world’s third-largest producer of e-waste-at 3.2 million tonnes, after China (10 million tonnes) and the USA (6.9 million tonnes). It is estimated that the graph of production of e-waste will be an exponential one. Conclusively, it can be inferred that somewhere there exists a planet-sized dump.

If such waste is not disposed properly, toxic materials will contaminate soil, water, air and will find their way into our food chain. In view of this, modern societies have developed the concept of circular economy, dedicated to reusing, recycling and regeneration. ‘Urban mining’- a name coined by Japanese mineralogist Hideo Nanjyo has become globally popular. The growing volume of electronic waste is overwhelming the informal kabadi industry and threatening our health and environment.

But the challenges of e-waste management can also be a huge opportunity in doing start-ups.  Therefore, lets ponder about it.

-by

Shreya

Deputy Manager (Environment), Corporate Office, NHPC

 

References:

  • India Today- E-waste mounting threat- September 12, 2022.
  • E-waste management in India- CSE report, 2020.
Category:  Environment


 |    October 25, 2022 |   0 comment

कुकरौन्धा (ब्लूमिया लैसेरा)- एक औषधीय पौधा विशेषत: बवासीर निदानक

आजकल की व्यस्त दिनचर्या में मनुष्य अपने खान-पान पर ध्यान नहीं दे रहा है । परिणामस्वरूप वह अनेक व्याधियों से ग्रसित होता जा रहा है। हालाँकि आज के वैज्ञानिक युग में रोगों के निदान के लिए आधुनिक रासायनिक दवाएं एवं शल्य चिकित्साएँ उपलब्ध हैं, किन्तु फिर भी पादप औषधियाँ अनेक रोगों के निदान के लिए कारगर सिद्ध होती हैं क्योंकि वह या तो परंपरा पर आधारित हैं या युगों से जनजातियों एवं लोकमान्यताओं द्वारा प्रयोग में लाई जा रही हैं । ऐसी ही एक औषधीय पादप जाति कुकरौन्धा (ब्लूमिया लैसेरा) है जो अनेक रोगों के निदान के लिए प्रचलित एवं कारगर है । विशेषतः उत्तर एवं मध्य भारत में इसका उपयोग बवासीर के निदान के लिए अत्यधिक प्रचलित है ।

 

विशेषता-

कुकरौन्धा एस्टेरेसी कुल का सदस्य है । यह उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार तथा ओडिशा में बहुतायत से मिलता है । यह एकवर्षीय, उच्छीर्ष पौधा है जिसकी ऊँचाई 30 से 80 सेमी होती है । तने पर घने ग्रंथिल रोम होते हैं । पत्तियां सरल, एकांतरक्रम में व्यवस्थित तथा दीर्घवृतीय होती हैं । इनके किनारे अच्छिन्न अथवा पालित, शीर्ष निशिताग्र तथा पालियाँ अनियमित रूप से ऋकची-दन्तुर होती हैं । ये 3 से 13 सेमी लंबी तथा 1.2 से 5 सेमी तक चौड़ी हो सकती हैं तथा इनकी दोनों सतहों पर ग्रंथिल रोम पाए जाते हैं । कुकरौन्धा में मुण्डक पुष्पक्रम मिलता है जिनका व्यास लगभग 3.5 सेमी होता है तथा ये अक्षीय एवं शीर्षस्थ समूहों में व्यवस्थित होते हैं । रश्मिपुष्पक लगभग 3 मिमी लंबे एवं बिम्बपुष्पक 3.5 मिमी लंबे होते हैं । एकीन लगभग 0.5 मिमी लंबे तथा रेखीय होते हैं ।

 

रोगों में प्रयोग/ औषधीय उपयोग-

बवासीर में प्रयोग के लिए इसकी पत्तियों को छाँव में सुखाकर पीस लेते हैं । पिसी हुई पत्तियों को कागज में लपेटकर सिगरेट की तरह बनाकर भोजन के उपरांत पीने से बवासीर में आराम मिलता है । साथ ही साथ इस सूखे चूर्ण को भोजन के उपरांत पानी के साथ निगलने से भी लाभ होता है । दूसरी ओर इसकी ताजी पत्तियों को पीसकर बनाए गए लेप को कपड़े के टुकड़े में लगाकर गुदा पर रखने से भी लाभ मिलता है ।

 

इसके अतिरिक्त यह पौधा कई अन्य रोगों के लिए भी उपयोगी है । इसकी पत्तियों को पीसकर लेप को कटी-छिली त्वचा तथा घावों पर लगाने से लाभ मिलता है । इसकी पत्तियों का रस आंतों में पाए जाने वाले कृमियों को बाहर निकालने में भी उपयोगी पाया गया है । साथ ही साथ पत्तियां ज्वरनाशक, प्रदाहनाशक, वायुनाशक तथा यकृत रोगों में भी लाभकारी होती हैं । उपरोक्त उपयोगों के अतिरिक्त यह पित्त एवं कफ, उदरपीड़ा, श्वेतप्रदर, फेफड़ों की सूजन, हैजा तथा श्लेष्मा के प्रदाह में भी लाभकारी होता है ।

— द्वारा

डॉ. अजय कुमार झा

वरिष्ठ प्रबन्धक (पर्यावरण), तीस्ता-VI जलविद्युत परियोजना

Category:  Environment


 |    October 25, 2022 |   0 comment

Sangai Brow-Antlered Deer: Some Important Facts

Common Name: Sangai, Brow Antlered Deer, Dancing Deer

Scientific Name: Rucervus eldii

 

About:  It is the state animal of Manipur.  Sangai is a medium-sized deer, with uniquely distinctive antlers, with extremely long brow tine, which form the main beam. The forward protruding beam appears to come out from the eyebrow. This signifies its name, brow-antlered deer. The animal’s coat is dark reddish brown during winter months and it bears a much lighter shade in summer. The height is about 115-130cm (Males), 90-100cm (females) and weighs about 90-125kg (Male), 60-80 kg (Female). It is native to Cambodia, China, India, Laos and Myanmar.

 

Habitat: Its habitat is restricted to the marshy wetland of Keibal Lamjao over the floating biomass in Loktak Lake which is locally called ‘phumdi’. The habitat of the sangai is now protected as the ‘Keibul Lamjao National Park’. Keibal Lamjao is the only floating National Park in India. Sangai often balances itself while walking on the floating biomass which looks as if it is dancing on the green grassland and hence the name of ‘dancing deer’ of Manipur has come into existence.

 

Status: State animal of Manipur, Schedule-1 of Wildlife (Protection) Act, 1972, Endangered on IUCN Red List.

 

Sangai festival:  It is an annual cultural festival organised by Manipur Tourism Department every year from 21st to 30th November. Many editions of this Festival have been celebrated over the past few years with the name of ‘Tourism Festival’, however since 2010 this has been renamed as the Sangai Festival to emphasize the uniqueness of this shy and gentle brow-antlered deer.

 

-by

Angelo Jaya Sheeli Domathoti

Manager (Environment), Corporate Office, Faridabad

 

Reference: https://www.drishtiias.com,

https://en.wikipedia.org/wiki/Main_Page, https://www.wwfindia.org/about_wwf/priority_species/threatened_species/brow_antlered_deer/

 

Category:  Environment


 |    October 25, 2022 |   0 comment

Great Indian Bustard- State Bird of Rajasthan

Great Indian bustard, (Ardeotis nigriceps) is a large bird of   bustard family (Otididae) and is one of the heaviest flying birds in the world. Once, a contender for National Bird of India; now is the State Bird of Rajasthan and is locally called Godawan. It was once a contender for National Bird of India. Its habitat, spreads across grasslands of the states of Rajasthan, Gurjarat, Maharashtra, Andhra Pradesh, Karnataka and Madhya Pradesh.

 

Great Indian bustards are tall birds with long legs and a long neck; the tallest individuals stand up to 1.2 metres (4 feet) and can weigh upto 15 kg. Males and females are distinguished by the colour of their feathers. In males, the feathers on the top of the head are black with whitish neck, breast, and underparts, along with brown wings highlighted by black and gray markings. Males are characterized by a small, narrow band of black feathers across the breast. In contrast, females possess a smaller black crown on the top of the head, and the black breast band is either discontinuous or absent.

 

Great Indian bustards are omnivores and feed on any palatable food available in their immediate surroundings; e.g. arthropods, worms, small mammals, small reptiles, insects, seeds and peanuts. Adult great Indian bustards have few natural enemies. The only animals that have been observed to attack them are gray wolves (Canis lupus) and the chicks are preyed upon by jackals and dogs. Eggs are sometimes stolen from nests by foxes, mongooses, monitor lizards, etc. But the greatest threat to the eggs are from trampling by grazing cows, sheep, etc.

 

In 1994, the Great Indian bustard was listed as an endangered species on the International Union for Conservation of Nature’s (IUCN) Red List of ‘Threatened Species’. By 2011, however, the population decline was so severe that the IUCN reclassified the species as critically endangered, which is a matter of concern. The population since then is on decline and now less than 120 birds occurs in the state of Rajasthan. The Project Great Indian Bustard, was launched by Chief Minister of Rajasthan on 5th of June 2013 which has brought back focuses on conservation of the bird especially within the Desert National Park, Jaisalmer, Rajasthan. However, it has not seen much success so far mainly due to loss of habitat i.e. grassland in the state and damage to the eggs of this critically endangered species.

 

-by

Dr. Anuradha Bajpayee

Group Senior Manager (Environment), corporate office, NHPC

 

Reference:

  1. http://www.edgeofexistence.org/species/great-indian-bustard/
  2. https://www.iucnredlist.org/species/22691932/134188105
  3. https://en.wikipedia.org/wiki/Great_Indian_bustard
  4. https://economictimes.indiatimes.com/news/india/the-great-indian-bustard-once-in-the-race-to-become-national-bird-now-struggling-for-existence/articleshow/94730994.cms
Category:  Environment


 |    October 25, 2022 |   0 comment

कविता : निर्बाध हूँ मैं

निर्बाध हूँ मैं……..

उमड़ने दो कि हूं मैं नदी

इस ओर से उस छोर तक

बहुत ही लंबा सफर है मेरा

मैं हूँ बेकल-मनचली—

सागर से मिलने की तमन्ना लिए

बह रही हूं अनवरत

उस सदी से इस सदी

निर्बाध हूँ मैं, ना बांधो मुझे

उमड़ने दो कि हूं मैं नदी

 

निर्बाध हूं मैं……..

बहने दो कि हूं मैं हवा

पेड़ों-पहाड़ों-बादलों

झीलों-झरनों-बागों में

भरने दो मुझे चौकड़ी

मैं हूं मनमौजी-आवारा

तंग गलियों में है घुटता दम मेरा

न रंग है, न रूप ही

बन जाती हूं वैसी

जैसी जब जहां जिसने है रखा

निर्बाध हूं मैं, न रोको मुझे

बहने दो कि हूं मैं हवा

 

निर्बाध हूं मैं …….

लहराने दो कि हूं मैं सागर

घमंडी-गुस्सैल-विकराल

शांत-अथाह-उदार

न रखता किसी का दिया कुछ

कर देता हूं उसको जिसका है वापस

बादलों का संदेशा भेज पर्वतों को

बरसा कर बदरिया प्रेम-रस

भर देता हूँ धरती का गागर

निर्बाध हूं मैं, न छेड़ो मुझे

लहराने दो कि हूं मैं सागर

 

निर्बाध हूं मैं …..

खिलने दो कि हूं मैं प्रकृति

मुझसे तुम हो, तुमसे मैं

मैं जीवनदायी -पालनहारी

रहने दो मुझे वैसी ही

जैसी मैं सदियों से थी रही

निर्बाध हूं मैं, न टोको मुझे

खिलने दो कि हूं मैं प्रकृति

 

 

पूजा सुन्डी
उप प्रबंधक (पर्यावरण)
पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग
Category:  Environment


 |    October 25, 2022 |   2 comments

Miyawaki forests

Rapid urbanization, population growth and rural-to-urban migration, especially in fast-developing economies such as India has resulted in a fast decline in forest cover and green space in urban centers. In India the reduction in tree cover is alarming in cities which impacts human health and ecosystem and therefore immediate and long-lasting steps are needed to restore the green cover in most of metropolitan cities.

 

Unfortunately, the growth of trees and forests is a relatively slow process; while the need of the hour is relatively rapid solutions. Conventional forests may take decades to centuries to grow, however, the cities are running out of time to provide cleaner air to their residents. Thus, restoration of degraded lands is a necessity in urban settings. To address the issue an innovative and (relatively) rapid method of land restoration is Miyawaki forests, named after Dr. Akira Miyawaki (a Japanese botanist).

 

This approach is based on identifying and growing native species in a given region. Non-native plant species, generally introduced for providing green cover and other purposes, due to changed nutrient and environmental requirements in urban conditions. The technique supports the growth of a dense, mixed, native forest and results in a native forest ecosystem, complete with small animals, rodents, birds, etc. The natural selection, resulting from the competition between different types of native species, creates a diversified natural forest. The method supports the growth of primarily canopy trees.

 

The Miyawaki forest is an affordable, low-tech, maintenance-free and rapid method of growing native vegetation on degraded lands. In these forests multi-layered process is followed by choose different species of plants like shrub layer (6 feet), sub-tree layer (6-12 feet), tree layer (20-40 feet) and canopy layer (above 40 feet). Further, the same plant species are not planted next to each other. Thus, dozens of native species are planted in the same area, close to each other, which ensures that the plants receive sunlight only from the top, and grow upwards than sideways. It requires very little space (a minimum of 20 square feet), plants grow ten times faster, and the forest becomes maintenance-free in three years. In order to match a natural forest system, random plantation of different types of native seedlings (with extensive root system) are randomly planted. Growth rates of a meter per year or higher are generally observed, ultimately resulting in a complete,  mixed, native forest ecosystem in a span of few years, instead of decades (to centuries)  needed by other systems of planting.

 

A number of industries and cities have successfully grown Miyawaki forests for enhancing the tree cover. In most cases, Miyawaki forests have been able to reverse the declining tree cover, provide a better environment and improve our air quality. Miyawaki forests have also been found to be fairly successful for restoration of degraded areas, spoil tips and mine dump areas.

 

The advantages of Miyawaki forests include, rapid restoration of land, development of an entire ecosystem (instead of just plants), much faster development of greenery as compared to conventional forests, minimal maintenance and care, low-cost, etc. The disadvantages include necessity to carry out detailed field surveys, identify potential native species, land availability and initial high cost for land preparation, plant procuration, planting, etc.

 

CONCLUSION

 

Forests are a necessity for their ability to supply oxygen, act as carbon-sink, provision of shade, food, among others. Yet, due to rapid urbanization, forest cover is being lost and cities are getting suffocated by pollution and poor air quality. Miyawaki forests, is a promising solution which has low maintenance needs and quick results while saving native species, which needs to be taken up for betterment of our cities. It can also be tried for restoration dumping sites, quarry sites, etc. at hydropower and other power generating units.

 

Reference:

  1. https://bengaluru.citizenmatters.in/how-to-make-mini-forest-miyawaki-method-34867
  2. https://www.sei.org/about-sei/press-room/how-the-miyawaki-method-can-transform-indian-cities/
  3. https://urban-forests.com/miyawaki-method/

Picture Reference: dste.py.gov.in

-Dr. Anuradha Bajpayee, GSM (Env), EDM Division, CO

Category:  Environment


 |    September 29, 2022 |   0 comment

अंक की तस्वीर

Van Mahotsav was started in 1950 by K.M.Munshi, the then Union Minster for Agriculture and Food to create enthusiasm among masses for forest conservation and planting trees. Thereafter, it is celebrated every year by planting saplings, awareness campaigns about benefits and protection of trees etc.

 

NHPC organized “Van Mahotsav 2022” at Faridabad on 28.09.2022 by undertaking plantation. During the event, plantation of sapling was done by Shri. R.P. Goyal, Director (Finance), NHPC, Shri Biswajit Basu, Director (Projects), NHPC, Dr. Tripta Thakur, Director General (National Power Training Institute), Independent Directors of NHPC, employees and locals. Over 100 nos. saplings of different species such as Teak, Neem, Gulmohar etc. were planted near Gate of NHPC and NPTI Office Complex, Faridabad.

Category:  Environment


 |    September 29, 2022 |   1 comment

Let’s talk about Cheetah…

Picture Source: Authors

 

‘Cheetah’ is a popular portrayal in the folklores across India and adjoining countries since time immemorial. The mammal with their unique physical attributes like long and slender limbs, flexible spine helps them attain high speeds in pursuit of prey. Unfortunately, famously regarded as the “fastest” amongst mammals are immensingly becoming part of reports, records than their habitats. Finally ‘Cheetah’ got the distinction of being declared as ‘extinct’ in the year 1952 in India.

 

Presence of such large carnivores in natural habitats vis. a vis. their importance in ecosystem functions called for concerted efforts worldwide. In this context, reintroduction of ‘Cheetah’ has been recognised as a strategy for conservation. Cheetah is the only large carnivore that has been extirpated, mainly by overhunting in India in historical times (Ranjitsinh and Jhala, 2010)

 

Reintroduction of Cheetah in India, a Historic Step:-

 

The project for reintroduction of the large carnivores will help them to take giant steps in the natural habitats. The action plan of Government of India focuses on bringing back country’s  extinct large mammal under which, 50 Cheetah will be introduced into various National Parks once a period of 5 years. The historical events began on 17.09.2022 when first group of 8 Cheetah (5 females and 3 males) brought from Namibia, where released into Kuno National Park, Madhya Pradesh. The inter-continental transfer of such huge animals will surely usher in a new chapter in animal conservation for restoring ecosystem services.

 

Efforts, such as in the present and future planned endeavours will go in the annals of history of Environment Conservation as a significant stride of Government of India.

 

NHPC’s Step:

 

In this context, an awareness program was organised on 15.09.2022 by Parbati-II Hydroelectric Project, NHPC for students at Government Middle School, Jhiri, Himachal Pradesh. The photographic glimpses of the awareness program are depicted as follows:

 

Reference:

  1. Ranjitsinh, M.K. & Jhala, Y.V. (2010), Assessing the Potential for reintroducing the Cheetah in India, Wildlife Trust of India & Wildlife Institute of India.
  2. https://www.bbc.com/news/world-asia-india-62899981
  3. https://cheetah.org/learn/about-cheetahs/
  4. https://www.deccanheralcom/national/north-and-central/why-was-kuno-national-park-chosen-for-indias-cheetah-reintroduction-1145900

 

– Dr. Ashis Kumar Dash, GM (Environment)

-Pratap Kumar Mallik, GSM (Environment)

-Dr. Anuradha Bajpayee, GSM (Environment)

-Manish Kumar, DM (Fisheries)

Category:  Environment


 |    September 29, 2022 |   0 comment

पांगी घाटी में एनएचपीसी का प्रवेश

Image Source: https://i.ytimg.com/vi/V8UH0TJ36lw/maxresdefault.jpg

 

पांगी घाटी : संक्षिप्त विवरण

 

हिमाचल प्रदेश के जिला चम्बा का उपमण्डल पांगी जनजातीय क्षेत्र में आता है जिसका मुख्यालय किलाड में स्थित हैI किलाड समुद्रतल से 14500 फुट की ऊंचाई पर देश के मानचित्र में 32°-33″ से 33°-19″ उत्तरी आंक्षाश तथा 76°-15″ से 77°-21″ देशान्तर रेखाश के मध्य स्थित है। पांगी घाटी समुद्रतल से 2000 से 4000 मीटर तक की ऊंचाई पर स्थित है। इस घाटी का कुल क्षेत्रफल लगभग 1601 वर्ग कि.मी. है, जिसमें से लगभग 82% क्षेत्रफल पर वन, नदियां, नाले ,बडी चट्टानें, पहाड़ इत्यादि है। शेष 18% क्षेत्र आवासीय, कृषि योग्य एवं घास के मैदान हैं । यह जनपद पहाड़ी एवं प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर है। पीर पंजाल व जांसकर की पहाड़ियों के बीच में स्थित यह मनमोहक क्षेत्र चन्द्रभागा (चिनाब) नदी के दोनों ओर फैला हुआ है।

 

पांगी घाटी बहुत सुन्दर है। ऊँची-ऊँची पहाड़ों की चोटियां के बीच में कल-कल बहती चन्द्रभागा नदी मन मोह लेती है। यह घाटी गर्मियों में जितनी रमणीय एवं चहल-पहल युक्त लगती है, सर्दियों में कड़ाके की ठंड से उतनी ही कठिन, भयावह एवं सूनी-सूनी हो जाती है।

 

यहां की अपनी अलग लोक-संस्कृति, भाषा, धर्म, प्रथाएं एवं परम्पराएं हैं। पांगी क्षेत्र का रहन-सहन, समाजिक व्यवस्था व संस्कृति समृद्ध है। यहां की विशेष पहचान इसकी ‘प्रजा प्रणाली’ है, जो वर्तमान समय में भी एक राजनीतिक एवं सामाजिक संगठन के रूप में ‘पगवाला जनजातीय समाज’ में विधमान है। इनके द्वारा लिए गए निर्णय को आज भी प्रजा के सदस्यों को मानना होता है। जनजातीय क्षेत्र पांगी के विकास के लिए पांगी में 1986 में एकलौती प्रशासन प्रणाली हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा शुरू की गई थी।

 

परिवहन मार्ग :

 

पांगी घाटी तक पहुंचने के लिए तीन रास्ते हैं। पहला रास्ता पठानकोट-जम्मू-उधमपुर-किश्तवाड़-गुलाबगढ़- सोहल तयारी-संसारी नाला- लुज के रास्ते लगभग 274 कि.मी. की दूरी के साथ है। किश्तवाड़ से लुज की दूरी 106 कि.मी. है जिसमें तियारी से किलाड़ तक का रास्ता अत्यंत दुर्गम है।पांगी घाटी के मुख्यालय किलाड तक पहुंचने के लिए दूसरा रास्ता कुल्लू-मनाली-अटल टनल-सिस्सू-तांदी-उदयपुर-तिन्दी-रौहली-शौर-पूर्वी चेरी-वगलो-किलाड है। पार्वती-l परियोजना से डुगर की दूरी 270 कि.मी. है। मनाली से उदयपुर तक बहुत अच्छी सड़क है परन्तु उदयपुर से किलाड-लुज की 95 कि.मी. की सड़क कच्ची, घुमावदार, पथरीली तथा खतरनाक मोड़ वाली है। मनाली से किलाड के लिए प्रतिदिन एचआरटीसी की एक बस आती-जाती है जो लगभग 14-15 घण्टे में यह दूरी तय करती है।पांगी घाटी के लिए तीसरा रास्ता चम्बा-तीसा- बैरास्यूल बांध(एनएचपीसी)-कालावन-सतरूडी-साचपास से होते हुए किलाड पहुंच जाता है। यह दूरी 170 कि.मी. है तथा यह सड़क साल में 4-5 महीने खुली रहती है।इसी रास्ते में एनएचपीसी की परियोजना बैरास्यूल का बांध स्थल आता है और यहां से 74 कि.मी. पर किलाड व किलाड  से 10 कि.मी. की दूरी पर डुगर परियोजना है। किलाड / डुगर मनाली के रास्ते साल में 8 महीने तथा जम्मू व कश्मीर की तरफ से 12 महीने सड़क परिवहन से जुड़ा रहता है। यहां के लिए भून्तर/ पठानकोट हवाई अड्डा सबसे नजदीक है। इन सड़को में अनुभवी ड्राईवर ही होने चाहिए व 4×4 गियर गाड़ियों से सफर करना चाहिए।

 

त्योहार एवं मान्यताएं :

 

पांगी घाटी के मेले एवं त्यौहार किलाड के ‘फुल्याच’ मेले से आरम्भ होते हैं जो कि प्रायः अक्तूबर मास के मध्य में होता है। यह यहां सर्दियों के आरम्भ होने का समय होता है। फसलें इत्यादि काट ली जाती हैं, सर्दियों के लिए पशुओं का चारा इकट्ठा कर लिया जाता है, आगामी ठंडे छः महीनों के लिए राशन इत्यादि जमा कर लिया जाता है।

 

सर्द ऋतु में पांगी घाटी में उत्तरायण का त्यौहार होता है, जबकि निचले क्षेत्रों में लोहड़ी का पर्व मनाया जाता है। माघ महीने की पूर्णमासी की शाम को किलाड़ क्षेत्र में ‘चज्गी’ या ‘रखडल’ का त्यौहार मनाया जाता है। इसके बाद की अमावस्या से पांगी घाटी का सबसे लंबी अवधि तक चलने वाला त्यौहार पडईद या जुकारू’ आरम्भ हो जाता है। इस समय घाटी में भारी मात्रा में बर्फ होती है और लोगों को इस त्यौहार का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है। इस त्यौहार का मुख्य उद्देश्य है कि भारी बर्फ-बारी में आप स्वस्थ्य हैं । अपने रिश्तेदारों से मिलना-जुलना, खाने पर बुलाना और पूराने गिले-शिकवे भूल कर नई शुरूआत करना है। यहां की भाषा में ‘तगडा असा’ या ‘तकडा अस्ता’ अर्थात् आप स्वस्थ हैं, कहा जाता है।

 

पांगी घाटी में 55 राजस्व गांव है । इसमें 5 गांव बौद्ध धर्म को मानने वाले है जिन्हें भोट-जनजातीय समुदाय कहा जाता है तथा यहां के लोग भटौरी कहलाते हैं । इस प्रकार पांगी में 5 भटौरी – सुराल भटौरी, हुण्डाण भटौरी, परमार भटौरी, हिलुढुवान भटौरी व चस्क-भटौरी हैं। चस्क भटौरी सबसे ऊंची (13000 फुट) चस्क गांव है। चम्बा जिला का सबसे ऊंचाई वाला मतदान केन्द्र इसी गांव में है।

 

पांगी घाटी में स्थित माता मिन्धल वासनी का प्रसिद्ध मन्दिर हिमाचल प्रदेश के चम्बा व लाहौल तथा केंद्रशासित जम्मू व कश्मीर के भद्रवाह व पॉडर क्षेत्र के लोगों के लिए मान्यता का प्रतीक है। यहां 12 भट्ट खानदान के ब्राहाण निवास करते थे इसलिए इस स्थान को मिन्धल भट्टवास के नाम से जाना जाता है। माता के आशीर्वाद से आज भी एक बैल से खेती की जाती है। आजादी के पूर्व इस मन्दिर का प्रबंधन चम्बा राजा के पास था। अब इस मन्दिर की कमेटी पांगी एसडीएम के अधीन है जो कि मन्दिर का रख-रखाव, पूजा आदि का हिसाब रखती है।

 

वर्ष 2008 में हुण्डाण भटौरी गांव की चरागाह शिकलधार के लम्वरानू नामक स्थान पर चरवाहों को शिवलिंग व गणेश के दर्शन हुए । पांगी घाटी देवभूमि है यहां प्रत्येक गांव में मन्दिर है और उनकी अपनी ही मान्यता है। इसी तरह डुगर परियोजना के पास सीतला माता व नाग देवता का मन्दिर है। सीतला माता यहां गुफा से प्रकट हुई है और बाहर भव्य मन्दिर है। इसी तरह किलाड में हणसुन नाग, करयास में वलीन वासिनी, करयूणी में तिलाकुण्ड माता व सिद्ध बाबा मन्दिर, फिन्डरू गांव के पास मुख्य सड़क पर भीम का पैर, पुर्थी गांव में माता मलासनी का मन्दिर मुख्य हैं।

 

पांगी घाटी में एनएचपीसी

 

एनएचपीसी द्वारा पांगी घाटी में चन्द्रभागा नदी से बिजली बनाने का कार्य प्रस्तावित है । डुगर जल विद्युत के नाम से 500 मेगावाट की यह परियोजना 25.09.2019 को एनएचपीसी को हिमाचल सरकार से प्राप्त हुई है।डुगर जल विद्युत परियोजना हिमाचल प्रदेश में चम्बा जिला के उपमण्डल पांगी में हिमाचल तथा केंद्रशासित जम्मू व कश्मीर की सीमा पर स्थित है। यहां से 5 कि.मी. की दूरी पर संसारी नाला से केंद्रशासित जम्मू व कश्मीर राज्य की सीमा शुरू होती है। पांगी के मुख्यालय किलाड से 10 किलोमीटर दूर, लुज नामक स्थान में चन्द्रभागा नदी पर डुगर परियोजना का बांध स्थल व पावर हाऊस प्रस्तावित है।

 

चन्द्रभागा वह नदी है जो लाहौल स्पीति के तादी नामक स्थान पर चन्द्रा तथा भागा दो नदियों के मिलने से बनती है। पांगी घाटी में इसे चन्द्रभागा कहते हैं तथा जम्मू-कश्मीर के पॉडर इलाके में प्रवेश करने के बाद इसे चिनाब के नाम से जाना जाता है। यह नदी संकरी व गहरी घाटियों से होती हुई बहती है। गहरी घाटियां होने के कारण इंसानी पहुंच के योग्य नहीं है। नदी के पहुंच से दूर होने के कारण नदी के पानी का प्रयोग न तो पीने के लिए होता है और न ही सिंचाई के लिए काम में लाया जाता है । पहले इस नदी का मुख्य उपयोग नदी की धारा पर लकड़ी के ढुलाई के लिए किया जाता था।

 

एनएचपीसी ने चम्बा जिला में बैरास्यूल, चमेरा, चमेरा-I  व चमेरा-II जल विद्युत परियोजनाएं बनाई हैं और पांचवी परियोजना के रूप में डुगर जल विद्युत परियोजना का निर्माण कार्य शुरू करने जा रही है। चन्द्रभागा नदी  लाहौल स्पीति व चम्बा जिला में 140 कि.मी. का सफर तय करने के बाद संसारी नाला के पास जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करती है, उसके बाद चन्द्रभागा को चिनाब के नाम से जाना जाता है तथा एनएचपीसी इस नदी पर करथई-II, किरू, क्वार, दुलहस्ती चरण-II, पकलडूल, रतले व सावलकोट परियोजनाओं का निर्माण करने जा रही है। डुगर जल विद्युत परियोजना हिमाचल प्रदेश में एनएचपीसी की अगली बड़ी 500 मेगावाट क्षमता की परियोजना है।

 

पांगी घाटी अतिसुन्दर है। यहां के लोग सीधे, सरल व मितभाषी हैं। पांगी चम्बा जिला का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है।यहां मिलने वाला सत्तू, कालाजीरा, ठांगी, तिलमिल का पानी यहां की मुख्य पहचान है।पांगी घाटी में एनएचपीसी की डुगर जलविद्युत परियोजना के बनने से पर्यटन, परिवहन संसाधन व मूलभूत ढांचों जैसे कि शिक्षा व चिकित्सा सुविधाओं में सुधार होगा जिससे इस क्षेत्र के विकास को गति मिलेगी।

 

नोट : पांगी घाटी का संक्षिप्त विवरण लेखक द्वारा व्यक्तिगत सर्वेक्षण के आधार पर प्रस्तुत किया गया है।लेखक वर्तमान में पांगी घाटी में सहायक सर्वे अधिकारी के रूप में पदस्थापित हैं

 

संदर्भ :

 

ओम प्रकाश शर्मा, सहायक सर्वे अधिकारी

डुगर जल विद्युत परियोजना

Category:  Environment


 |    September 29, 2022 |   1 comment

एनएचपीसी निगम मुख्यालय, फरीदाबाद में “विश्व पर्यावरण दिवस 2022” व “आज़ादी का अमृत महोत्सव” के अवसर पर पौधारोपण कार्यक्रम

एनएचपीसी निगम मुख्यालय, फरीदाबाद में “विश्व पर्यावरण दिवस 2022” व “आज़ादी का अमृत महोत्सव” के अवसर पर पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस वर्ष आयोजित होने वाले विश्व पर्यावरण दिवस का theme “ Only One Earth” “Living Sustainably in Harmony with Nature”  है जो  इस तथ्य पर प्रकाश डालता है कि हमारे ग्रह के सीमित प्राकृतिक संसाधनों की संरक्षण करना अति महत्वपूर्ण है। एनएचपीसी के विभिन्न परियोजनाओं में #Only One Earth के संदेश का प्रचार व प्रसार हेतु विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये गए ।

 

निगम मुख्यालय में “विश्व पर्यावरण दिवस 2022” व “आज़ादी का अमृत महोत्सव” के अवसर पर को होने वाले पौधारोपण कार्यक्रम का शुभारंभ दिनांक 06.06.2022 को श्री ए. के. सिंह, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, एनएचपीसी की अध्यक्षता में श्री वाई. के. चौबे, निदेशक (तकनीकी), श्री आर. पी. गोयल, निदेशक (वित्त), श्री ए. के. श्रीवास्तव, मुख्य सतर्कता अधिकारी एवं वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा पौधारोपण कर के किया गया। पौधारोपण कार्यक्रम के दौरान आम, अनार, चीकू, नींबू, अमरूद इत्यादि फलदार पौधे लगाए गए। आज़ादी का अमृत महोत्सव के अवसर पर एनएचपीसी निगम मुख्यालय तथा विभिन्न परियोजनाओं में 6-9 जून, 2022 के दरम्यान 1500 पौधे विभिन्न प्रजातियों के लगाए गए।

Category:  Environment


 |    September 29, 2022 |   0 comment

पर्यावरण वार्ता (अंक : 18)

इन दिनो, हिंदी पखवाड़ा मनाया जा रहा है, मैं इस ब्लॉग के सभी पाठकों को इस अवसर पर शुभकामनायें देता हूँ। निस्संदेह स्वाधीनतापूर्व के कवि भारतेंदु ने जो कहा था, वह आज भी प्रासंगिक है कि “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल”। अपनी भाषा में हम अधिक स्पष्टता से अभिव्यक्त होते हैं, यही कारण है कि हिंदी हमारे गौरव की भाषा है। गर्व इसलिये भी चूंकि आज हिंदी विश्व में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है।  14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया । इसी दिवस संविधान सभा ने भी एक मत से ‘हिंदी भाषा को देवनागरी लिपि में’ भारत की कार्यकारी और राजभाषा का दर्जा प्रदान किया।  26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान की धारा 343 (1) में हिन्दी को संघ की राजभाषा और देवनागरी लिपि के प्रयोग करने के विचार को मंजूरी दी गई।  चूंकि यह यात्रा 14 सितंबर की तिथि से ऐतिहासिक सह-सम्बंध रखती है, इसी दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

 

यह प्रश्न उठता है कि विविधताओं भरे देश में हिंदी की आवश्यकता क्या है? वस्तुत: पराधीनता से पूर्ण मुक्ति तभी सम्भव है जब हमारी प्राथमिकता में अपनी मिट्टी, अपने लोग और अपनी भाषा हो जायेगी। आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में पलट कर देखें तो पायेंगे कि स्वाधीनता के 75 वर्ष उपरांत भी हमें हिंदी पखवाड़ा आयोजित करना पड़ता है, और अपनी ही भाषा की महत्ता और उसके प्रयोग की आवश्यकता के प्रति लोगों को जागरूक कराना पड़ता है। लोकमान्य तिलक ने कहा था कि “स्वाधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है”, यह बात केवल भूभाग के लिये नहीं थी बल्कि इस कथन की समग्र भावना में “हिंदी भाषा” को अधिकार दिलाने की चेष्टा भी अंतर्निहित है। आईये इस हिंदी पखवाड़े में अपने कार्यों, अपने व्यवहार और अपने वार्तालाप में तलाश करें कि भाषाई तौर पर कितने स्वतंत्र हो सके हैं हम?  कब हम हिन्दी भाषा के प्रयोग पर गौरवान्वित हो सकेंगे?

 

मुझे यह बताते हुए गर्व का अनुभव हो रहा है कि निगम में लगभग सौ प्रतिशत कार्य हिंदी में हो रहे हैं। पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग के विभागाध्यक्ष के रूप में यह भी जोड़ना चाहूंगा कि विभाग ने हिंदी में सौ प्रतिशत कार्यालयीन कार्य के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है। पुनः “हिंदी हैं हम वतन हैं, हिंदोस्तां हमारा।”

 

वी आर श्रीवास्तव

कार्यपालक निदेशक

पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग

Source- image: edudwar.co
Category:  Environment


 |    September 29, 2022 |   1 comment

रेडरमाचेरा ज़ाइलोकार्पा (गरुण) – एक संकटापन्न औषधीय वृक्ष

मनुष्यों द्वारा आत्महत्या सर्वविदित है, परंतु क्या कभी किसी ने सर्पों द्वारा आत्महत्या के विषय में सुना है? सुनने में यह बात भले ही आश्चर्यजनक लगे परंतु छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर जिले के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के निकट रहने वाले आदिवासियों का कथन है कि दरभा घाट के निकट स्थित गरुड़ वृक्ष के नीचे सर्प आत्महत्या करने जाते हैं तथा उन्होंने अनेक सर्पों को उस वृक्ष के नीचे मृत अवस्था में देखा भी है । इस वृक्ष का नाम भगवान विष्णु के वाहन ‘गरुण’ के नाम पर इसीलिए रखा गया है क्योंकि गरुण का मुख्य भोजन सर्प ही हैं । अनुमानतः इसी कारण से आदिवासी इस वृक्ष को सर्पनाशक मानते हैं ।

 

इस वृक्ष का वानस्पतिक नाम रेडरमाचेरा ज़ाइलोकार्पा (Radermachera xylocarpa) है, जो बिगनोनिएसी (Bignoniaceae)  परिवार (family) का सदस्य है । इस वृक्ष के वंश (Genus) का नामकरण नीदरलैंड के एक विख्यात वनस्पतिज्ञ जैकोबस कॉर्नेलिअस मैथिअस रेडरमाचेर (1741-1783) के ऊपर किया गया है । इस वंश की 16 प्रजातियां दक्षिण-पूर्व एशिया तथा मलेशिया में एवं 3 प्रजातियां भारत में पाई जाती हैं । मध्य भारत में इसकी केवल एक प्रजाति रेडरमाचेरा ज़ाइलोकार्पा (गरुण) ही पाई जाती है । प्रकाशित तथ्यों के आधार पर मध्य भारत में इस वृक्ष का वितरण सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं, मंडला, बालाघाट, बस्तर, अमरकंटक, बांधवगढ़, जबलपुर, बिलासपुर, रायगढ़ तथा सरगुजा में है ।

 

वानस्पतिक दृष्टिकोण से रेडरमाचेरा ज़ाइलोकार्पा एक पर्णपाती वृक्ष है, जिसकी ऊंचाई 15-20 मीटर तक होती है । इसकी द्विपिक्षाकार असमपिक्षकी संयुक्त पत्तियां 50-80 सेंटीमीटर लंबी होती हैं । प्रत्येक पत्ती में 5-9 पिक्षकाएं होती हैं, जो आकार में दीर्घवृत्ताकार से अंडाकार तथा 5-10 सेंटीमीटर लंबी व 3-5 सेंटीमीटर चौड़ी होती हैं । पिक्षकाओं का शीर्ष निशिताग्र अथवा लम्बाग्र, किनारे अच्छिन्न अथवा ऋकची तथा सत्य चिकनी होती है । पुष्प अंडाकार तथा उच्छीर्ष, रोमयुक्त समूहों में पाए जाते हैं एवं बड़े तथा सुगंधित होते हैं । बाह्यदलपुंज घंटाकार लगभग 1 सेंटीमीटर लंबा तथा 3-5 पालियों में विभक्त होता है । इसकी बाहरी सतह रोमयुक्त होती है । दलपुंज सफेद रंग का व पीली आभायुक्त तथा लगभग 3 सेंटीमीटर लंबा होता है । इसका फल सम्पुट या कैप्सूल होता है जो 1 मीटर तक लंबा, काष्ठीय तथा कुछ वक्राकार होता है । इस वृक्ष के पुष्पन तथा फल देने का समय अप्रैल से फरवरी के मध्य होता है ।

 

मध्य भारत (बस्तर, अमरकंटक व सरगुजा) के गोंड आदिवासी फल के साथ ही साथ जड़ों एवं तने की छाल के रस का भी सर्पदंश के उपचार में उपयोग करते हैं । सर्पदंश के अतिरिक्त इस वृक्ष का उपयोग कुछ अन्य रोगों के उपचार में भी किया जाता है । गोंड आदिवासी तने की छाल के हल्के गर्म रस का शरीर दर्द के उपचार में प्रयोग करते हैं । बैगा आदिवासी तने की छाल के रस को दही के साथ मिलाकर मासिक धर्म की अनियमितताओं को दूर करने के लिए देते हैं । बिछिया तथा धनवार आदिवासी पत्तियों के रस को ज्वर के उपचार में लाभकारी मानते हैं । बेघरा शिकारी इस वृक्ष के फल के चूर्ण को हल्के गर्म सरसों के तेल के साथ मिलाकर बनाए हुए लेप को चर्म रोग, गठिया तथा घावों पर लगाते हैं । चूंकि आदिवासी क्षेत्रों में सर्पदंश एक सामान्य घटना है, अतः आदिवासी छाल तथा फलों को एकत्र करके अपने पास रखते हैं । पर्यवेक्षणों से विदित हुआ है कि वृक्ष की संपूर्ण छाल उतार ली जाती है । साथ ही साथ आदिवासी कच्चे फलों को भी एकत्र करते हैं तथा इनका स्थानीय साप्ताहिक बाजारों में 5-10 रुपये प्रति फल की दर से औषधि के रूप में विक्रय करते हैं ।

 

मध्य भारत के क्षेत्रों में क्योंकि इस फल के वृक्ष के फलों को पकने के पहले ही तोड़ लिया जाता है, इसलिए वृक्षों का पुनरुत्पादन रुक जाता है । यही कारण है कि इसकी संख्या निरंतर घटती जा रही है तथा एक स्थान पर इसके कुछ ही सदस्य मिलते हैं । वास्तविकता यह है कि यह वृक्ष अपने प्राकृतिक आवास में जीवन के लिए संघर्षरत है एवं संकटापन्न होने की दिशा में अग्रसर है । यदि इसकी छाल एवं फलों का अति दोहन इसी प्रकार जारी रहा तो निकट भविष्य में यह मध्य भारत से विलुप्त हो जाएगा ।

 

संदर्भ :

  • http://tropical.theferns.info/image.php?id=Radermachera+xylocarpa

  • http://www.flowersofindia.net/catalog/slides/Padri%20html

चित्र सन्दर्भ : http://tropical.theferns.info/image.php?id=Radermachera+xylocarpa

 

-अजय कुमार झा, वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

तीस्ता VI जलविद्युत परियोजना

Category:  Environment


 |    September 29, 2022 |   0 comment

पर्यावरण वार्ता (अंक 17)

पर्यावरण के सिद्धांतों को जीवन में आत्मसात करना आवश्यक है, इस सम्बन्ध में महात्मा गाँधी अनुकरणीय हैं। एक संत, एक युगप्रवर्तक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में हम उन्हें जानते हैं परंतु एक पर्यावरण चिंतक के रूप में भी उनकी अनिवार्य रूप से चर्चा होनी चाहिये। विचार कीजिये कि पहनावे में खादी का प्रयोग, दार्शनिकता में अहिन्सा के तत्व तथा जीवन शैली में स्वच्छता का अनुसरण, क्या पर्यावरण संरक्षण के मूल सिद्धांत नहीं हैं ? गाँधी जी मानते हैं कि प्रकृति हमें पहनने-खाने का इतना कुछ देती है कि किसी लोभ के लिये उसका दोहन अनुचित है। यह धरती, इसमें बसने वाले प्रत्येक पेड़ पौधे और जीवजंतु की है, साथ ही जो गंदगी अथवा प्रदूषण जिसने फैलाया है उसको ही स्वच्छ करना होगा। इन तीन बिंदुओं पर ध्यान पूर्वक विचार करें तो आज पर्यावरण प्रिय जीवन शैली अपनाने के जो विचार हैं, सतत विकास की जो अवधारणा है एवं ‘पॉल्यूटर पेज़’ से जुड़ी नियमावलियाँ हैं, सब कुछ महात्मा गाँधी की विचार प्रक्रिया से उत्पन्न जान पड़ता है। उनका प्रसिद्ध कथन इसीलिये बार-बार वैशविक मंचों से उद्धरित भी किया जाता है कि प्रकृति सभी मनुष्यों की आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है, उनके लालच को नहीं। “ 2 अक्टूबर को जब हम महात्मा गाँधी की जयंती मनाते हैं तब उनका सूत्रवाक्य विस्मृत कर देते हैं, उन्होंने कहा था कि “मेरा जीवन ही मेरा संदेश है”।

 

 

महात्मा गाँधी के जीवन दर्शन से हो कर, हमें अपने कार्यों की समुचित विवेचना करनी चाहिये। भारत एक ग्रामवासी देश कहा जाता है; हमारे सभी उद्यम गाँवों के विकास के लक्ष्य के साथ होने चाहिये। एनएचपीसी द्वारा यह प्रयास किया जाता है कि अपनी परियोजनाओं के लिये पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन करते हुए परियोजना प्रभावित परिवारों के हित में योजनाओं को निर्मित किया जाये। जलविद्युत परियोजनाओं को वैसे भी ‘पर्यावरण प्रिय’ माना जाता है। हाल के दौर में जिस तरह का ईंधन संकट ब्रिटेन में देखा गया अथवा कोयला की अनुपलब्धता के कारण विद्युत संकट चीन में देखा जा रहा है, ऐसे में किसी भी देश की दूरगामी रणनीति गैरपारम्परिक ऊर्जास्त्रोतों की ओर लौटना ही हो सकती है। प्रकृति ने हमें धूप और पानी प्रचुरता में दिया है जिनका समुचित प्रयोग राष्ट्र को अपनी ईंधन व ऊर्जा आवश्यकताओं के दृष्टिगत आत्मनिर्भर बना सकता है। एनएचपीसी ने न केवल जल अपितु अब सौर ऊर्जा उत्पादन की दिशा में अपने मजबूत कदम बढ़ा दिये हैं। महात्मा गाँधी के प्रकृति के साथ चलने का मंत्र और विकास की उनकी परिभाषा को एनएचपीसी ने अपने योजना निर्माण और प्रतिपादन में आत्मसात किया है। मेरा एनएचपीसी पर्यावरण ब्लॉग के सभी पाठकों से यह आग्रह होगा कि महात्मा गाँधी से प्रेरित हो कर अपनी जीवनशैली में पर्यावरण से जुड़ी सोच, समझ को अवश्य विकसित करें।

 

 

वी आर श्रीवास्तव

कार्यपालक निदेशक

पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग

 

 

Image source : https://www.downtoearth.org.in/news/lifestyle/gandhi-at-150-the-pilgrim-s-progress-66997
Category:  Environment


 |    October 21, 2021 |   1 comment

अंक की तस्वीर

एनएचपीसी के 510 मेगावाट तीस्ता-V पावर स्टेशन, सिक्किम को इंटरनेशनल हाइड्रोपावर एसोसिएशन (IHA) से मिला ‘ब्लू प्लैनेट प्राइज़’

 

श्री ए.के. सिंह, सीएमडी, एनएचपीसी और श्री बाई.के. चौबे, निदेशक (तकनीकी), एनएचपीसी और अन्य वरिष्ठ अधिकारीगण तीस्ता V पावर स्टेशन को मिले आईएनए- ब्लू प्लैनेट प्राइज’ ट्रॉफी के साथ

 

एनएचपीसी के 510 मेगावाट तीस्ता-V पावर स्टेशन जो कि हिमालयी राज्य सिक्किम में स्थित है,  को 120 देशों में संचालित लंदन स्थित गैर लाभकारी सदस्यता संघ इंटरनेशनल हाइड्रोपावर एसोसिएशन (आईएचए) द्वारा प्रतिष्ठित ‘ब्लू प्लेनेट प्राइज’ से सम्मानित किया गया है। एनएचपीसी के स्वामित्व वाले इस पावर स्टेशन का निर्माण एनएचपीसी द्वारा किया गया है और संचालन भी एनएचपीसी द्वारा किया जा रहा है। तीस्ता-V पावर स्टेशन के लिए इस पुरस्कार की घोषणा 23.09.2021 की वर्ल्ड हाइड्रोपावर कांग्रेस 2021 के दौरान की गई। यह पुरस्कार तीस्ता-V पावर स्टेशन को आईएचए के हाइड्रोपावर सस्टेनेबिलिटी असेसमेंट प्रोटोकॉल (एचएसएपी) के ऑपरेशन स्टेज टूल का उपयोग करके 2019 में आईएचए के मान्यता प्राप्त लीड असेसर्स की एक टीम द्वारा किए गए इसकी सस्टेनेबिलिटी असेसमेंट के आधार पर प्रदान किया गया।

 

इस अवसर पर बोलते हुए श्री ए.के. सिंह, सीएमडी, एनएचपीसी ने कहा, “तीस्ता-V पावर स्टेशन का सस्टेनेबिलिटी असेसमेंट हमारे संगठन के लिए सीखने का अनुभव था क्योंकि यह भारत में किया गया पहला ऐसा असेसमेंट था। इस असेसमेंट के परिणाम इस बात को विशिष्ट रूप से उजागर करते हैं कि किस प्रकार एनएचपीसी स्थानीय समुदाय सहित सभी हितधारकों को शामिल करते हुए और पर्यावरण पर प्रभाव को कम करते हुए विदयुत विकास के लिए प्रतिबद्ध है। इस पुरस्कार से मिले सम्मान से वैश्विक मंच पर एनएचपीसी की छवि में वृद्धि होगी। यह हमें सस्टेनेबेल जलविद्युत उत्पादन में उच्च मानकों को प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करेगा।”

 

आईएचए के सदस्यों में प्रमुख जलविद्युत ऑनर्स और ऑपरेटर, डेवलपर्स, डिजाइनर, आपूर्तिकर्ता और सलाहकार शामिल हैं। आईएचए ब्लू में प्लॅनेट पुरस्कार उन जलविद्युत परियोजनाओं को प्रदान किया जाता है जो सतत विकास में उत्कृष्टता प्रदर्शित करती हैं। हाइड्रोपावर सस्टेनेबिलिटी असेसमेंट प्रोटोकॉल जलविद्युत परियोजनाओं की सस्टेनेबिलिटी को मापने के लिए अग्रणी अंतर्राष्ट्रीय साधन है। यह पर्यावरणीय, सामाजिक, तकनीकी और गर्वनेंस के मानदंडों की बृहद श्रृंखला के लिए जलविद्युत परियोजना के प्रदर्शन हेतु मापदण्ड का तरीका प्रदान करता है। मूल्यांकन वस्तुनिष्ठ साक्ष्य पर आधारित होते हैं और परिणाम मानकीकृत रिपोर्ट में प्रस्तुत किए जाते हैं।

Category:  Environment


 |    October 21, 2021 |   0 comment

Global Climate Risk Index 2021

Image source : https://www.studymarathon.com/daily-news-en/global-climate-risk-index-2021/

 

The Germanwatch Global Climate Risk Index is an analysis based on one of the most reliable data sets available on the impacts of extreme weather events and associated socio-economic data, the MunichRe NatCatSERVICE.

 

The Global Climate Risk Index indicates a level of exposure and vulnerability to extreme weather events, which countries should understand as warnings in order to be prepared for more frequent and/or more severe events in the future. The index focuses on extreme weather events such as storms, floods and heat waves but does not take into account important slow-onset processes such as rising sea levels, glacier melting or ocean warming and acidification. It is based on past data and is not be used as a basis for a linear projection of future climate impacts, etc. The index analyses and ranks to what extent countries and regions have been affected by impacts of climate-related extreme weather events, their level of exposure and vulnerability.

 

The Climate Risk Index (CRI) report 2021 is the 16th edition of the annual report and has taken into account the data available from 2000 to 2019. Data from 180 countries were analyzed. The key findings of the report are as under:

 

  • Storms and their direct implications i.e. precipitation, floods and landslides, were one major cause of losses and damages in 2019. Of the ten most affected countries in 2019, six were hit by tropical cyclones.

 

  • Developing countries are particularly affected by the impacts of climate change. They are hit hardest because they are more vulnerable to the damaging effects of a hazard but have lower coping capacity. Eight out of the ten countries most affected by the quantified impacts of extreme weather events in 2019 belong to the low- to lower-middle income category. Half of them are Least Developed Countries.

 

  • Mozambique, Zimbabwe and the Bahamas were the most affected countries by the impacts of extreme weather events in 2019, followed by Japan, Malawi and the Islamic Republic of Afghanistan.

 

  • India ranked as the seventh worst-hit country in terms of climate change in 2019. In 2019, the monsoon conditions continued for a month longer than usual, with the surplus of rain causing major hardship. The floods caused by the heavy rains were responsible for deaths across 14 states in India and led to the displacement of 1.8 million people. Furthermore, with a total of eight tropical cyclones, the year 2019 was one of the most active Northern Indian Ocean cyclone seasons on record. Six of the eight cyclones intensified to become “very severe”. The worst was Cyclone Fani in May 2019 which caused widespread devastation.

 

  • Altogether, between 2000 and 2019, over 475 000 people lost their lives as a direct result of more than 11,000 extreme weather events globally and losses amounted to around US$ 2.56 trillion (in purchasing power parities).

 

  • The global COVID-19 pandemic has reiterated the fact that both risks and vulnerability are systemic and interconnected. It is therefore important to strengthen the resilience of the most vulnerable against different types of risk (climatic, geophysical, economic or health-related).

 

  • Signs of escalating climate change can no longer be ignored on any continent or in any region.

 

  • Effective climate change mitigation and adaptation is required to prevent or minimize potential damage in the self-interest of all countries worldwide.

 

Efficacy /Importance: 

The Climate Risk Index (CRI) can help to assess the vulnerability of the county to extreme climatic events. It can help countries to understand the patterns of climatic events and develop proper warning systems and management practices in order to be prepared for more frequent and/or more severe climatic events in the future. It can also help investors to assess the risks to their investments in countries due to climatic events.

 

 

– Dr. Anuradha Bajpayee,

Senior Manager (Env), CO

References:
  1. Germanwatch. Jan. 2021. GLOBAL CLIMATE RISK INDEX 2021: Who Suffers Most from Extreme Weather Events? Weather-Related Loss Events in 2019 and 2000-2019.
  2. Earth Observatory. 2019. Unusual Monsoon Season Causes Flooding in India. Available at https://earthobservatory.nasa.gov/images/145703/unusual-monsoon-season-causes-flooding-in-india
  3. The Weather Company. 2020. Throwback to a Stormy Year: A Look at the 8 North Indian Ocean Cyclones of 2019. Available at https://weather.com/en-IN/india/news/news/2020-01-03-stormy-year-8- north-indian-ocean-cyclones-2019.

 

 

Category:  Environment


 |    October 21, 2021 |   0 comment

“खज़ानों के हीरे : बावड़ी जल संचय की पारंपरिक प्रणाली”

चित्र आभार – रितुमाला गुप्ता , वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

 

प्राचीन काल से ही भारत में जल के महत्व को समझते हुए जल संरक्षण एंव प्रबंधन के कार्य किए गए हैं। मुख्य रूप से “वर्षा जल संचय” – जल संरक्षण की एक प्राचीन परंपरा है जो वर्तमान परिदृश्य में अधिक प्रासंगिक हो गयी है। जल संरक्षण और प्रबंधन तकनीकों में अंतर्निहित मूल अवधारणा यह है कि वर्षा का पानी जब भी और जहां भी गिरे उस जल का संरक्षण किया जाना चाहिए। पुरातात्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि जल संरक्षण और प्रबंधन की प्रथा, प्राचीन भारत के विज्ञान में गहराई से निहित है। प्राचीन भारत में बाढ़ और सूखा दोनों नियमित घटनाएँ थीं एवं यह एक कारण हो सकता है कि देश के हर क्षेत्र की भौगोलिक विषमताओं और सांस्कृतिक विशिष्टताओं के आधार पर पारंपरिक जल संरक्षण और प्रबंधन तकनीक उपायों का निर्माण किया गया होगा । हमारे देश के जल संरक्षण और प्रबंधन के विरासत को दर्शाने के लिए जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा वर्ष 2020 में “”भारत की तरल संपत्ति के लिए बावड़ी खानदानी ख़ज़ाने  ( http://jalshakti-dowr.gov.in/sites/default/files/eBook/eBook-Stepwell/mobile/index.html”  पुस्तिका प्रकाशित कि गयी है और बावड़ी को खानदानी ख़ज़ानों  का दर्जा दिया गया है।

 

सदियों के अनुभव के आधार पर, भारतीयों ने आने वाले शुष्क मौसमों के लिए मानसूनी जल वर्षा को सँभालने, संचित और संग्रहित करने के लिए पारंपरिक जल संरक्षण ढांचों – “बावड़ी” की संरचनाओं का निर्माण उस समय की परिस्थिति व आवश्यकता के अनुसार किया गया। “बावड़ी” – मानव निर्मित कुएँ या तालाब हैं जो जल जमा करते हैं। सूखे की अवधि के दौरान इन बावड़ियों द्वारा अलवरण जल की उपलब्धता को सुनिश्चित किया जाता था। इस पुस्तक में समस्त भारत में बनाये गए सौ से अधिक अद्वितीय और दिलचस्प पुरातत्व धरोहरों – खज़ाने के हीरों (बावड़ियों) का विवरण व उनके स्थानों के सटीक जीपीएस निर्देशांक के साथ उल्लेख किया गया है।

 

मुख्य रूप से बावड़ी, भारत के पश्चिमी एवं दक्षिण-पश्चिमी राज्यों क्रमश: राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश सहित हरियाणा और दिल्ली में स्थित है जहाँ शुष्क उष्ण जलवायु की स्थिति है। कई जल संरक्षण संरचनाएं सूक्ष्मता से विकसित की गई जो उस क्षेत्र के लिए विशिष्ट थीं एवं कलात्मक रूप से उस क्षेत्र के मौजूदा शासकों से जुड़ी हुई थीं और समय के साथसाथ बावड़ियों के साथ विभिन्न संस्कृतियों का विकास भी हुआ  था। इन पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों में से कुछ अभी भी उपयोग में हैं, हालांकि आज कम लोकप्रिय हैं। समय के साथ बावड़ी उपेक्षित व  नष्ट हो रहे है और यह समृद्ध सांस्कृतिक विरासत विलुप्त होने के कगार पर भी हैं। लगभग हर साल वर्षा के प्रतिमान में परिवर्तन होने के कारण देश में जल संचयन की पारंपरिक प्रणाली को पुनर्जीवित करने के लिए प्राचीन उपाय “बावड़ी पर्यावरण के लिए, ” प्रभावी और अनुकूल भी है ।   पुरातत्व धरोहरों – खज़ाने के हीरों (बावड़ियों)  का सम्मान एवं   पुनर्स्थापित करना हम सब की जिम्मेदारी है ।

 

रितुमाला गुप्ता , वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

 

Ref: http://jalshakti-dowr.gov.in/sites/default/files/eBook/eBook-Stepwell/mobile/index.html

Category:  Environment


 |    October 21, 2021 |   0 comment

निम्मो बाजगो पावर स्टेशन में मत्स्य प्रबंधन योजना का सफल कार्यान्वयन

चित्र आभार : लेखक

 

परिचय:

जलविद्युत परियोजनाओं ने क्षेत्र के सतत विकास में हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जलविद्युत विकास, सामाजिक व आर्थिक बेहतरी और पर्यावरण संरक्षण के साथ आता है। पर्यावरण के विभिन्न पहलुओं पर जलविद्युत के निर्माण के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है जिसमें जलीय पारिस्थितिकी भी शामिल है। यह उल्लेख करना आवश्यक है की जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के घटक जैसे मत्स्य और उसका वैज्ञानिक प्रबंधन  जलविद्युत परियोजनाओं  के पर्यावरण प्रबंधन का अभिन्न अंग है। एनएचपीसी ने पर्यावरण के प्रति हमेशा एक  जागरूक संगठन के रूप में पर्यावरण प्रबंधन योजनाओं को लगातार प्रतिबद्ध तरीके से कार्यान्वित किया है , जिसे विभिन्न मंचों पर समय-समय पर सराहा गया है। यह लेख निम्मो बाजगो पावर स्टेशन में कार्यान्वित मत्स्य प्रबंधन योजना एवं इससे प्राप्त सामाजिक लाभ पर प्रकाश डालता है।

 

क्षेत्र का विवरण:

लद्दाख का क्षेत्र एक विरोधाभास है – लद्दाख से होकर बहने वाली शक्तिशाली सिंधु नदी के बावजूद, यहां ठंडे रेगिस्तान जैसी स्थिति बनी रहती है। ज़ांस्कर और लद्दाख पर्वत शृंखला बारिश के बादलों को लद्दाख प्रवेश करने से रोकते हैं फलस्वरूप सालाना वर्षा औसतन मात्र 9 से 10 से.मी. है। सिंधु नदी मानसरोवर झील (ऊँचाई 5180 मीटर) के पास पश्चिमी तिब्बत में कैलास पर्वत श्रृंखला से निकलती है और 404 किलोमीटर की लंबाई के बाद ग्राम दमचोक के पास जम्मू और कश्मीर में प्रवेश करती है। सिंधु नदी की सहायक नदियाँ ज्यादातर स्थायी हिमखंडों, ग्लेशियरों और हिम क्षेत्रों से निकलती हैं। सिंधु नदी लद्दाख से होकर बहती है और पाकिस्तान के मैदानों में प्रवेश करती है।

 

निम्मों बाजगो पावर स्टेशन:

लद्दाख में लेह जिले के अलची गाँव के पास सिंधु नदी पर एनएचपीसी द्वारा निर्मित 45 मेगावाट का निम्मों बाजगो पावर स्टेशन, दुनिया में सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित पनबिजली परियोजना  में से एक है। यह परियोजना MSL से 10,000 फीट पर स्थित है जहाँ तापमान -30 डिग्री सेल्सियस से +40 डिग्री सेल्सियस तक बदलता है। यह परियोजना एक रन-ऑफ-रिवर  योजना है जिसके अंतर्गत नदी पर 59.0m उच्च कंक्रीट गुरुत्वाकर्षण बांध का निर्माण किया गया है। बांध के निर्माण से लगभग 19.5 किमी लंबे जलाशय का निर्माण हुआ है, जिसका क्षेत्रफल 342 हेक्टेयर है। कार्यकारी परियोजना का पूर्ण जलाशय स्तर (FRL) 3093 है। अक्तूबर, 2013 में परियोजना को सफलतापूर्वक कमिशन कर दिया गया है। तब से आज तक परियोजना लेह-लद्दाख में बिजली आपूर्ति में लगातार महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

 

बांध निर्माण से मछलियों पर प्रभाव के अध्ययन की आवश्यकता क्यूँ है ?

नदियों ने मानव उपनिवेश और उपयोग के लिए सेतु के रूप में कार्य किया है, और परिणामस्वरूप लोगों ने कई नदियों के पारिस्थितिक तंत्रों को प्रभावित किया है। बांधों के निर्माण के कारण नदियों के व्यापक फैलाव से आम तौर पर प्रवाह पैटर्न और डाउनस्ट्रीम तापमान व्यवस्थाओं में परिवर्तन होने की संभावना रहती है। परिणामस्वरूप, नदी सतह की भौतिक संरचना बदल सकती है, और जैविक समुदाय अपने खाद्य आपूर्ति और भौतिक रासायनिक वातावरण में परिवर्तन के कारण प्रभावित हो सकते हैं। इसमें सबसे अधिक प्रभावित मछलियों की वो प्रजातियाँ होती है जो प्रजनन हेतु नदी में प्रवासन (migration) करती हैं व बांध बन जाने के कारण ऊर्ध्वप्रवाह व अनुप्रवाह में प्रवास नहीं कर पाती, जिससे उनकी प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है व उनकी संख्या में गिरावट आ जाती है। नतीजन, जलीय पारिस्थितिकी तंत्र भी प्रभावित होने के लिए बाध्य है, अतः यह अति महत्वपूर्ण है कि बांध के निर्माण से पहले प्रस्तावित परियोजना क्षेत्र के आसपास के क्षेत्रों में नदी और उसकी सहायक नदियों की लिमोनोलॉजिकल (limnological) विशेषताओं का अध्ययन किया जाए ताकि जलीय जीवों पर बांध के संभावित प्रभावों को समझा जा सके और नदी में मछलियों व वनस्पतियों पर प्रभावों को कम करने के लिए प्रबंधन योजनाओं को प्रस्तावित किया जाए।

 

सिंधु नदी की जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर परियोजना निर्माण से संभावित प्रभावों का मूल्यांकन:

इस संबंध में, Centre of Research for Development, (CoRD), कश्मीर विश्वविद्यालय द्वारा अक्तूबर, 2004 में परियोजना हेतु पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) व पर्यावरण प्रबंधन योजना (EMP) तैयार किया गया है। ईआईए अध्ययन में सिंधु नदी के प्रासंगिक भाग की जलीय पारिस्थितिकी का विस्तृत अध्ययन किया गया है।

 

  • जलीय वनस्पति: ईआईए अध्धयन के दौरान मछलियों की प्रजातियों के साथ साथ विभिन्न साइटों से कुल 29 फाइटोप्लांकटन प्रजातियों को दर्ज किया गया था। इनमें 14 बेसिलिरिओफाईसी, 10 क्लोरोफाईसी और 5 सियानोफाईसी के थे। सिंधु और उसकी सहायक नदियों में फाइटोप्लांकटन की तुलना में फाइटोबेन्थोस प्रजातियों को काफी अधिक संख्या में पाया गया। प्लवक और बनथिक दोनों समुदायों में प्लवकवादी समूह जैसे यूग्लीनोफाईसी (Euglenophyceae), क्राइसोफाईसी (Chrysophyceae) और ज़ैंथोफाईसी ( Xanthophyceae ) पूरी तरह से अनुपस्थित पाये गए थे।

 

  • जलीय जीव: माइक्रो – अकशेरूकीय (Macro-invertebrates) , सूक्ष्म – उपभोक्ताओं और मछलियों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का गठन करते हैं और एक जलीय प्रणाली में डेट्राइटस आधारित मत्स्य की सफलता का निर्धारण भी करते हैं। फाइलम आर्थोपोडा को दो वर्गों – इंसेक्टा और एम्फीपोड़ा द्वारा दर्शाया गया है। इन कीट द्वारा पूरे वर्ष भर सभी नमूना स्थलों पर मैक्रो-इनवर्टेब्रेट समुदाय के प्रमुख भाग का गठन किया गया । हेमिप्टेरा ( Hemiptera ) और डिप्टेरा ( Diptera ) द्वारा कीटों के प्रमुख भाग का गठन किया गया। यह जलीय वनस्पति व जलीय जीव ही पानी में मछलियों का प्राकृतिक भोजन होते हैं इसलिए इनका अध्ययन भी आवश्यक है क्यूंकी इनकी संख्या में गिरावट प्राकृतिक पर्यावरण में मछलियों की उत्तरजीविता को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।

 

  • सिंधु नदी में मत्स्य विविधता: ईआईए सर्वेक्षण के दौरान सिंधु और इसकी सहायक नदियों से एकत्र की गई आठ मछली प्रजातियां पायी गयी थीं: साइजोथोरैक्स प्लाजियोस्टोमस (Schizothorax plagiostomus), साइजोथोरैक्स लैबियाटस (Schizothorax labiatus), साइजोथोरैक्स प्रोगैस्टस (Schizothorax progastus), टायकोंबारबस कोनिरोस्ट्रिस ( Ptychobarbus conirostris ), डिप्टीचस मैक्युलेट्स (Diptychus maculates) (साइप्रिनिडे/Cyprinidae), ट्रिपलोफिसा स्टॉलिकजैक (Triplophysa stoliczkae) (बैलीटोरिडा/Balitoridae) और ग्लाइप्टोस्टेरनन रेटिकुलटम (Glyptosternum reticulatum) (सेसोरिडा/Sisoridae) । सिंधु और उसकी सहायक नदियों से अब तक रिपोर्ट की गई मछलियों की कुल संख्या 15 है। परियोजना क्षेत्र के संग्रह स्थलों से एकत्रित मछलियाँ सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के विभिन्न हिस्सों में व्यापक रूप से वितरित है। साइजोथोरैक्स और टायकोंबारबस लद्दाख की नदी की सच्ची प्रजातियाँ हैं, जो टरबिड  (turbid) जल में निवास करती हैं, जबकि डिप्टीचस स्वच्छ बड़ी धाराओं में निवास करती है।

 

 

जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभावों का प्रबंधन/शमन :

EMP में बांध के सभी संभावित प्रभावों को नियंत्रित करने या शमन के उद्धेश्य से अध्यायवार प्रबंधन व्यवस्थाओं का विस्तृत उल्लेख किया गया है।एक नदी के मत्स्य विविधता पर प्रभाव को कम करने के लिए आमतौर पर कई उपाय किए जाते हैं। उदाहरण के लिए,  मछली के ऊर्ध्वप्रवाह व अनुप्रवाह प्रवास के लिए बांध में विभिन्न प्रकार के फिशवेज (मछली के लिए रास्ता) प्रदान किए जा सकते हैं। हालांकि, वर्तमान बांध की ऊंचाई को ध्यान में रखते हुए ‘मछली की सीढ़ी’ (फिश लैडर) प्रभावित मछली को कोई राहत प्रदान नहीं कर सकता। अतः एक अन्य उपाय जो मछली को बांध के ऊपर और नीचे जाने में मदद कर सकता है, वह है “मछली बायपास” का प्रावधान। हालांकि, सिंधु की स्थानीय स्थलाकृति मछली बाईपास के प्रावधान को लगभग असंभव और अव्यवहार्य बनाती है।एक तीसरा विकल्प बांध संरचना में एक मछली लिफ्ट का समावेश है। परंतु साइप्रिनिड मछली के मामले में अपने कार्य के लिए जैविक अनिश्चितता इत्यादि  इस विकल्प को भी अव्यवहार्य बनाती है। अतः प्रस्तावित किया गया कि मछली के प्रसार की तकनीक को अपनाकर निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त किया जाना चाहिए। नदी में मछलियों के बाधित प्रवासन की संभावनाओं की भरपाई के लिए जैविक और आर्थिक रूप से सबसे अच्छा विकल्प कृत्रिम हैचिंग और नदी और जलाशय की निरंतर बहाली का विकल्प प्रतीत होता है। इसलिए, परियोजना क्षेत्र में मछली हैचरी बनाने की सिफारिश को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा मंजूर की  गयी ।

 

 

परियोजना में मत्स्य प्रबंधन योजना का कार्यान्वयन:  

परियोजना में सभी प्रस्तावित पर्यावरण प्रबंधन योजनाओं का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित किया गया है व इस प्रयास में समय-समय पर परियोजना की समीक्षा की जाती है। राज्य मत्स्य विभाग द्वारा निर्मित व एनएचपीसी वित्त पोषित ट्राउट फिश हैचरी का निर्माण किया गया है। यह हैचरी कश्मीर विश्वविद्यालय व राज्य मत्स्य विभाग के मत्स्य विशेषज्ञों के परामर्श से मत्स्य प्रबंधन योजना के अंतर्गत विकसित की गयी है ताकि बांध द्वारा अवरोध के कारण होने वाली मछलियों के नुकसान की भरपाई की जा सके। निम्मों बाजगो पावर स्टेशन के पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) के तहत, मत्स्य विकास योजना हेतु कुल रु.142.44 लाख राज्य मत्स्य विभाग को प्रदान किए गए थे।

 

  • हैचरी के बारे में :

ट्राउट फिश हैचरी का उद्घाटन दिनांक 04.10.2016 को किया गया। इसके बाद लेह के गांव चुकोट शम्मा हैचरी को लगभग 4 कनाल 8 माल्रा (लगभग 0.22 हेक्टेयर क्षेत्र में चेन लिंक फेंसिंग द्वारा संरक्षित) के क्षेत्र में ‘लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद’, मत्स्य विभाग, लेह (लद्दाख) द्वारा विकसित किया गया है। प्रस्तावित योजना के अनुसार हैचरी में 3 जोड़े अमेरिकी प्रकार के रेसवे शामिल हैं। पानी की आपूर्ति हेतु  डिसिल्टिंग चैंबर के साथ वॉटर इनलेट चैनल बनाए गए हैं। पानी को पास के स्ट्रीम से चैनलाइज़ किया गया है। दो मंजिला हैचरी बिल्डिंग का निर्माण किया गया है जिसमे प्रथम फ्लोर पर फीड स्टोर रूम के साथ सर्विस कक्ष बनाया गया है व भू -तल पर हैचरी कॉम्प्लेक्स बनाया गया है। मछलियों का दाना श्रीनगर में सरकारी फीड मिल से खरीदा जाता है और फिर हैचरी के फीड स्टोर पर संग्रहीत किया जाता है। क्षेत्र के ठंडे और कठोर मौसम को ध्यान में रखते हुए रेनबो ट्राउट (sp. Salmo trutta fario) प्रजाति की मछलियाँ जो कि एक शीत अनुकुल प्रजाति है, उनका हैचरी में सफलता पूर्वक प्रजनन किया जा रहा है।

 

  • सामाजिक लाभ :

निम्मों बाजगो पावर स्टेशन के अंतर्गत निर्मित यह ट्राउट हैचरी आस-पास के क्षेत्र के विकास में अपना योगदान दे रही है व सिंधु नदी की प्राक्रतिक जैव संरचना को बनाए रखने के कार्य में एक स्तंभ की तरह लगातार कार्य कर रही है। यहाँ उत्पादित बीजों को आस-पास के क्षेत्र में निजी मछली फार्मों को बेच दिया जाता है जिससे स्थानीय मछ्ली पालन को बढ़ावा मिलता है व लोगों की आय बढ़ रही है। साथ ही क्षेत्र में गुणवत्ता वाले ट्राउट के बीज आम लोगों को उपलब्ध हो जाते है, जो की पूर्व में उन्हे श्रीनगर से निर्यात करने पड़ते थे। साथ ही परियोजना बांध के डाउन स्ट्रीम व अप स्ट्रीम में भी इन मछलियों की ranching/ stocking की जाती है ताकि उनका घनत्व नदी में स्थिर किये जाने के साथ प्राकृतिक प्रजनन स्तर में आयी गिरावट को संतुलित किया जा सके।

 

निष्कर्ष:

व्यापक अर्थ में देखा जाए तो निम्मों बाजगो परियोजना से पूर्व इस क्षेत्र में बिजली की उपलब्धता न्यूनतम थी,  दैनिक जरूरतों के लिए भी डीजल जनरेटर का उपयोग किया जाता था, जिसके कारण बिजली उत्पादन की उच्च लागत आती थी व क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर भी बढ़ रहा था। निम्मो बाजगो परियोजना ने इसके आसपास के क्षेत्र में स्थित 90 से अधिक गांवों के जीवन स्तर को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बेहतर बनाया है। पूरे वर्ष विश्वसनीय एवं प्रदूषण रहित विद्युत आपूर्ति के फलस्वरूप क्षेत्र में बागवानी, मुर्गीपालन, पशुपालन,डेयरी फार्मिंग व अन्य लघु / कुटीर उद्योगों को अच्छी सहायता मिल रही है। पर्यटन और होटल उद्योग विकसित हुए हैं एवं मछ्ली पालन को बढ़ावा मिलने से लोगों की आय आशा के अनुरूप बढ़ रही है।यह उल्लेखनीय है कि जलविद्युत का वैज्ञानिक और व्यवस्थित विकास हमेशा समाज के लिए एक वरदान साबित हुआ है । 

 

 

 आशीष कुमार दाश , उप महाप्रबंधक (पर्यावरण)

 

अनुराधा बाजपेयी, वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

 

पूजा कन्याल, सहायक प्रबंधक (मत्स्य)

 

 

संदर्भ : यह लेख, पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकनों के निष्कर्षों ,प्रबंधन योजनाओं की कार्यान्वयन, निगरानी और देश में जलविद्युत के बड़े पैमाने पर विकास के अनुभव पर आधारित है।
** चित्र आभार : लेखक
 **(राजभाषा ज्योति, अंक – 38 में पूर्व प्रकाशित)                                           

 

Category:  Environment


 |    October 21, 2021 |   0 comment

Interesting Facts about Mexican Coriander / Culantro

Photo source:  Author

 

Introduction :

Mexican Coriander or Culantro (Eryngium foetidum) belongs to family Apiaceae and used as a spice as well as medicinal plant. It is a tropical perennial & annual herb and a native of Mexico and South America. It is also called long coriander, because it is used as a substitute of Coriander. Culantro is a tap-rooted biennial herb with long evenly branched roots. The oblanceolate leaves arranged spirally around the short thick stem from a basal rosette and are as much as 30 cm long and 4 cm broad. The leaf margin is serrated and each tooth of the margin contains a small yellow spine. The plant produces a well-branched cluster of flower heads in spikes forming the characteristic umbel inflorescence on a long stalk arising from the center of the leaf rosette. The calyx is green while the corolla is creamy white in color. The appearance of culantro and cilantro (i.e. coriander) are different but the leaf aromas are similar, although culantro is more pungent. Because of this aroma similarity the leaves are used interchangeably in many food preparations and are the major reason for the misnaming of one herb for the other.

 

Indian Context:

In India it is found mainly in the north-eastern states of Sikkim (bhotay dhonia), Assam (man dhonia), Manipur (awa phadigom or sha maroi), Mizoram (asbahkhawr), Tripura (bilati dhonia), Nagaland (Burma dhania). It is also used in the Andaman & Nicobar Islands and in few parts of Tamil Nadu, Kerala and Karnataka.  As per the study carried out by Tshering Tashi Lepcha, Sujata Upadhyay, S Manivannan, Karma Diki Bhutia, Laxuman Sharma and Venkata Ramana Muddarsu (2018), the comparison of various nutrient contents present in culantro and coriander is as under:

 

S.N. Parameters Culantro Coriander
1 Moisture (%) 83.33 87.9
2 Crude protein (%) 2.63 3.3
3 Reducing sugar (%) 8.26 6.5
4 Ascorbic acid (mg/100 g) 32.33 135
5 Fat (%) 0.73 4.78
6 Fibre (%) 31.50 10.40
7 Ash (%) 3.0 1.7

 

 

Uses :

The local people of Sikkim use culantro as a condiment and use it as spice, chutney as well as for medicinal purposes. As a spice they use it as a seasoning of meats, vegetables, chutneys and soup. The common part of the plant consumed is leaves.

 

Ajay Kumar Jha, Senior Manager (Environment)

Teesta VI HE Project

Category:  Environment


 |    October 21, 2021 |   0 comment

एनएचपीसी ने आयोजित किया वन महोत्सव 2021

जुलाई के पहले सप्ताह (1 से 7 जुलाई) में वनों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए वन महोत्सव मनाया जाता है। यह एक वार्षिक वृक्षारोपण उत्सव है, जिसमें पूरे देश में वृक्षारोपण अभियान चलाया जाता है। एनएचपीसी ने हरियाणा वन विभाग, फरीदाबाद के सहयोग से 9 अगस्त 2021 को वनमहोत्सव 2021′ कार्यक्रम का आयोजन पर्यावरण संवर्धन और हरीतिमा के विस्तार करने के उद्देश्य से किया। इस अवसर पर दिल्ली मथुरा राष्ट्रीय राजमार्ग पर एनएचपीसी चौक के निकट वृहद पौधारोपण का कार्यक्रम आयोजित किया गया। पौधारोपण कार्यक्रम का आरम्भ माननीय श्री ए.के. सिंह, सीएमडी, एनएचपीसी तथा श्री राज कुमार, आईएफएस, उप वनसंरक्षक, फरीदाबाद द्वारा पौधा लगा कर किया गया। कार्यक्रम में एनएचपीसी के निदेशकगण श्री एन.के.जैन, निदेशक (कार्मिक), श्री वाई.के. चौबे, निदेशक (तकनीकी) और श्री ए.पी.गोयल, निदेशक (वित्त) द्वारा पौधे लगाए गए। तत्पश्चात एनएचपीसी के अधिकारियों द्वारा पौधे लगा कर राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारों को हरा भरा किया गया। वन महोत्सव 2021 के तहत हरियाणा वन विभाग, फरीदाबाद द्वारा प्रदान किए गए विभिन्न प्रजातियों के सात सौ पौधे लगाये गये जिनमें पीपल (Ficus religiosa ), कदम्ब (Neolamarckia cadamba ) , नीम  (Azadirachta indica), करंज (Millettia pinnata ) आदि भूमि को शीघ्र हरा भरा कर देने वाले और छायादार पौधे लगाए गए हैं। आयोजन स्थल पर पौधों को लगाये जाने के पश्चात ट्री-गार्ड लगा कर उनको सुरक्षा प्रदान की गयी।

Category:  Environment


 |    October 21, 2021 |   0 comment

निगम मुख्यालय में वन महोत्सव – 2021 के उपलक्ष में पौधा वितरण

वन महोत्सव – 2021 का आयोजन दिनांक 9/08/2021 को एनएचपीसी एवं वन विभाग, फरीदबाद द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया। इसी क्रम में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता को प्रसारित करने एवं पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता निभाने के उद्देश्य से दिनांक 10/08/2021 को एनएचपीसी कार्यालय परिसर में अधिकारियों एवं कर्मचारियों के मध्य पौधों का वितरण किया गया। विभिन्न प्रजातियों के आठ सौ फलदार तथा औषधीय पौधों का वितरण किया गया, जिसमे सहजन, जामुन, गिलोय, तुलसी, अशोक, सदाबहार, अमरूद, नीम जैसे पौधों को वितरित किया गया। निगम में कार्यरत कार्मिकों ने बढ़-चढ़ कर इस अभियान में रुचि दिखाई और वितरित किये जा रहे पौधों को प्राप्त किया।

 

Category:  Environment


 |    October 21, 2021 |   0 comment

पार्बती जल विद्युत परियोजना चरण–II द्वारा वन महोत्सव 2021 के दौरान पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन

पार्बती जल विद्युत परियोजना चरण–II (800 MW), नगवाईं के कार्मिकों ने मिलकर काफी उत्साह व सक्रिय भूमिका निभाते हुये विभिन्न परियोजना स्थलों पर वन महोत्सव- 2021 कार्यक्रम के दौरान पौधारोपण किया । वन महोत्सव मनाने का मुख्य उद्देश्य आम लोगों / नागरिक को अधिक से अधिक पौधारोपण करने के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित करना है। वन महोत्सव के कार्यक्रम के दौरान हिमाचल प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, क्षेत्रीय कार्यालय, कुल्लू के अधिकारियों ने भी भाग लिया। वन महोत्सव, 2021 का कार्यक्रम कार्यालय परिसर नगवाई, आवासीय परिसर सैंज , बांध आवासीय परिसर, बरशैनी तथा टीबीएम साइट शीलागढ़ में आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम के दौरान सौ से अधिक संख्या मे स्थानीय पौधे जिनमें देवदार, सेब, अखरोट, आड़ू, अमलोक, खुबानी तथा बहूनिया आदि प्रजाति सम्मिलित हैं का पौधारोपण  किया गया।

 

Category:  Environment


 |    October 21, 2021 |   0 comment

पर्यावरण शब्दकोष (10)

Image source : https://www.istockphoto.com/photos/hydrosphere

 

 

क्र. शब्द अर्थ
1 जलमंडल

(Hydrosphere)

 

किसी ग्रह पर पानी की कुल मात्रा जलमंडल कहलाती है। इसमें सारा पानी शामिल है जो ग्रह की सतह पर, भूमिगत और हवा में मौजूद होता है। किसी ग्रह का जलमंडल तरल, वाष्प या बर्फ हो सकता है। पृथ्वी में तरल जल सतह पर महासागरों, झीलों और नदियों के रूप में मौजूद है। यह जमीन के नीचे भूजल के रूप में कुओं और जलभृतों में पाया जाता है। जलवाष्प सबसे अधिक बादलों और कोहरे के रूप में दिखाई देता है।पृथ्वी के जलमंडल का जमा हुआ भाग बर्फ से बना है जो हिमनद, बर्फ की चोटी और हिमखंड के रूप में मौजूद है। जलमंडल का जमा हुआ हिस्सा हिमावरण/हिममंडल (Cryosphere) कहलाता है।

 

 

2 जलवायु

(Climate)   

 

किसी विशेष स्थान पर लंबे समय तक वातावरण की स्थिति जलवायु कहलाती है। यह वायुमंडलीय तत्वों (और उसकी विविधताओं) का दीर्घकालिक योग है, जो कम समय में मौसम का निर्माण करता है। ये तत्व सौर विकिरण, तापमान, आर्द्रता, वर्षा, वायुमंडलीय दबाव और हवा इत्यादि हैं।

 

 

3 जलवायु अन्तराल

(Climate Lag)

 

जलवायु अन्तराल को एक देरी के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसके तहत जलवायु के कुछ पहलुवों में धीमी गति से काम करने वाले कारक (ओं) के प्रभाव के कारण परिवर्तन हो सकता है। उदाहरण के तौर पर वातावरण में एक विशेष मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड गैस का निस्तारण अपना पूर्ण प्रभाव देता है। इसमें से कुछ गैस को समुद्र द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है जो बाद में वैश्विक कार्बन चक्र के हिस्से के रूप में वायुमंडल में वापस मुक्त हो जाता है।

 

 

4 जलवायु परिवर्तन

(Climate Change)

 

जलवायु परिवर्तन वैश्विक या क्षेत्रीय जलवायु प्रणाली में एक दीर्घकालिक बदलाव है। आमतौर पर जलवायु परिवर्तन विशेष रूप से 20वीं शताब्दी के मध्य से वर्तमान तक वैश्विक तापमान में वृद्धि को संदर्भित करता है। किसी क्षेत्र की औसत जलवायु परिस्थितियों जैसे तापमान व वर्षा  में एक लंबी अवधि में परिवर्तन, जलवायु परिवर्तन कहलाता है।यह किसी स्थान पर पाए जाने वाले सामान्य मौसम में होने वाला परिवर्तन है।

 

 

5 जलवायु प्रणाली

(Climate system)

 

जलवायु प्रणाली 5 प्रमुख घटकों से युक्त अत्यधिक जटिल वैश्विक प्रणाली है जिसमें  वातावरण, महासागर,  हिमावरण/हिममंडल , भूमि की सतह तथा  जीवमंडल  शामिल हैं । इन घटकों की परस्पर क्रिया न केवल दिन-प्रतिदिन के मौसम को निर्धारित करती है, बल्कि दीर्घकालिक औसत भी निर्धारित करती है जिसे जलवायु कहते हैं।

 

 

6 जलीय पारिस्थितिकी तंत्र

(Aquatic Ecosystem)

 

पानी में रहने वाले पौधों और जीवों के समुदायों को जलीय पारिस्थितिक तंत्र के रूप में जाना जाता है। यह मुख्यत:  दो समूहों में विभाजित हैं। मीठे पानी के जलीय पारितंत्र तालाबों से लेकर मुहानाओं/ज्वारनदमुखों ( estuaries ) तक लवणों की कम सांद्रता वाले जल में पाए जाते हैं। समुद्री जलीय पारिस्थितिक तंत्र समुद्रों और महासागरों के खारे पानी में पाए जाते हैं।

 

 

7 जीवमंडल

(Biosphere)

 

जीवमंडल पृथ्वी के उन हिस्सों से बना है जहां जीवन मौजूद है। यह पेड़ों की सबसे गहरी जड़ प्रणाली से लेकर समुद्र की खाइयों के अंधेरे वातावरण तक, हरे-भरे वर्षा वनों और ऊंचे पहाड़ों की चोटियों तक फैला हुआ है। जीवमंडल एक वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र है जो जीवित जीवों और अजैविक कारकों से मिलकर बना है जिससे वे ऊर्जा और पोषक तत्व प्राप्त करते हैं।

 

 

8 जीवमंडल कॉन्फ्रेंस

(Biosphere Conference)

 

 

सन 1968 में वैश्विक जीवमंडल संरक्षण पर पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, यूनेस्को के“जैवमंडल के तर्कसंगत उपयोग और संरक्षण के लिए अंतर सरकारी सम्मेलन”, पेरिस में हुआ। यह सम्मेलन अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण राजनीति की स्थापना में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसके  परिणाम स्वरुप 1970 में यूनेस्को ने  अपना “मैन एंड द बायोस्फीयर प्रोग्राम” (एमएबी) शुरू किया ताकि विश्व के केंद्रीय पारिस्थितिक तंत्र जो “बायोस्फीयर रिजर्व” के रूप में प्रतिनिधित्व करते हैं, उन क्षेत्रों की रक्षा की जा सके ।

 

 

9 जीवाणु

( Bacteria )

जीवाणु सूक्ष्म एकल-कोशिका वाले जीव हैं जो लाखों की संख्या में हर वातावरण में, सभी जीवों के अंदर और बाहर, हर जगह मौजूद हैं। कुछ  जीवाणु  हानिकारक होते हैं लेकिन अधिकांश उपयोगी एवं कई उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। इनका उपयोग औद्योगिक और औषधीय प्रक्रियाओं में किया जाता है।

 

 

10 जीवाणु विज्ञान

(Bacteriology )

यह सूक्ष्म जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसमें जीवाणु की पहचान, अध्ययन व उत्पादन आदि से  संबंधित  अनुप्रयोगों द्वारा  दवा, कृषि, उद्योग एवं जैव प्रौद्योगिकी इत्यादि के विकास में जीवाणुओं का उपयोग किया जाता है ।

 

 

 

पूजा सुन्डी , उपप्रबंधक (पर्यावरण)
पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग 
निगम मुख्यालय

Source : Internet/Google *

  • https://www.nationalgeographic.org/encyclopedia/hydrosphere/
  • https://www.britannica.com/science/climate-meteorology
  • https://www.encyclopedia.com/environment/energy-government-and-defense-magazines/climate-lag
  • https://www.nationalgeographic.org/encyclopedia/climate-change/
  • https://energyeducation.ca/encyclopedia/Climate_system
  • https://www.encyclopedia.com/environment/energy-government-and-defense-magazines/aquatic-ecosystems
  • https://www.nationalgeographic.org/encyclopedia/biosphere/
  • https://www.environmentandsociety.org/tools/keywords/first-international-conference-biosphere-protection
  • https://www.medicalnewstoday.com/articles/157973
  • https://www.dictionary.com/browse/bacteriology

*अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवादित

 

पर्यावरण शब्दकोष (09)

 

Category:  Environment


 |    October 21, 2021 |   0 comment

अंक की तस्वीर

विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में निगम मुख्यालय के साथ-साथ विभिन्न परियोजनाओं एवं पावर स्टेशनों में पर्यावरण जागरूकता अभियान तथा पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

Category:  Environment


 |    July 5, 2021 |   0 comment

पर्यावरण वार्ता (अंक 16)

पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन के लिए संयुक्त राष्ट्र हमेशा अपने मौलिक सिद्धांत पर जोर देता है – “थिंक ग्लोबली, एक्ट लोकली” अर्थात वैश्विक सोच के साथ आंचलिक स्तर पर कार्य करना। यह सिद्धांत दार्शनिक व वैश्विक सोच के अनुरूप है। इस संदर्भ में विश्व पर्यावरण दिवस समारोह में भाग लेने का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। वर्ष 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम से शुरू होने के बाद से ही विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून को दुनिया भर में व्यापक स्तर पर मनाया जाता है। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए दीर्घकालीन जागरूकता अभियान हेतु  5 जून को एक महत्वपूर्ण दिवस के रूप में चिह्नित किया गया है। प्रथम विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन मील का पत्थर सिद्ध हुआ जिसके पश्चात न केवल भारत में अनेक हरित नीतियाँ-कानून निर्मित और प्रतिस्थापित हुए, साथ ही वैश्विक चिंताओं को समझते हुए दुनिया भर के देशों ने अपनी परिधि में पर्यावरण प्रिय प्रयासों को प्रोत्साहित किया। पर्यावरण संरक्षण के इस उत्सव ने विगत सालों में वैश्विक समुदाय की सोच और पारिस्थितिकी क्षरण संबंधी खतरों के परिणामों पर कार्य करने के तरीकों में जबरदस्त परिवर्तन किया है। विश्व पर्यावरण दिवस का वार्षिक कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित की गई विशेष थीम या विषय पर आधारित होता है। वर्ष 2021 का विषय “Restoration of Ecosystem” अर्थात पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली निश्चित रूप से इस धरती के साथ-साथ हमारी एवं भविष्य की पीढ़ी के लिए एक बेहतर जगह बनाने में व्यवहार के साथ विचार में भी बदलाव लाने वाला साबित होगा।

 

हमारा लगाया हुआ एक पेड़ भी वैश्विक परिवेश के लिये ऐसा ही योगदान है, जैसे बूंद-बूंद से घड़ा भरता है। इसे देखते हुए विश्व पर्यावरण दिवस के आयोजन की महत्ता बढ़ जाती है। पेड़-पौधे, नदियां, जंगल, जमीन, पहाड़ आदि केवल मानव जीवन के लिए ही आवश्यक नहीं अपितु उनके सह-संयोजन से हमारा पारिस्थितिक तंत्र निर्मित हुआ है। किसी पारितंत्र में कीट-पतंग से ले कर मानव तक प्रत्येक समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। इस बात को चीन के उदाहरण से समझा जाता है जहाँ एक दौर में यह मान लिया गया था कि गोरैया फसल का नुकसान करती है इसलिये अनावश्यक जीव है। इस सोच के साथ वर्ष 1958 में समूचे चीन में गोरैया को मारने का ऐसा अभियान आरम्भ हुआ कि यह नन्हा पक्षी उस परिक्षेत्र से समाप्त ही हो गया। चिड़िया अनाज के कुछ दाने अवश्य खाती थी परंतु वह उन कीट-पतंगों की जनसंख्या को भी तो नियंत्रित रखती थी जो खड़ी फसल को हानि पहुँचा सकते थे। परिणाम यह हुआ कि चीन में भयानक अकाल की स्थिति निर्मित हुई जिसमें लगभग ढाई करोड़ मनुष्यों की जान चली गयी। यह उदाहरण पारितंत्र की कार्यशैली को समझने में महत्व का है साथ ही बोध कराता है कि हमें उसके संवर्धन की आवश्यकता क्यों है।

 

एनएचपीसी ने एक पर्यावरण प्रिय संस्था के रूप में अपने परियोजना क्षेत्रों में पारितंत्र के संरक्षण, संवर्धन व पुनरुद्धार पर सतत कार्य किया है। इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में निगम मुख्यालय के साथ-साथ विभिन्न परियोजनाओं एवं पावर स्टेशनों में कोविड-19 से बचाव हेतु जारी निदेशों का कड़ाई से पालन करते हुए पर्यावरण जागरूकता अभियान तथा पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसके साथ ही सलाल पावर स्टेशन ज्योतिपुरम में दो आर्गेनिक वेस्ट कंपोस्टिंग मशीन के संचालन का उदघाटन भी किया गया। रंगित पावर स्टेशन में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर वृक्षारोपण कार्यक्रम के साथ कार्मिकों के बच्चों के लिए ऑनलाइन पेंटिंग प्रतियोगिता आयोजित कर भावी पीढ़ी को पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रोत्साहित किया गया। परियोजनाओं के निर्माण की अवधि में ही अनेक प्रबंधन योजनायें जिनमें क्षतिपूरक वनारोपण, जलागम उपचार, जैव-विविधता संरक्षण, जलाशय परिधि उपचार, संकटापन्न जीव संरक्षण आदि महत्वपूर्ण योजनायें प्रतिपादित की जाती हैं। वस्तुत: यही सतत विकास की अवधारणा भी है।

 

तापस सिन्हा

महाप्रबंधक (प्रभारी)

पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग

 

 

Image Source : https: https://www.jagran.com/lifestyle/miscellaneous-world-environment-day-2021-today-is-world-environment-day-send-these-images-quotes-wishes-messages-cards-greetings-pictures-to-your-friends-21709702.html

Category:  Environment


 |    July 5, 2021 |   0 comment

एनएचपीसी निगम मुख्यालय में विश्व पर्यावरण दिवस 2021 के आयोजन की झलकियां

एनएचपीसी लिमिटेड ने 5 जून, 2021 को एनएचपीसी आवासीय परिसर, फरीदाबाद में बड़े उत्साह के साथ ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ मनाया । श्री ए.के. सिंह, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, एनएचपीसी व अन्य वरिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी इस अवसर पर उपस्थित रहे। इस समारोह के दौरान एक विशेष वृक्षारोपण अभियान चलाया गया जिसमें एनएचपीसी कॉलोनी में पीपल, अशोक, आम, अनार, जामुन, चीकू, मौसमी, नींबू और अमरूद जैसी विभिन्न छायादार और फल देने वाली प्रजातियों के पौधे लगाए गए।

 

इस वर्ष की विश्व पर्यावरण दिवस की थीम “प्रकृति के साथ अपने संबंध पुनःस्थापित करना”, के अनुरूप, कॉलोनी क्षेत्र में लगे हुए विभिन्न पेड़ों पर पक्षी-घर और गिलहरी-घर लगाए गए। ये पक्षी-घर पक्षियों को उचित आवास और सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम हैं और उनकी संख्या बढ़ाने में भी मदद करते हैं। पर्यावरण संरक्षण के प्रति आगरुकता बढ़ाने के लिए एनएचपीसी के कर्मचारियों के बच्चों के बीच पर्यावरण अनुकूल सामग्री जैसे पर्यावरण अनुकूल सीड पेंसिल और बांस चारकोल टूथब्रश वितरित किए गए।सक्रिय कोविड 19 महामारी को ध्यान में रखते हुए सामाजिक दूरी और सुरक्षा सावधानियों के मानदंडों का विधिवत अनुपालन करते हुए सीमित संख्या में प्रतिभागियों के साथ समारोह आयोजित किए गए।

 

Category:  Environment


 |    July 5, 2021 |   0 comment

उत्तराखंड स्थित एनएचपीसी परियोजनाओं में विश्व पर्यावरण दिवस 2021 के आयोजन की झलकियां

धौलीगंगा पावर स्टेशन

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर धौलीगंगा पावर स्टेशन के तपोवन स्थित कार्यालय परिसर में पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। इस अवसर पर उपस्थित अधिकारियों एवं कर्मचारियों को संबोधित करते हुए महाप्रबंधक ने कहा कि वर्तमान में पर्यावरण का संतुलन धीरे-धीरे असंतुलित होता जा रहा है जिससे प्राणियों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो रहा है। ऐसे में हर व्यक्ति अगर सही मायने में अपना और पृथ्वी का अस्तित्व बचाना चाहता है तो सबसे पहले प्रकृति को बचाए रखने और पर्यावरण संरक्षण के लिए जनभागीदारी की आवश्यकता है।

 

 

टनकपुर पावर स्टेशन

टनकपुर पावर स्टेशन, बनबसा में विश्व पर्यावरण दिवस पौधारोपण कर मनाया गया। पावर स्टेशन के केन्द्रीय भंडार में आयोजित कार्यक्रम में विश्व पर्यावरण दिवस के इस वर्ष के विषय “इकोसिस्टम रेस्टोरेशन” पर महाप्रबंधक (प्रभारी) द्वारा प्रकृति के शोषण एवं उसके उपचार, बचाव एवं रोकथाम हेतु विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हुए सभी से पर्यावरण संरक्षण में सहयोग हेतु अपील की गई।

 

 

 

Category:  Environment


 |    July 5, 2021 |   0 comment

पश्चिम बंगाल स्थित एनएचपीसी परियोजनाओं में विश्व पर्यावरण दिवस 2021 के आयोजन की झलकियां

तीस्ता लो डैम-III एवं तीस्ता लो डैम-IV पावर स्टेशन

 

तीस्ता लो डैम-III एवं तीस्ता लो डैम-IV पावर स्टेशन में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पौधारोपण का कार्यक्रम आयोजित किया गया । परियोजना प्रमुख द्वारा पौधारोपण के पश्चात पर्यावरण दिवस की इस वर्ष की थीम ‘Ecosystem Restoration’ पर प्रेरक उद्बोधन दिया गया एवं उपस्थित अधिकारी व कर्मचारियों को सक्रिय मानव हस्तक्षेप और कारवाई द्वारा पर्यावरण में क्षतिग्रस्त या नष्ट किये गये इकोसिस्टम को संरक्षित व संवर्धित करने हेतु अनुरोध किया गया। सभी कर्मचारियों ने कोविड-19 महामारी के प्रसार को देखते हुए सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए सामाजिक दूरी के साथ मास्क पहनकर कार्यक्रम में भाग लिया।

 

Category:  Environment


 |    July 2, 2021 |   0 comment

हिमाचल प्रदेश स्थित एनएचपीसी परियोजनाओं में विश्व पर्यावरण दिवस 2021 के आयोजन की झलकियां

चमेरा-पावर स्‍टेशन

चमेरा-I पावर स्टेशन, खैरी में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पौधारोपण कार्यक्रम आयोजन किया गया। इस अवसर पर पावर स्टेशन प्रमुख महाप्रबंधक (प्रभारी) द्वारा पावर स्टेशन के प्रशासनिक भवन में गलगल का पौधा लगाकर पौधारोपण कार्यक्रम की शुरुआत की गई। महाप्रबंधक (प्रभारी) ने अपने संदेश में सभी लोगों से पर्यावरण को बचाने एवं इसको संवारने की अपील की एवं कहा कि मानव जीवन तथा मानवता को बचाने के लिए हमें सबसे पहले पर्यावरण को बचाना होगा। उन्होने इस अवसर पर सभी कार्मिकों से पर्यावरण संवर्धन हेतु नूतन विचारों के साथ पहल करने का भी आह्वान किया साथ ही साथ कूड़ा निष्पादन पर बल देते हुए इसे पर्यावरण हेतु अत्यंत आवश्यक बताया व घर पर ही जैविक व अजैविक कूड़े के पृथक्करण की पहल  को सभी से अपनाने का निवेदन किया।

 

चमेरा-II एवं चमेरा-III पावर स्‍टेशन

चमेरा-II एवं चमेरा-III पावर स्‍टेशन में “विश्व पर्यावरण दिवस 2021” के अवसर पर – पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। चमेरा-॥ पावर स्टेशन के बांध एवं टीआरटी आउटलेट परिसर में भी पौधारोपण किया गया। कालोनी परिसर में स्थित हर्बल पार्क व चमेरा-III पावर स्टेशन के नवीन प्रशासनिक भवन परिसर में पौधारोपण किया गया। पौधारोपण के दौरान विभिन्न प्रजातियों के 200 पौधे लगाए गए जिसमें अनार, खुमानी, जामुन, प्लम, नींबू आदि के पौधे सम्मिलित थे। इस अवसर पर महाप्रबंधक (प्रभारी) ने संबोधित करते हुए अनुरोध किया कि सभी कर्मचारी एक-एक पेड़ गोद लें जिससे उसकी बेहतर एवं निरंतर देखभाल हो सके। कार्यक्रम के दौरान कोविड-19 से बचाव हेतु सरकार द्वारा जारी निदेशों का कड़ाई से पालन किया गया। सभी कर्मचारियों ने उचित दूरी बनाए रखते हुए एवं मास्क पहन कर कार्यक्रम में भाग लिया।

 

पार्बती-II जल विद्युत परियोजना

पार्बती-II जल विद्युत परियोजना, नगवाईं द्वारा कोविड 19 महामारी को ध्यान में रखते हुए , पूरी सतर्कता व जागरुकता के साथ हिमाचल प्रदेश सरकार के द्वारा जारी कोविड 19 के  प्रोटोकॉल का पूर्णत: पालन करते हुए न्यूनतम कर्मचारियों की उपस्थिति में विश्व पर्यावरण दिवस 2021 का आयोजन परियोजना के नागवाईं, मानिकर्ण तथा सेंज इकाई में किया गया।। इस अवसर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रतिज्ञा, नगवाईं आवसीय परिसर मे जागरूकता अभियान तथा पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

 

पार्बती-III पावर स्टेशन

पार्बती-III पावर स्टेशन में एनएचपीसी कॉलोनी, सपांगनी व प्रशासनिक भवन में विश्व पर्यावरण दिवस 2021 मनाया गया एवं इस वर्ष की “इकोसिस्टम रिस्टोरेशन” की थीम पर वृक्षारोपण अभियान चलाया गया। वृक्षारोपण अभियान में खुमानी, आडू, पलम, नारंगी, नींबू इत्यादि के वृक्ष लगाए गए। इस दौरान महाप्रबंधक (प्रभारी) ने अधिकारियों के साथ वृक्षारोपण एवं पर्यावरण जागरूकता पर चर्चा की व पर्यावरण संरक्षण एवं पारिस्थितिक तंत्र की निरंतरता के महत्व पर प्रकाश डाला। श्री विशाल शर्मा, वरिष्ठ प्रबन्धक (पर्यावरण) द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के इतिहास व महत्व के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी गई।

 

बैरास्यूल पावर स्टेशन

विश्व पर्यावरण दिवस पर बैरास्यूल पावर स्टेशन, सुरंगानी में पौधारोपण किया गया। बैरा डैम एवं स्यूल परिसर में भी पौधारोपण किया गया। इस अवसर पर लगभग 100 पौधे लगाए गए। इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस का विषय Ecosystem Restoration है जो कि“Resetting out relation with nature”पर केंद्रित है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर महाप्रबंधक (प्रभारी),बैरास्यूल पावर स्टेशन ने सभी उपस्थित लोगों से पर्यावरण संरक्षण हेतु बढ़-चढ़ कर भाग लेने का आवाह्न एवं अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण कर पर्यावरण के प्रति जागरूक बनने के लिए आग्रह किया।

 

Category:  Environment


 |    July 2, 2021 |   0 comment

लद्दाख स्थित एनएचपीसी परियोजनाओं में विश्व पर्यावरण दिवस 2021 के आयोजन की झलकियां

 

Chutak Power Station

World Environment Day has been celebrated at Chutak power station with enthusiasm and by strictly following Covid-19 protocol. Large scale plantation drive was undertaken at Power Station. On this occasion, HOP emphasized the importance of environment and its protection. He further mentioned that NHPC is generating pollution free energy and safeguarding the environment.  Power Station has coordinated with Government Horticulture Department, Kargil for carrying Plantation drive and arranged Apricot saplings for plantation at Barrage site .

 

 

Nimoo-Bazgo Power Station

Nimoo Bazgo Power Station, Alchi celebrated World Environment Day in its township at Alchi. On this occasion, a plantation drive was conducted in Alchi Hamlet covering arid areas of Alchi and Chulung villages. Head of Power Station while addressing on the occasion emphasized that ecological imbalance is leading to global warming and as a responsible citizen we should play our role in protecting the environment for our future generation. He stressed on the need of plantation for reducing carbon concentrate in atmosphere. He also stressed to plant more trees since, oxygen percentage is already low in Ladakh area due to high altitude. It is important to adapt habits of reuse and recycle for off-setting the stress on ecosystem.

Category:  Environment


 |    July 2, 2021 |   0 comment

पूर्वोत्तर स्थित एनएचपीसी परियोजनाओं में विश्व पर्यावरण दिवस 2021 के आयोजन की झलकियां

दिबांग बहुद्देशीय परियोजना

दिबांग बहुउद्देशीय परियोजना, एनएचपीसी, रोइंग में पर्यावरण दिवस समारोह के अवसर पर परियोजना के ऑफिस परिसर में वृहद वृक्षारोपण का आयोजन किया गया। विश्व पर्यावरण दिवस, 2021 के थीम “परितंत्र का पुनरुद्धार (Ecosystem Restoration)” पर परिचर्चा करते हुए परियोजना प्रमुख द्वारा पेड़ लगाने के महत्व पर जोर दिया गया। कार्यक्रम का आयोजन सरकार द्वारा जारी कोविड-19, सामाजिक दूरी के दिशा-निर्देशों के पालन करते हुए किया गया। श्री रौशन कुमार, उप प्रबंधक (मात्स्यिकी) द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ पर्यावरण दिवस समारोह का समापन किया गया।

 

लोकतक पावर स्टेशन

लोकतक पावर स्टेशन में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पावर स्टेशन प्रमुख एवं 32 बटालियन सीआरपीएफ के द्वारा वृहत पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम के तहत लगभग एक हजार पौधे लगाए गए। कार्यक्रम के दौरान कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन किया गया।

 

तीस्ता-VI जलविद्युत परियोजना

तीस्ता-VI जलविद्युत परियोजना में विश्व पर्यावरण दिवस 2021 के अवसर पर कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन करते हुए पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। परियोजना प्रमुख ने परियोजना के प्रत्येक सदस्य को पर्यावरण तथा पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करते हुए पारिस्थितिक तंत्र संरक्षण के सरल उपायों पर चर्चा की। डॉ. अजय कुमार झा, वरिष्ठ प्रबन्धक (पर्यावरण) द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ पर्यावरण दिवस समारोह का समापन किया गया।

 

रंगित पावर स्टेशन

रंगित पावर स्टेशन में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर वृक्षारोपण कार्यक्रम के साथ कार्मिकों के बच्चों के लिए ऑनलाइन पेंटिंग प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया।महाप्रबंधक (प्रभारी) द्वारा संबोधित करते हुए कहा गया कि पर्यावरण मनुष्य के लिए पालनहार है और बिना प्रकृति के मनुष्य जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। अत: सभी कार्मिक स्वयं पर्यावरण को बचाने के प्रति सजग हो तथा अपने आस-पास के लोगों को भी जागरूक बनाएँ। इस आयोजन में कोविड-19 के संबंध में जारी दिशा-निर्देशों का पूरा ध्यान रखा गया।

 

Subansiri Lower HE Project

World Environment Day was celebrated at Subansiri Lower H. E. Project, Gerukamukh. A plantation drive was organized and banners were displayed at the project to make people aware about WED 2021 theme – “Ecosystem Restoration”. General Manager (I/C) addressed on the theme of ‘World Environment Day 2021’ wherein NHPC’s commitments towards protection of the environment  and efforts made by the project for its conservation were highlighted. Sh. Manmeet Singh Chaudhary, DGM (Env.) presented a brief on the importance of ‘World Environment Day’.

 

Teesta-V Power Station

Teesta-V Power Station, Sikkim celebrated World Environment Day at its residential township in Balutar and Samdong Colony. As part of observance, Head of the Power Station, planted an Areca Palm sapling along with other enthusiastic officers and staff of the Power Station. The event was observed by following COVID 19 guidelines. Addressing on the occasion, Head of the power station said that ecosystem restoration can help protect and improve livelihoods, regulate disease, reduce risk of natural disasters and contribute to the achievement of the Sustainable Development Goals. He urged all participants to strive to live in harmony with Nature.

 

 

 

Category:  Environment


 |    July 2, 2021 |   0 comment

जम्मू एवं कश्मीर स्थित एनएचपीसी परियोजनाओं में विश्व पर्यावरण दिवस 2021 के आयोजन की झलकियां

उड़ी पावर स्टेशन

उड़ी पावर स्टेशन में उत्साह के साथ विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। इस अवसर पर कोविड-19 से संबन्धित भारत सरकार के दिशा-निर्देशों का पालन किया गया। पावर स्टेशन के विभिन्न परिसरों में कई प्रकार के फलदार वृक्षों का पौधारोपण कर पर्यावरण के प्रति जागरूकता तथा उसके संरक्षण हेतु प्रतिबद्धता की भावना प्रदर्शित की गई। पावर स्टेशन प्रमुख ने इस अवसर पर संबोधित करते हुए कहा कि हर साल 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस प्रकृति के महत्व के बारे में जागरूकता उत्पन्न करने हेतु संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित किए जाने वाले सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक है। चूंकि वर्तमान वर्ष की थीम “पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली” है, अतः प्रकृति के साथ हमारे संबंध को फिर से स्थापित करने के उद्देश्य से फलदार व चिरायु पौधे लगाना आनेवाली पीढ़ी के लिए लाभदायक साबित होगा।

 

उड़ी-II पावर स्टेशन

उड़ी-॥ पावर स्टेशन में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर भारत सरकार व निगम मुख्यालय फ़रीदाबाद द्वारा कोविड-19 महामारी के मद्देनज़र जारी विभिन्न सुरक्षा दिशा निर्देशों का पालन करते हुए महाप्रबंधक-(प्रभारी) एवं समस्त अधिकारियों द्वारा कार्यालय सह आवासीय परिसर में पौधरोपण कर के पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया। इस अवसर पर विभिन्न फलों के पौधों का पौधरोपण किया गया।

 

किशनगंगा पावर स्टेशन

पर्यावरणीय धारणीयता में भागीदारी सुनिश्चित करने के संकल्प के साथ किशनगंगा पावर स्टेशन में विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पावर स्टेशन प्रमुख एवं उपस्थित अधिकारियों द्वारा पावर स्टेशन के कार्यालय परिसर में पौधारोपण किया गया ।कोविड-19 के वर्तमान परिदृश्य के मद्देनजर अनुकूल मानदंडों का अनुसरण करते हुए सीमित अधिकारियों की मौजूदगी में कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

 

सेवा II पावर स्टेशन

कोविड-19 संबंधी प्रोटोकॉल को ध्यान में रखते हुए सेवा-II पावर स्टेशन में विश्व पर्यावरण दिवसका आयोजन किया गया। इस अवसर पर महाप्रबंधक (प्रभारी) के नेतृत्व में पर्यावरण को बचाने के लिए लोगों/कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने हेतु एक सामूहिक पौधारोपण कार्यक्रम सेवा विहार कॉलोनी में आयोजित किया गया जिसमें सभी विभागाध्यक्ष एवं जम्मू-कश्मीर वन विभाग के अधिकारियों ने भी उपस्थिति दर्ज की।

 

सलाल पावर स्टेशन

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर सलाल पावर स्टेशन में कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन करते हुए पौधारोपण अभियान चलाया गया। इस अवसर पर पावर स्टेशन प्रमुख द्वारा ज्योतिपुरम में दो आर्गेनिक वेस्ट कंपोस्टिंग मशीन के संचालन का उदघाटन भी हुआ। वर्तमान में सलाल पावर स्टेशन ज्योतिपुरम में अब कुल तीन कंपोस्टिंग मशीन कार्यशील है, जिसमें से एक पहले से ही संचालित की जा रही है। इन मशीनों की कचरा निपटान की रोजाना क्षमता 100 से 400 किलो प्रति मशीन है। मशीनों के माध्यम की ज्योतिपुरम आवासीय कालोनी से निकलने वाले आर्गेनिक कचरे (किचन वेस्ट) के उचित निपटान और उसके सदुपयोग हेतु जैविक खाद तैयार की जाती है, जिसे पुनः खेती बागवानी आदि में प्रयोग किया जाता है। इसके साथ की सभी कार्मिकों व उनके परिवारजनों से अपील की गई कि इन मशीनों के उचित उपयोग हेतु अपने घरों, रसोई आदि से निकलने वाले कचरे को बायोडिग्रेडबल व नॉन बायोडिग्रेडबल के आधार पर अलग-अलग रखकर देने का प्रबंध करें ताकि इन मशीनों को उनके क्षमता के अनुसार इस्तेमाल किया जा सके।

 

दुलहस्ती पावर स्टेशन

पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ कोविड-19 महामारी से संबन्धित सामाजिक दूरी के मानदंडों का पालन करते हुए दुलहस्ती पावर स्टेशन में विश्व पर्यावरण दिवस उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर पावर स्टेशन के हस्ती स्थित पावर हाउस परिसर में पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें फलदार वृक्षों एवं देवदार के पौधे लगाए गए। महाप्रबंधक (प्रभारी) महोदय ने सभी को अधिक से अधिक पौधे लगाने एवं पर्यावरण संरक्षण हेतु जागरूक रहते इसके संरक्षण के प्रति अपने दायित्वों के निर्वहन करने का आह्वान किया।

 

Kiru Hydro-Electric Project

World Environment Day was celebrated at Kiru Hydro-Electric Project, Kishtwar with full fervor and zeal, reflecting its commitment to protect the Environment.  On this Occasion, a plantation drive was organised at project campus as well as project site, wherein the saplings of Cedrus deodara (Deodar) were planted. This was followed by an online awareness session/ workshop organized by Environment Division for the employees of the Project as well as those of the Construction Company. Sh. Shashi Paul Singh, Sr. Manager (Env.) shared his knowledge with the participants regarding importance of Ecosystems, factors degrading the Ecosystems and the ways to restore the same.

 

 

Category:  Environment


 |    July 2, 2021 |   0 comment

एनएचपीसी क्षेत्रीय कार्यालयों में विश्व पर्यावरण दिवस 2021 के आयोजन की झलकियां

 

क्षेत्रीय कार्यालयबनीखेत

क्षेत्रीय कार्यालय बनीखेत में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।  एनएचपीसी क्षेत्रीय कार्यालय परिसर में अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा पौधारोपण किया गया। कार्यक्रम के दौरान कोविड-19 महामारी को ध्यान में रखते हुए सामाजिक दूरी के सभी मानदंडों का पालन किया गया।

 

क्षेत्रीय कार्यालयचंडीगढ़

क्षेत्रीय कार्यालय चंडीगढ़ में विश्व पर्यावरण दिवस-2021, कोविड-19 महामारी के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर क्षेत्रीय कार्यालय, चंडीगढ़ के आवासीय परिसर में पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमे क्षेत्रीय कार्यालय चंडीगढ़ के अधिकारियों और उनके परिवार के सदस्यों द्वारा पौधारोपण किया गया।

 

Category:  Environment


 |    July 2, 2021 |   0 comment

CMD, NHPC awarded ‘Roll of Honour’ by Dalal Street Investment Journal

Shri A.K. Singh, CMD, NHPC has been awarded ‘Roll of Honour’ at PSU Award of the Year 2020 under Category – ‘Miniratna of the year – Manufacturing’ by Dalal Street Investment Journal. The award recognizes & appreciates his contribution to NHPC during 2020.

Category:  Awards to NHPC


 |    July 2, 2021 |   0 comment

इस अंक की तस्वीर

हमनी फिश फार्म, पार्बती-III पावर स्टेशन, हिमाचल प्रदेश

 

पार्बती –III पावर स्टेशन की मत्स्य विकास प्रबंधन योजना के अंतर्गत हिमाचल राजकीय मत्स्य विभाग द्वारा एक ट्राउट फिश फार्म तीर्थन नदी पर हमनी, बंजार तहसील में विकसित किया गया है । यह फिश फार्म हिमाचल राजकीय मत्स्य विभाग के तत्वावधान में कार्य करता है।इसके निर्माण के लिए पार्बती -III पावर स्टेशन द्वारा  हिमाचल राजकीय मत्स्य विभाग को एक करोड़ 30 लाख रुपए दिये गए । यह फार्म ब्राउन ट्राउट और रेनबो ट्राउट दोनों प्रकार की फिश के एंगलर्स विकसित करने के उद्देश्य से बनाया गया है । यहां  दोनों प्रकार की ट्राउट फिश विकसित कर तीर्थन नदी और सेंज नदी में डालने की व्यवस्था हिमाचल राजकीय मत्स्य विभाग एवं पार्बती-III पावर स्टेशन द्वारा की जाती  है ।

                                                                                 

विशाल शर्मा, वरिष्ठ प्रबन्धक (पर्यावरण)

पार्बती –III पावर स्टेशन

                                     

Category:  Environment


 |    May 12, 2021 |   2 comments

पर्यावरण वार्ता (अंक 15)

यह पर्यावरण के लिये ही नहीं मानवता के समक्ष भी कठिन समय है। कोरोना की दूसरी लहर ने सर्वत्र ऐसे दृश्य उपस्थित किये हैं जो भयावह हैं। ऐसे समय में एक भारतीय के रूप में हमारी पहचान सुनिश्चित होनी है, यह समय कसौटी है कि महामारी से राष्ट्र के रूप में एकजुट हो कर हम कैसे लड़ें, कैसे एक दूसरे की मदद करें, कैसे फिर से सब कुछ सामान्य हो सके, उसके लिये सतत प्रयत्नशील रहें। इस कठोर कालखण्ड में भी यह देखना सु:खद है कि देश का सरकारी तंत्र, पब्लिक सेक्टर इकाईयों सहित निजी क्षेत्र भी बढ़-चढ़ कर सामने आये हैं और अपनी अधिकाधिक क्षमता तक केंद्र व राज्य सरकारों को ही नहीं अपितु आमजन के लिये भी मदद पहुँचाने में सक्रिय हैं। एनएचपीसी प्रबंधन ने भी इस आपदा के समय अपने दायित्वों का सतत निर्वहन किया है। इसी से जोड़ कर मैं कहना चाहता हूँ कि पर्यावरण के प्रति हमारी संवेदना हमें महामारियों से बचा सकती है,जिसके लिएसजगता आवश्यक है।इस वर्ष जनवरी 2021मेंवर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम द्वारा जारी ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट – 2021 में कोरोना और इस जैसी संक्रामक बीमारियों को इंसानों और व्यापार के लिए एक बड़े खतरे के रूप में बताया है। इस रिपोर्ट में पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं जैसे जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता को हो रहे नुकसान को कोरोना से बड़ा खतरा माना है। विकासशील देश बडी विपत्ति में है लेकिन यहाँ के जुझारू आम जन किसी भी आपदा से लड़ सकते हैं, हम कोरोना के इस दौर की गर्दन पर शीघ्र ही अंकुश रख पायेंगे, मैं इसकी आशा करता हूँ, साथ ही यह अपेक्षा भी रखता हूँ कि सभी स्वयं सुरक्षित रहें और सरकार द्वारा निर्धारित गाईडलाईंस का पालन करते रहें।

 

मई का महीना ग्रीष्म ऋतु की पहचान है, साथ ही प्रतिवर्ष इस माह में पर्यावरण से जुडे अनेक वैश्विक दिवस भी मनाये जाते हैं,  उदाहरण के लिये अंतर्राष्ट्रीय तेंदुआ दिवस (3 मई), विश्व प्रवासी पक्षी दिवस (प्रत्येक मई माह का दूसरा शनिवार), लुप्तप्राय प्रजाति दिवस (प्रत्येक मई का तीसरा शुक्रवार), जैविक विविधता के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस (22 मई), विश्व कछुआ दिवस (23 मई), विश्व ऊदबिलाव दिवस (27 मई), विश्व तोता दिवस (31 मई) आदि। इनकी संरचना पर ध्यान दें तो सभी जीव जगत और उनके  संरक्षण से जुड़ेदिवस हैं। यह हम सबका दायित्व है कि इस धरती को केवल मनुष्यों के रहने लायक न छोड़ें बल्कि जीव-जंतुओं को उनकी नैसर्गिकता और विविधता के साथ रहने योग्य वातावरण भी निर्मित करें।  सोच कर देखें ऐसी धरती जिसमें केवल इन्सान हों, कोई पशुपक्षी नहीं? अव्वल तो इस परिस्थिति में मनुष्य भी संकटग्रस्त प्राणीयों की गिनती में आ जायेगा दूसरा यह भी सोचें कि जैसे-जैसे जीव धरती को अलविदा कह रहे हैं यहाँ का रंग-बिरंगापन भी सिमटता जा रहा है। गिद्धों से ले कर गोरैया तक अब बमुश्किल ही कहीं देखने को मिलती है। यही कारण है कि एनएचपीसी एक जिम्मेदार और पर्यावरण प्रिय संस्था के रूप में सतत विकास की अवधारणा की ओर सर्वदा प्रतिबद्ध रहा है। जैव-विविधता संरक्षण की योजनायें प्राथमिकता से हमारी पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन रिपोट का हिस्सा होती हैं, सुझावों का अक्षरत: प्रतिपादन भी किया जाता है।

 

इन शब्दों के साथ एक बार पुन: मैं दोहराना चाहता हूँ कि कोरोना से सतर्क रहें, सभी गाईडलाईंस का पालन करते रहें साथ ही बीमारी से लड़ने में समाज और मानवता को यथायोग्य अपना योगदान भी दें। साथ ही साथ इस धरती की हरियाली की भी चिंता करें जिससे वे परिस्थितियाँ फिर सामने न आयें जिनसे आज हम जूझ रहे हैं।

 

एन एस परमेश्वरन

कार्यपालक निदेशक, पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग 

 

 

 

Image Source : https://english.newstracklive.com/news/world-corona-increased-in-america-is-first-stage-of-corona-cases-mc24-nu901-ta321-1142945-1.html

 

Category:  Environment


 |    May 12, 2021 |   0 comment

पार्बती-III पावर स्टेशन के सिउण्ड स्थित बांध क्षेत्र में ब्राउन ट्राउट की स्टाकिंग

पार्बती-III पावर स्टेशन के सिउण्ड स्थित बांध क्षेत्र में दिनांक 08.04.2021 को ब्राउन ट्राउट फिश के 15600 सीड (Frys) छोड़े गए । मतस्य विभाग हमनी (बंजार), हिमाचल प्रदेश स्थित ट्राउट फिश फार्म से फ्राइ सीड (Frys) लाये गए थे। ब्राउन ट्राउट की स्टाकिंग के द्वारा पार्बती-III पावर स्टेशन बांध क्षेत्र के अपस्ट्रीम में मतस्य पालन को  प्रोत्साहन मिलेगा साथ ही साथ यह प्राकृतिक जलीय पर्यावरण संतुलन में भी  उपयोगी सिद्ध होगा। ब्राउन ट्राउट की स्टोकिंग हिमाचल प्रदेश के मत्स्य विभाग के श्री महेश कुमार, उप निदेशक, श्री डी सी आर्य, मतस्य अधिकारीएवं श्री विशाल शर्मा, वरिष्ठ प्रबन्धक (पर्यावरण), पार्बती-III पावर स्टेशनके द्वारा सफलता पूर्वक संचालित किया गया । पार्बती –III पावर स्टेशन की मत्स्य विकास प्रबंधन योजना के अंतर्गत हिमाचल राजकीय मत्स्य विभाग द्वारा एक ट्राउट फिश फार्म तीर्थन नदी पर हमनी, बंजार तहसील में विकसित किया गया है । इसके निर्माण के लिए पार्बती -III पावर स्टेशन ने हिमाचल राजकीय मत्स्य विभाग को एक करोड़ 30 लाख रुपए दिये गए । यह फार्म ब्राउन ट्राउट और रेनबो ट्राउट दोनों प्रकार की फिश के एंगलर्स विकसित करने के उद्देश्य से बनाया गया है । यह फिश फार्म हिमाचल राजकीय मत्स्य विभाग के तत्वावधान में कार्य करता है। यहां  दोनों प्रकार की ट्राउट फिश विकसित कर तीर्थन नदी और सेंज नदी में डालने की व्यवस्था हिमाचल राजकीय मत्स्य विभाग एवं पार्बती-III पावर स्टेशन द्वारा की जाती  है ।

 

 

विशाल शर्मा, वरिष्ठ प्रबन्धक (पर्यावरण) एवं विनीत त्यागी, प्रबन्धक (सिविल)

पार्बती –III पावर स्टेशन

 

Category:  Environment


 |    May 12, 2021 |   0 comment

पर्यावरण शब्दकोष (09)

Image source : https://regroup.us/thought/population-health-and-the-pandemic/

 

क्र. शब्द अर्थ
1  

जनसंख्या

(Population)

 

 

जनसंख्या व्यक्तियों / जीवों का एक अलग समूह है। यह समूह एक राष्ट्र या एक सामान्य विशेषता वाले लोगों का समूह  हो सकता है ।  एक समान  विशेषता के अनुसार समूहीकृत  किसी भी चयन को जनसंख्या या आबादी कहा जा सकता है।

 

2 जैवनिम्नीकरणीय

(Biodegradable)   

 

जीवित चीजों (जैसे सूक्ष्मजीव) द्वारा या प्राकृतिक रूप से क्षय होकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना अहानिकर उत्पादों में टूटने में सक्षम होने का गुण रखने वाले पदार्थ   जैव-निम्नीकरणीय कहलाते हैं।

 

3  

जलभृत

(Aquifer)

 

यह धरातल के नीचे मौजूद मिटटी, गाद एवं चट्टानों की वह परत है जो पानी से संतृप्त होती है। वर्षा जल पृथ्वी की सतह से रिस कर यहाँ जमा हो जाता है जिसे बाद में नलकूप व कुओं के माध्यम से वापस सतह पर ला कर उपयोग किया जाता है ।

4 जलवितरण

(Water distribution)

 

 

पृथ्वी  एक जलीय गृह है पर यहां जल का वितरण असामान्य है।  पृथ्वी की सतह का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा पानी से ढका हुआ है और महासागर पृथ्वी के सभी पानी का लगभग 96.5 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। पानी हवा में जल वाष्प के रूप में, नदियों और झीलों में, हिमकणों और ग्लेशियरों में, जमीन में नमी और जलीय रूप में और समस्त जीवों में भी मौजूद है।पृथ्वी का लगभग 97% पानी खारा है और महासागरों में पाया जाता है। मीठे पानी की छोटी मात्रा ( 3%) में से, मानव, पौधे और पशु जीवन को बनाए रखने के लिए केवल एक अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा ही उपयोग के लिए उपलब्ध है।

 

5 जलविलवीकरण

(Water desalination)

विलवणीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें समुद्र के पानी या खारे पानी से अतिरिक्त लवणों को निकालकर उसे सुरक्षित पीने योग्य या उपयोग योग्य पानी में परिवर्तित किया जाता है।
6 जलकुम्भी

( Eichhornia spp )

 

 

 

यह एक बहुत तेजी से फैलने वाला खरपतवार है जो जलाशयों में  जैव विविधता ह्रास का  एक कारण है जो अनेक जलीय प्रजातियो को अपनी उपस्थिति के कारण नष्ट कर देता हैं। जलकुंभी की उपस्थिति से पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जिससे मछलियों के अलावा अन्य जलीय वनस्पतियों और जीवों का दम घुटने लगता है। यह पानी के बहाव को 20 से 40% तक कम कर देती है। बड़े बांधों में जलकुंभी बिजली उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। इसके कारण पानी के “वाष्पोत्सर्जन” की गति 3 से 8 प्रतिशत तक अधिक बढ़ जाती है। जिससे पानी का जल स्तर तेजी से कम होने लगता है। जलकुंभी से ग्रसित पानी के क्षेत्र मच्छरों के लिए आवास है।

 

7 जल संसाधन

(Water  resources)

 

जल संसाधन जल के वे स्रोत हैं जो मनुष्यों के लिए उपयोगी होते हैं। दैनिक जीवन में अधिकांशतः ताजे जल की आवश्यकता होती है। जल की उपस्थिति के कारण ही पृथ्वी पर जीवन संभव है। जल एक अक्षय प्राकृतिक संसाधन है। एक अक्षय संसाधन वह संसाधन होता है जिसे बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि यह प्राकृतिक रूप से प्रतिस्थापित हो जाता है।

 

8 जलग्रहणक्षेत्र

(Catchment/ Watershed)

वह सम्पूर्ण क्षेत्र जिसका प्रवाहित जल किसी एक नदी या सरिता में पहुँचता है, उस नदी का जलग्रहण क्षेत्र कहलाता है। यह भूमि का वह  क्षेत्र  है जहाँ से पानी नदी, झील या जलाशय  की ओर  बहता है।

 

9 जलचक्र

(Water cycle)

जल – चक्र जल के एक रूप से दूसरे रूप में संशोधित होने या एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की चक्रीय प्रक्रिया है जिसमें कुल जल की मात्रा का क्षय नहीं होता है बस रूप परिवर्तन और स्थान परिवर्तन होता है। इसके  द्वारा पृथ्वी में महासागरों, वायुमंडल और भूमि के बीच पानी का संचार होता है।   इसके अंतर्गत वायुमंडल का पानी वर्षा और बर्फ के रूप में नदियों और जलाशयों में जाकर वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन द्वारा वायुमंडल में वापस आता है एवं यह चक्र निरंतर चलता रहता है ।

 

10 जलप्रदूषण

(Water Pollution)

जब हानिकारक पदार्थ, जैसे रसायन या सूक्ष्मजीव, किसी जलस्रोत जैसे नदी, झील, महासागर आदि  को दूषित कर उसकी गुणवत्ता को कम करते हैं और जल को मनुष्यों या पर्यावरण के लिए विषाक्त करते हैं, जल प्रदूषण कहलाता है । पानी जल्द ही दूषित हो जाने का गुण रखता है क्यूंकि यह  एक “सार्वभौमिक विलायक” के रूप में जाना जाता है। अत : पानी पृथ्वी पर किसी भी अन्य तरल पदार्थ की तुलना में अधिक पदार्थों को स्वयं में घोलने  में सक्षम है।

 

 

पूजा सुन्डी , उप प्रबंधक (पर्यावरण)

पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग

निगम मुख्यालय

Source : Internet/Google

  • https://www.investopedia.com/
  • https://dictionary.cambridge.org
  • https://www.news-medical.net
  • https://www.usgs.gov
  • https://www.intechopen.com
  • https://agrilifeextension.tamu.edu
  • https://hi.vikaspedia.in
  • https://nwa.mah.nic.in
  • https://dictionary.cambridge.org
  • https://www.nrdc.org

 

पर्यावरण शब्दकोष (8)

Category:  Environment


 |    May 12, 2021 |   0 comment

Eco-friendly initiatives at Chamera-II Power Station

  • A composting unit has been constructed for disposal of biodegradable domestic waste generated from NHPC Colony, Chamera-II Power Station, Karian. The by-product from this composting unit is reused for plants as manure at Colony.

 

  • Nests for birds are placed at Herbal Park at NHPC Colony, Karian, Chamba (HP).

 

  • Plantation drive takes place from time to time. Total 800 saplings of fruit bearing plants were planted in NHPC Colony during the year 2020-21.

 

  • The effluent from Sewage Treatment Plant is being used for irrigation of plants situated at Herbal Park and also sludge produced from STP is also being used as manure.

 

  • The debris / boulders / sludge found deposited in Kariannallah due to rain water flowing from uphill side towards Ravi river from NHPC Colony, is removed under waste land development Plan.

 

  • All the office works are being done through e-office, thus reducing paper consumption.

 

  • All electric bulbs are being replaced by LED Lights for saving electricity

 

 

Sharad Laxman Ukey, Sr. Manager (Civil) and Amit Bhadula, Manager (Env.)

Chamera -II & III Power Station

Category:  Environment


 |    May 12, 2021 |   0 comment

Sewage Treatment Plant at Chamera Power Station-III

Chamera Stage-III Power Station has installed a STP of 100 KLD at Residential Colony of Chamera-II&III at Karian for minimizing any negative impact on water bodies due to sewage. The treated effluent from STP is used for irrigation of plants at Colony. Sludge produced from STP is also used as manure for plants.

 

 

Sharad Laxman Ukey, Sr. Manager (Civil) and Amit Bhadula, Manager (Env.)

Chamera-II&III Power Station

 

Category:  Environment


 |    May 12, 2021 |   0 comment

Bio-resource Management and Energy Conservation – a way forward Atmanirbhar Bharat

Image Source : https://www.toppr.com/guides/essays/essay-on-conservation-of-natural-resources/

 

In spite of the rapid pace of developments and technological advancements there are various challenges today. Climate Change or Global Warming, increasing population pressure, Food deficiency, Freshwater deficit, and others are debated around the world. Now COVID 19 pandemic is one of the greatest challenges of the 21st century and many more new challenges will come in the future which have their solutions in preserving our Bio-resources. In other words, it is becoming relevant now more than ever to save our Bio-resources.

 

Biological Resource means any resource of biological origin. India has diversity of biological resources in various areas which range from pristine ecosystems, agro-climatic ecosystems and ecosystems developed due to diverse socio-cultural conditions. However, the Bio-resources get depleted due to various causes such as anthropogenic activities, industrial development, agricultural practices, aquaculture, etc. Therefore, handling bio-resources in a proper manner is important for the optimum use without over exploitation of our bio-resources wealth.

 

Accordingly, a Centre of Excellence on “Bio-Resources Management and Energy Conservation Material Management” is being set up at Fakir Mohan University campus at Balasore, Odisha and the foundation stone for the centre was laid at the by its Vice-Chancellor Prof Dinabandhu Sahoo on 14th January 2021. The centre is being funded by World Bank and Odisha Higher Education Programme for Excellence & Equity (OHEPEE).

 

The 10,000 square feet centre will have world class laboratories with all modern facilities &equipment. The centre will concentrate on biodiversity assessment with special emphasis on seaweeds, mangroves, medicinal plants, microorganisms, marine mammals, etc. It will also undertake monitoring and management of pollution, ground and surface water quality. It will also carry out research on development of hybrid nano-composite materials for energy conservation.

 

During his address, Prof. Sahoo, emphasized on the importance of biodiversity in everyone’s life and stated that if properly managed, it will boost our economy. He also said that there is a need to conserve our biodiversity for future generations and go for bio-resources management to fulfil some of the objectives of the United Nations Sustainable Development Goal (UNSDG). Bio-resources Management and energy conservation can not only play a significant role in combating some of these challenges but also can generate billions of dollars as revenue to our economy and create millions of jobs in the country. Many such centres are required to be developed for effective Bio-resources management in the Country.

 

 

Anuradha Bajpayee, Sr. Manager (Env)

Environment & Diversity Management Division,

Corporate Office

Category:  Environment


 |    May 12, 2021 |   0 comment

पर्यावरण वार्ता (अंक 14 )

 

ब्लॉग के पिछले विविध सम्पादकीयों में हमने अनेक पर्यावरण विषयों पर बात की है, इस अंक में जल संसाधन पर विचार करते हैं। एनएचपीसी की कार्यशैली के दृष्टिगत आज बात नदियों की कर लेते हैं। लगभग 329 मिलियन हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्रफल में फैले भारत देश को सम्पूर्णता से जानने के लिये इसकी नदियों और पर्वतों की समझ आवश्यक है। संस्कृति, धर्म एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास से जुड़ी ये नदियाँ भारतीय जीवन का हृदय एवं आत्मा हैं। यह सौभाग्य है कि हमारे भू-भाग से बहने वाली कतिपय नदियों को विश्व की महानतम नदियों में गिना जाता है। भारतीय उप-महाद्वीप की प्रमुख नदियों के रूप में बारह को वर्गीकृत किया गया है, जिनका कुल आवाह क्षेत्रफल 252.8 मिलियन हेक्टेयर है। हमारी प्रमुख नदियों में गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना तंत्र का आवाह क्षेत्रफल 110 मिलियन हेक्टेयर है जो कि देश की सभी प्रमुख नदियों के आवाह क्षेत्रफल का 43 प्रतिशत से अधिक है। सिन्धु (32.1 मिलियन हेक्टेयर), गोदावरी (31.3 मिलियन हेक्टेयर), कृष्णा (25.9 मिलियन हेक्टेयर) एवं महानदी (14.2 मिलियन हेक्टेयर) देश की अन्य प्रमुख नदियाँ हैं जिनका आवाह क्षेत्रफल 10 मिलियन हेक्टेयर से अधिक है। इसी प्रकार देश की मध्यम श्रेणी की नदियों की भी महति भूमिका है जिनका कुल आवाह क्षेत्रफल 25 मिलियन हेक्टेयर है। सुवर्णरेखा नदी, जिसका आवाह क्षेत्र 19 मिलियन हेक्टेयर है, देश की मध्यम श्रेणी की नदियों में सबसे बड़ी है। नदियाँ ही हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ और समृद्धि का साधन हैं।

 

भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण नदियों के प्रवाह में ही नहीं अपितु भूजल संसाधनों के स्तर में भी कमी दर्ज की गयी है। जलवायु परिवर्तन के कारण भी नदियों की जल उपलब्धता प्रभावित हो रही है। जल के देशभर में असमान उपलब्धता तथा कतिपय क्षेत्रों में विद्यमान रहने वाले जलसंकट का एक कारण है अनियमित वर्षा। आज हमारे पास जो उपलब्ध जलश्रोत हैं वे लगातार सिमट रहे हैं तथा अब प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता लगातार घट रही है। ऐसा नहीं है कि जल संसाधनों की कमी है अपितु उनके उचित प्रबंधन का अभाव प्रतीत होता है। भारत में विश्व के धरातलीय क्षेत्र का 2.5%, जल संसाधनों का 4% तथा कुल जनसंख्या का लगभग 16% समाहित है। प्रथमदृष्टया ही जल की मांग और आपूर्ति की विषमता का इससे अंदाजा लगाया जा सकता है। वर्षा से प्रतिवर्ष देश में लगभग 4000 घन किलोमीटर जल की प्राप्ति होती है। इस जल का अधिकांश हिस्सा रन-ऑफ अथवा अन्य कारणों से उपलब्ध नहीं होता। यही कारण है कि हमें विविध जल संग्रहण योजनाओं के निर्माण पर गहराई से विचार और कार्य करना चाहिये।  क्या हमें अपने जल संसाधनों के प्रबंधन और उनके समुचित संवर्धन के लिये एक दीर्घकालिक योजना बनाने की आवश्यकता नहीं है? कथनाशय यह है कि हमें जल को जीवन ही नहीं एक संसाधन के रूप में भी देखना चाहिये।

 

पिछले दिनों विभाग में सुदूर संवेदन एवं जीआईएस प्रयोगशाला का उद्घाटन माननीय अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक महोदय द्वारा किया गया। मुझे अपेक्षा है कि इस तकनीक के माध्यम से हम पर्यावरण अध्ययन को अधिक वैज्ञानिक और व्यावहारिक बना सकेंगे। इसी तरह सचिव राजभाषा, गृह मंत्रालय द्वारा  पर्यावरण विभाग की बुकलेट  – “एनएचपीसी – हरित प्रयासों से सतत जलविद्युत विकास” का उद्घाटन किया गया। मैं ऐसे प्रयासों की सराहना करता हूँ और इसके व्यापक प्रसार की अपेक्षा रखता हूँ।

 

एन एस परमेश्वरन

कार्यपालक निदेशक (पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन) 

 

Image Source : https://researchmatters.in/news/karnataka%E2%80%99s-rivers-lifelines-south-india

 

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   1 comment

पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग की द्विभाषिक पुस्तिका “एनएचपीसी : हरित प्रयासों से सतत जलविद्युत विकास / NHPC – Green Endeavours for Sustainable Hydropower” का विमोचन

पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग द्वारा हिन्दी/द्विभाषी में तैयार की गई ‘एनएचपीसी- हरित प्रयासों से सतत जलविद्युत विकास” पुस्तिका का श्री ए.के. सिंह , सीएमडी, एनएचपीसी की उपस्थिति में विमोचन करते मुख्य अतिथि डॉ. सुमीत जैरथ, सचिव (राजभाषा), राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार।

 

पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग द्वारा द्विभाषिक पुस्तिका  “एनएचपीसी : हरित प्रयासों से सतत जलविद्युत विकास / NHPC – Green Endeavours for Sustainable Hydropower”  तैयार की गई है। सामाजिक रूप से एक जिम्मेदार संगठन के रूप में, एनएचपीसी अपनी जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के समय, निर्माण के पश्चात और संचालन के विभिन्न चरणों के दौरान पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। जब देश के दूरदराज और पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक स्रोत के रूप में उपलब्ध नदी जल  का उपयोग कर प्रदूषण मुक्त और स्वच्छ बिजली उत्पन्न करने के लिए जल विद्युत परियोजनाओं के विकास की बात आती है, तब एनएचपीसी का मंत्र “पर्यावरण पहले” सर्वप्रथम उजागर होता है। एनएचपीसी द्वारा अपनी परियोजनाओं और उसके आसपास के क्षेत्रों में प्रकृति को संरक्षित कर, भावी पीढ़ी के लिये हरा-भरा पर्यावरण सुनिश्चित करने के दृष्टिगत हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं ।

 

एनएचपीसी द्वारा परियोजनाओं के निर्माण अथवा संचालन के दौरान पर्यावरण पर पड़ने वाले किसी भी संभावित नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए साथ ही साथ संरक्षण एवं सामाजिक-आर्थिक उन्नयन के दृष्तिगत पर्यावरण प्रबंधन योजनायें निर्मित एवं कार्यान्वयित की जाती हैं जिनमें  – जैव विविधता संरक्षण, जलागम क्षेत्र उपचार, क्षतिपूरक वनीकरण योजना, ग्रीन बेल्ट विकास योजना, मलवा निस्तारण और खदान स्थलों का पुनरुद्धार, जलाशय रिम उपचार, मत्स्य प्रबंधन, स्वास्थ्य प्रबंधन, सामाजिक आर्थिक विकास, पुनर्वास और पुनर्स्थापना योजना इत्यादि प्रमुख हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा एनएचपीसी के पर्यावरण प्रबंधनों एवं पर्यावरण और वन स्वीकृति पत्रों के अनुसार निर्धारित पर्यावरण संरक्षण प्रयासों / कार्यों की समयबद्ध तथा गुणवत्तापूर्ण  पूर्ति किये जाने के लिये विभिन्न मंचों पर सराहना की गई है, ऐसी परियोजनाओं में  पार्बती-II परियोजना में जैव विविधता संरक्षण और मलवा निस्तारण उपाय; तीस्ता-V में जलागम क्षेत्र उपचार के कार्य आदि महत्वपूर्ण हैं ।

 

एनएचपीसी द्वारा पावर स्टेशनों के निर्माण पश्चात पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रभाव आकलन अध्ययन भी कराया गया है। यह आकलन अध्ययन सर्वप्रथम जम्मू-कश्मीर स्थित उरी-l (480 मेगावाट) पावर स्टेशन के लिए किया गया; तत्पश्चात सिक्किम स्थित रंगित (60 मेगावाट) पावर स्टेशन; और उत्तराखंड स्थित धौलीगंगा चरण-l (280 मेगावाट) पावर स्टेशन एवं सिक्किम स्थित तीस्ता-V (510 मेगावाट) पावर स्टेशन के लिए कराया गया है।

 

इस संदर्भ में, यह पुस्तिका शीर्षक “एनएचपीसी : हरित प्रयासों से सतत जलविद्युत विकास” न केवल निगम मुख्यालय के स्तर पर अपितु एनएचपीसी के विभिन्न पावर स्टेशनों और परियोजनाओं द्वारा पर्यावरण एवं सामाजिक आर्थिक क्षेत्रों में किए गये कार्यों को संकलित कर उसे समग्र स्वरूप में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तिका, निगम की सतत विकास के लिये प्रतिबद्धता तथा स्वच्छ विद्युत उत्पादन करते हुए, राष्ट्र की प्रगति में योगदान के प्रति प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करती है।

 

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   0 comment

पर्यावरण संरक्षण एक संवैधानिक जिम्मेदारी

Image source:https:https://transform.iema.net/article/failure-enforce-environmental-law-widespread-un-study-finds

 

ज्ञात है कि सतत विकास के तीन प्रमुख स्तंभ होते हैं:  आर्थिक विकास, सामाजिक विकास और पर्यावरण संरक्षण। इन तीनों स्तंभों में से, पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि पृथ्वी पर पर बढ़ते मानवजनित (anthropogenic) गतिविधियों के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन  के साथ मानव स्वास्थ्य तथा  अन्य जैव विविधता पर प्रदूषण का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । हाल ही में कोविड-19 के कारण हुए लॉकडाउन के दौरान किए गए शोध में पाया गया कि न्यूनतम मानवजनित गतिविधि होने से पर्यावरण की गुणवत्ता में  स्वतः सुधार होता है । इसे संज्ञान में लेते हुए  हमें ‘सतत विकास’ के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए एक व्यवस्थित पर्यावरण संरक्षण प्रणाली को अपनाने की ज़िम्मेदारी को समझना होगा । इस संदर्भ में अपने देश का बहुचर्चित संविधान में  समाविष्ट पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न प्रावधानों को इस ब्लॉग के माध्यम से उजागर करने तथा नागरिक को सजग करने का प्रयास किया गया है ।

 

किसी भी देश का संविधान सर्वोच्च कानून होता है जिसका अनुपालन करना  प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी होती  है। भारतीय संविधान के  भाग IV ‘राज्य नीति निदेशक तत्व’ और भाग IV-ए में ‘मौलिक कर्तव्यों’ का जिक्र किया गया है जिसके तहत, पर्यावरण का संरक्षण एवं  संवर्धन हेतु राज्य सरकार की भूमिका व नागरिक के कर्तव्यों को समझाया गया है।  चूँकि भारत क्षेत्रीय या वैश्विक पर्यावरणीय मुद्दों से संबंधित कई अंतर्राष्ट्रीय संधियों और समझौतों का एक हस्ताक्षरकर्ता है, अतः भारतीय संविधान में इन संधियों और समझौतों की निर्णयों को अनुपालन करने का भी प्रावधान किया गया है  जो निम्न अनुच्छेदों में वर्णित है :

 

  • अनुच्छेद 48 (राज्य नीति निदेशक तत्व): राज्य , देश के पर्यावरण का संरक्षण,  संवर्धन और वन तथा वन्य  जीवों की रक्षा  करने का प्रयास करेगा ।

 

  • अनुच्छेद 51 (राज्य नीति निदेशक तत्व): राज्य, संगठित लोगों के एक दूसरे से व्यवहारों में अंतराष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का प्रयास करेगा ।

 

  • अनुच्छेद 51ग  (छ)(मूल कर्तव्य) : भारत के प्रत्येक नागरिक का यह  कर्तव्य होगा कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत  वन, झील, नदी व वन्य जीव हैं ,रक्षा करे और उसका संवर्धन करें तथा प्राणी मात्र के प्रति दया भाव रखे ।

 

  • अनुच्छेद 253 भाग XI (संघ और राज्यों के बीच संबंध): संसद को किसी अन्य देश या देशों के साथ की गई किसी संधि, करार या अभिसमय अथवा किसी  अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, संगम या अन्य निकाय में किए गए किसी विनिश्चय के कार्यान्वयन के लिए भारत के सम्पूर्ण राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कोई विधि बनाने की शक्ति है ।

 

संविधान के उपरोक्त अनुच्छेद 253 में दर्शाये गए मुद्दे के अनुपालन हेतु भारत सरकार द्वारा पर्यावरण संबन्धित विभिन्न राष्ट्रीय अधिनियमों जैसे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 ; वायु एवं जल ( प्रदूषण निवारण व नियंत्रण ) अधिनियमों  को जारी किया गया है  जिसका अनुपालन  विशेषकर विकासात्मक कार्यों के दौरान किया जाना करना अनिवार्य है जिससे कि भारत ‘सतत विकास’ के उद्देश्य को सफलतापूर्वक पूरा कर सके।

 

इसके अलावा, विगत कुछ वर्षों में न्यायिक सक्रियता द्वारा भारतीय संविधान में “ स्वच्छ पर्यावरण एक  मौलिक अधिकार ” जैसी विशिष्ट प्रावधान मौजूद नहीं होने की मान्यता को खारिज  करते हुए  व्याख्या की गई है कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन का अधिकार’ एक मौलिक अधिकार का अर्थ है, स्वच्छ वातावरण में जीवन जीना, बीमारी और संक्रमण के खतरे से मुक्त रहना। इस प्रकार,  माननीय सर्वोच्च न्यायालय व राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एन जी टी) द्वारा समय-समय पर पर्यावरण संरक्षण मुद्दों पर अहम निर्णय दिया है जिसका अनुपालन अनिवार्य है।

 

मनोज कुमार सिंह

वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

 

 

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   0 comment

जलवायु और हमारा पर्यावरण

Image Source : https://www.khayalrakhe.com/2018/01/jalvayu-parivartan-climate-change-hindi.html

 

हमारे आस-पास जो कुछ भी है, जैविक अथवा अजैविक सब पर्यावरण की परिभाषा के अंतर्गत समाविष्ट हो जाता है। बहुधा पेड़-पौधे और जीव-जंतु तक हमारा पर्यावरण विमर्श केंद्रित रह जाता है जबकि मिट्टी की घटती हुई उर्वरता से ले कर जहरीले होते आसमान तक चर्चा आवश्यक है। विषय को इसी क्रम में देखते हैं तथा जलवायु को प्रभावित करने वाले कारकों पर एक विहंगम दृष्टि डालने का प्रयास करते हैं।

 

आरम्भ मृदा से….। मृदा पृथ्वी का वह उपरी हिस्सा है जो शैलों के जलवायु, जीवजंतु, स्थलाकृति तथा समय जैसे कारकों द्वारा टूट-फूट अथवा अपक्षय से निर्मित है। मृदा में आवश्यक रूप से अनेक प्रकार के जीवांश पाये जाते हैं एवं यही पेड़-पौधे की समुचित वृद्धि में सहायक भूमिका अदा करते हैं। मृदा का निर्माण आग्नेय, अवसादी तथा कायांतरित शैलों (rocks) से होता है। इन शैलों की रासायनिक संरचना भिन्न होने से इनसे बनी भूमियों व मृदा की प्रवृत्तियाँ, बनावट व संगठन भी भिन्न-भिन्न होता है। मृदा निर्माण की प्रक्रिया के लिये शैलों का अपक्षय (weathering) विभिन्न भौतिक तथा रासायनिक कारणों से होता है। भौतिक अपक्षय के मुख्य सहायक है जल, वायु, पेड़-पौधों एवं जीव-जंतु। रासायनिक अपक्षय के कारक हैं – विलयन, जलीकरण, जल-अपघटन, कार्बोनीकरण, ऑक्सीकरण तथा अपचयन। उपलब्ध भूमि और मिट्टी कैसी है उसकी उपादेयता (utility) भी समझी जानी आवश्यक है। कुछ आँकडे इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं। हमारे देश के भौगोलिक क्षेत्रफल (32.90 करोड हेक्टेयर) में से लगभग 14.20 करोड हैक्टेयर में खेती होती है। जनसंख्या को आधार माने तो वर्तमान में प्रति व्यक्ति भूमि का क्षेत्रफल लगभग 0.12 हेक्टेयर ही है। अच्छी उत्पादकता वाली एक हेक्टेयर भूमि से पच्चीस व्यक्तियों का भरण-पोषण किया जा सकता है जबकि हमारे देश में 3.25 हेक्टेयर भूमि से 25 व्यक्तियों का जीवनयापन संभव हो पाता है। सत्यता यह भी है कि हमारे देश में लगभग 2.5 सेंटीमीटर उपरी स्तर की मिट्टी बनने में पाँच सौ से पंद्रह सौ वर्ष लग जाते हैं। भारत की उपलब्ध भूमि को मृदाओं को चार प्रमुख समूहों अर्थात जलोढ़, काली, लाल तथा लेटराइट में बांटकर उनके गुण-निर्धारित करने का प्रयास किया गया है। मिट्टी तो महत्ता रखती ही है चूंकि हर तरह की खेती का प्रारंभिक आधार वही है तथापि तह में जा कर देखा जाये तो किसी स्थल की जलवायु कुछ बातों पर निर्भर करती है जैसे – वह स्थान समुद्र से कितनी दूर है और उसके आसपास पहाड़ हैं, जंगल या रेगिस्तान।

 

वैश्विक परिदृश्य में जलवायु की विविधता क्षेत्रवार देखी गयी है और उसी अनुसार उनको नाम भी दिये गये हैं। उत्तरी ध्रुव पर आर्कटिक महासागर के आसपास टुंड्रा या ध्रुवीय जलवायु पायी है जिसकी पहचान भयावह ठंड है। इस तरह की जलवायु वाले क्षेत्र में वर्ष भर बर्फ ही जमी रहती है चूंकि तापमान शून्य से बहुत नीचे बना रहता है, केवल गर्मियों में थोड़ी बहुत हरियाली यहाँ दिखाई पड़ती है। अगली श्रेणी में आती है पर्वतीय जलवायु जिसकी विशेषता है कि यह ध्रुवीय जलवायू से गर्म होती है फिर भी अपेक्षाकृत यहाँ पर कड़ी ठंडक बनी रहती है। सर्दियों वाले मौसम की अवधि छ: महीने तक हो सकती है। ऐसे मौसमों वाले पर्वतों पर सफेद बर्फ की चादर पड़ी देखी जा सकती है। ऐसी जलवायु में पर्वतों का श्रृंगार देवदार, चीड़  और फर के  जंगल बनते हैं । जब न तो  सर्दी अधिक होती है  न ही  गर्मी और

 

भारत में वर्षा का माहवार वितरण
मानसून का प्रकार माह/ अवधि वार्षिक वर्षा
दक्षिणी- पश्चिमी जून से सितम्बर 73.7%
परवर्ती अक्टूबर से दिसम्बर 13.3%
उत्तरी-पश्चिमी जनवरी से फरवरी 2.6%
पूर्वी मार्च से मई 10.0%

 

अधिक बरसात भी नहीं होती वह शीतोष्ण (temperate) जलवायु के रूप में वर्गीकृत है। यूरोप का पश्चिमी तट, उत्तरी अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के कुछ हिस्सों में इस तरह की जलवायु पायी जाती है। ऐसे क्षेत्रों में वर्ष भर हल्की वर्षा होती रहती है साथ ही यहाँ गर्मी, सर्दी, पतझड़ तथा वसंत के रूप में चार मौसम पाये जाते हैं। भूमध्य सागरीय जलवायु की चर्चा करें तो इससे सम्बद्ध क्षेत्रों में गर्मियाँ  सूखी होती हैं तथा सर्दियों में वर्षा होती है। अधिक वर्षा होने के कारण ऐसी जलवायु वाले क्षेत्रों में घने जंगल पाए जाते हैं। भूमध्यसागर के निकटवर्ती स्थानों के अतिरिक्त यह जलवायु दक्षिण अफ्रीका, चिली, मध्यपूर्व और आस्ट्रेलिया के तटवर्ती हिस्सों में भी पाई जाती है। इसी तरह गर्म जलवायु में मौसम सूखा रहता है। ऐसी जलवायु से सम्बद्ध क्षेत्रों में वर्षा या तो नहीं होती या बहुत कम होती है। दोपहर में दिन का तापमान बहुत अधिक होता है। अधिक सूखे स्थानों पर मरूस्थल पाया जाता है जबकि कम सूखे स्थानों पर घास के मैदान हो सकते हैं। अफ्रीका व मध्यपूर्व के अधिकतर स्थानों तथा आस्ट्रेलिया व अमेरिका के भी कुछ हिस्सों में यह मौसम पाया जाता है।

 

भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत की उपस्थिति के कारण मध्य एशिया से आने वाली शीतल हवाएँ नहीं आ पाती साथ ही दक्षिण में  हिन्द महासागर  स्थित होने और भूमध्य रेखा से समीपता के कारण यहाँ कटिबंधीय (tropical) जलवायु पायी जाती है जिसका प्रभाव है – दैनिक तापांतर की न्यूनता, अत्यधिक आर्द्रता वाली वायु तथा सम्पूर्ण देश में न्यूनाधिक (modulator) रूप में वर्षा का होना। अर्थात भारत में मुख्य रूप से मानसूनी जलवायु पायी जाती है। यहाँ की भूमि मानसूनी  पवनों के प्रभाव क्षेत्र में आती है। वैसे देखा जाए तो भारत में ध्रुवीय छोड़ कर बाकी चारों प्रकार के मौसम किसी न किसी रूप में पाये जाते हैं। भारत के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पश्चिमी घाट पर्वत का पश्चिमी तटीय भाग, हिमालय पर्वतमाला की दक्षिणावर्ती तलहटी में सम्मिलित राज्य जिनमें असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, सिक्किम, पश्चिम बंगाल का उत्तरी भाग, पश्चिमी तट के कोंकण, मालाबार तट (केरल), दक्षिणी किनारा, मणिपुर एवं मेघालय इत्यादि सम्मिलित हैं। इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा की मात्रा 200  से. से अधिक होती है। भारत के साधारण वर्षा वाले क्षेत्रों में पश्चिमी घाट के पूर्वोत्तर ढाल, पश्चिम बंगाल का दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र, उड़ीसा, बिहार, दक्षिणी-पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा तराई क्षेत्र के समानान्तर पतली पट्टी में स्थित उत्तर प्रदेश, पंजाब होते हुए जम्मू-कश्मीर के क्षेत्र शामिल हैं। यहाँ वार्षिक वर्षा की मात्रा 100 से 200 सेमी तक होती है।इन क्षेत्रों में वर्षा की विषमता 15 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक पायी जाती है।  अतिवृष्टि एवं अनावृष्टि के कारण यहाँ फसलों की बहुत हानि होती है। भारत के कम  वर्षा वाले क्षेत्रों में मध्य प्रदेश, दक्षिण का पठारी भाग,  गुजरात, उत्तरी तथा दक्षिणी आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, पूर्वी राजस्थान, दक्षिणी पंजाब, हरियाणा तथा दक्षिणी उत्तर प्रदेश आते हैं। यहाँ 50 से 100 सेमी वार्षिक वर्षा होती है। वर्षा की विषमता 20 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक होती है। इसके साथ ही भारत में कुछ अपर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्र भी हैं जहाँ वार्षिक वर्षा की मात्रा 50 सेमी से कम होती है। कच्छ, पश्चिमी राजस्थान, लद्दाख आदि क्षेत्र इसके अन्तर्गत शामिल किये जाते हैं।

 

यह भारत के मृदा और जलवायु परिदृश्य पर  एक संक्षिप्त और समग्र दृष्टि भर है। पर्यावरण में पड़ने वाले किसी भी प्रभाव को बदलती हुई जलवायु से ही समझा जा सकता है अत: उसपर कड़ी दृष्टि रखते हुए बदलाव के कारकों की पहचान और निराकरण आवश्यक हो जाता है।

 

                                                                                                                गौरव कुमार,  उप महाप्रबंधक (पर्यावरण) 

राजीव रंजन प्रसाद, उप महाप्रबंधक (पर्यावरण) 

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   0 comment

Stubble Burning

Image source : Google/Internet

 

What is stubble?

Stubble is the crop residue that remains in the fields after the crop is harvested. India produces more than 500 million tons of crop residue every year. While a significant quantity is used as fodder, the residue from wheat-rice crop system in northern India is disposed of by burning.

 

What is stubble burning?

The farmers burn the crop residue as a speedy and economical way of clearing the fields for sowing the next crop, though it has its negative effects on the soil health as well as environment as a whole as it releases harmful gases such as carbon dioxide, carbon monoxide, nitrogen oxides, particulate matter etc. into the air. However, it is believed traditionally that the fire helps to eradicate weeds and pests from the fields that can attack the upcoming crop.

 

Reasons for Stubble Burning :

 

In India, stubble burning has become more prevalent after the mechanization of harvesting process through combine harvesters. Traditionally, the harvesting was done by hand and whole plant was cut from near the ground. Subsequently, after thrashing out the grains, the straw was piled up and stored for use as animal bedding material or for thatching etc.

 

The combine harvesters cut the wheat and rice crop from the upper half of the plants leaving behind the stalks and spreading the straw in fields. As a result, the bulk of organic matter remains in the fields which should ideally be very useful if it decomposes and mixes with the soil. However, the process of decomposition is long and the farmers have to sow the next crop in within a period of few days/weeks. If the decomposing straw and stubble is left in the field, the tillage becomes difficult and also increases the risk of termite attack on the next crop.

 

Stubble burning is practiced on a greater scale after the harvest of paddy in comparison to the wheat, as the wheat straw is used for animal fodder, whereas rice straw is nutrient deficient and is not easily digested by the animals, so it is of little use in the rural community. Also, after the harvest of paddy, there is a limited time period for sowing the next wheat crop usually not more than a couple of weeks and any delay in leads to drop in yield.

 

The farming community in India has always been of limited resources and cannot afford to risk the next crop so, the most economical and faster method of disposal of stubble for a farmer is to burn it and clear the field for the next crop.

 

The burning of stubble has been banned by the legislation, however, the farmers continue to defy the ban due to lack of awareness and non-availability of alternatives that are affordable. At present, a farmer has to spend at least Rs.5000-6000 per acre to manually remove the stubble from the fields.

 

 

Alternatives to stubble burning:

 

(A) Happy Seeder for direct sowing of wheat –

 

There are many efficient ways of utilizing this stubble. It can be in-situ management using a machine such as “Paddy straw chopper-cum-spreader” to shred and plough back in the fields where it decomposes and retains the soil fertility. However, there is a divergent viewpoint regarding in-situ straw management as some experts are of the opinion that it may lead to higher methane emissions that is more harmful than carbon dioxide. They argue for converting the stubble into compressed biogas (CBG) and the residue can be used as farm yard manure.

 

Recently IARI, New Delhi has developed a bio-decomposer which has the capability to turn the stubble into manure in a matter of 15-20 days by accelerating the decomposition process.

Crop diversification such as encouraging mushroom cultivation and replacing the long duration crop varieties with early maturing varieties could helpful in the controlling this practice.

 

The innovation in farm machinery is also required to tackle this problem. An example of this is the machine called “Happy Seeder” developed by Punjab Agriculture University, Ludhiana that is capable of sowing wheat seed without the need to burn the straw and stubble. The researchers have found that the use of happy seeder reduced greenhouse emissions upto 78% besides improvement in crop yield. However, this not affordable for all farmers even after being subsidized and also requires a tractor of more than 45 hp taking it out of reach of small and marginal farmers.

 

 

(B) Biomass Power Plant –

 

Another solution would be to make the stubble a source of income by developing and establish an industrial infrastructure that uses stubble as a raw material. This includes biomass power plants and brick klins that can use stubble as a fuel, small scale industries that makes paper, packaging material or disposable utensils/cutlery using the straw, promoting mushroom cultivation etc.

 

(C) Paddy straw trays –

 

“Alternatives to stubble burning are not popular because they impose additional operational expenses, often from the farmer’s pocket. On the other hand, stubble-burning only requires a matchbox. Further, most of the custom hiring centers are also unwilling to purchase expensive machinery upfront – as they can be operated only for 15 days in a year, after which they have no use.”

 

As such, the ways have to be found to either make the straw a source of income for the farmer or provide incentives to enable him to adopt the alternatives to stubble burning.

 

References:

  • agriculturejournal.org
  • researchmatters.in
  • researchermatters.in
  • thetribuneindia.com
  • science.thewire.in
  • bio4pack.com

 

 

Jaspreet Singh

 Senior Manager (Environment)

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   1 comment

India on Climate Change in G20 Summit 2020

Image Source : https://www.climate-transparency.org/g20-summit-need-for-urgent-climate-action

 

The Group of Twenty, or G20, is the premier forum for international cooperation on the most important aspects of the international economic and financial agenda. It brings together the world’s major advanced and emerging economies. The G20 comprises of Argentina, Australia, Brazil, Canada, China, EU, France, Germany, India, Indonesia, Italy, Japan, Mexico, Russia, Saudi Arabia, South Africa, South Korea, Turkey, UK and USA. The G20 Countries together represent around 90% of global GDP, 80% of global trade, and two thirds of the world’s population. The objectives of the G20 are: Policy coordination between its members in order to achieve global economic stability, sustainable growth; to promote financial regulations that reduce risks and prevent future financial crises; and to create a new international financial architecture.

 

India and G20

 

India’s participation in the G20 process stems from the realization that as a major developing economy it has stake in the stability of the international economic and financial system. India has been actively involved in the G20 preparatory process both at the Sherpas Track and the Financial Track since its inception. India’s agenda at the G20 Summits is driven by the need to bring in greater inclusivity in the financial system, to avoiding protectionist tendencies and above all ensuring that growth prospects of developing countries do not suffer. It has also worked to maintain the dynamism and credibility of G20 deliberations for establishing a framework for strong, sustainable and balanced growth, strengthening international financial regulatory systems, reforming Bretton Woods’s institutions, facilitating trade finance, pushing forward the Doha agenda.

 

2020 G20 Riyadh summit

 

It was the fifteenth meeting of  G20 which was scheduled to take place in Riyadh, Saudi Arabia, on 21–22 November 2020. However, due to the COVID-19 pandemic, it was held virtually. The theme of this G20 summit was “Realizing Opportunities of the 21st Century for All”. The focus was on three aims viz. Empowering People by creating the conditions in which all people – especially women and youth – can live, work and thrive; Safeguarding the Planet: by fostering collective efforts to protect our global commons and Shaping New Frontiers: by adopting long-term and bold strategies to share benefits of innovation and technological advancement.

 

Sh. Narendra Modi, Prime Minister of India on 21/11/2020, virtually attended the 15th G20 Summit chaired by Saudi Arabia. He stressed on the need to focus on saving citizens, economy from pandemic while keeping efforts to fight climate change. He was of the view that “Climate change must be fought not in silos but in an integrated, comprehensive and holistic way”. India has adopted low carbon & climate-resilient development practices. He also highlighted that India is “exceeding” its Paris Agreement targets and is taking a number of “concrete actions” such as making LED lights popular which is saving 38 million tons of Carbon Dioxide emissions per year and smoke-free kitchens being provided to 80 million households. India has also taken several measures such as elimination of single-use plastics, expansion of forest cover, restoring 26 million hectares of degraded land by 2030, achieving 175 giga watt of renewable energy aimed at reducing carbon footprint and preventing climate change.

 

He also pointed out that International Solar Alliance is “among the fastest growing International Organizations, with 88 signatories” and has plans to mobilise billions of dollars to train thousands of stake-holders, and promote research and development in renewable energy and that “the ISA will contribute to reducing carbon foot-print”. He also called for cooperation and collaboration for further increasing research and innovation in new and sustainable technologies and stressed that “The entire world can progress faster if there is a greater support of technology and finance to the developing world. For humanity to prosper, every single individual must prosper”.

 

The G20 Summit 2020 under the Saudi Presidency concluded on Sunday, Nov’ 22nd with a goal to create free, fair, predictable, and stable trade and investment environment and committed to ensuring that global transportation routes and supply chains remain open, safe, and secure to ensure economic recovery following the adverse impact of Covid-19. The leaders emphasized urgent need to bring the spread of the virus under control, which is key to supporting global economic recovery. The G20 further announced that top 20 economies have mobilized resources to address the immediate financing needs in global health to support the research, development, manufacturing, and distribution of safe and effective COVID-19 diagnostics, therapeutics and vaccine.

 

 

References :

 

https://www.arabnews.com/node/1767781

https://www.globaltimes.cn/content/1207732.shtml

https://www.cnbc.com

https://www.mynewsdesk.com

 

Anuradha Bajpayee

Senior  Manager (Environment)

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   0 comment

MANAGING PLASTIC WASTE IN INDIA- A BRIEF

Image source : https://earth911.com, www.business-standard.com,  www.downtoearth.org.in, www.indiaspend.com

 

Growing mountains of non-biodegradable garbage mainly plastic has become a menace. It is choking our drains, our rivers and our streets. Stagnant water on road leads to unhygienic conditions as plastic waste clog drains and therefore inhibit proper drainage. Plastic has become the most ubiquitous and necessary material that humankind has created for itself. The biggest increase in the use of plastic has come in the packaging industry. The pandemic of 2020 has only made matters worse: the use of plastic — particularly single-use and disposable — has increased manifold as a protection against the infection.

 

Moreover, tiny fragments have been found in tap water and air we breathe. Plastic breaks up or crushes under sunlight which then eventually enters and contaminate our environment and bodies.

There are options for disposing plastic waste such as recycle (but the secondary product produced is not of much economic value) and incineration (but expensive emission control equipments are required to clean polluted air generated). Roughly, 6 per cent of the world’s oil consumption goes into making this wonder substance.

 

The Annual Report on implementation of the Plastic Waste Rules, 2016, which is compiled by the Central Pollution Control Board (CPCB), is the only regular estimation of the quantity of plastic waste that is generated in India. In 2018-19, this report put the plastic waste generated as 3,360,043 metric tons per annum i.e. 3.3 million metric tons per year (roughly 9,200 metric tons per day). Given that the total municipal solid waste generation is 55-65 million metric tons, this would mean that plastic waste is roughly 5-6 per cent of the total solid waste generated in the country. Goa produces 60gm/capita/day and whereas Delhi produces 37gm/capita/day of plastic waste. The national average stands at 8gm/capita/day. An IIT Kharagpur study in July 2018 found more than one-fifth of the silt that clogs Delhi’s drains during the monsoon months to be made up of empty gutkha and pan masala packets. What is generally understood is that polystyrene (PP and PS) and low- density polystyrene (LDPE) are only partially recyclable; most of the times, they are not recycled due to their economic unviability. The 2015 CPCB study had noted that 94 per cent of the total plastic waste was thermoplastics, which — it said — would be recyclable; only 6 per cent was thermoset plastic which could not be recycled.

 

The concept of bio-mining

 

A path-breaking bio-mining concept has helped Kumbakonam Municipality, Tamil Nadu reclaim a vast area that was used as a garbage dump on the outskirts of the temple town. The pioneering dump site bio mining concept is a simple, low-tech, quick and environmental friendly measure to remedy old open waste dumps to achieve near zero emission of landfill gases and leach. Loosened layers of old waste are sprayed with composting bio cultures and then formed into conventional aerobic windrows on the site. The waste is then sterilised, stabilised, and readied for segregation using machinery as organic and inorganic substances which will be later sent for recycling, re-using or composting. The important steps involved can be depicted as below:

 

Handpicking large objects involve aggregates such as coconut shells, plastics, wood, rubber, glass, inert, and soil enriching bio earth. While coconut shells and wood are sold as fuel, rubber and glass are sent for recycling industries. Plastic is supplied to recycling plants and cement plants.

 

 

Multilayer plastic

 

Multilayer plastic is any material used or to be used for packaging and having at least one layer as the main ingredient in combination with one or more layers of materials such as paper, paperboard, polymeric materials, metalised layers or aluminium foil either in the form of a laminate or co-extruded structure. According to Plastic waste management rules, 2016 carry bags made of virgin or recycled plastic shall not be less than 50 microns in thickness. Carry bags are problematic because they are difficult to recycle, and it is almost impossible to regulate their thickness. Recently, the Coimbatore City Municipal Corporation began a drive under the Smart City Initiative to introduce bio-bags that could serve as an alternative. The bags are known to be soluble in water and decompose within three-four months.

 

The statement that India would phase out single-use plastics by 2022 was a reiteration of the commitment that the Indian government had made in 2018. On World Environment Day (June 5), 2018, the then environment minister Sh. Harsh Vardhan had announced that single-use plastics would be phased out in the country by 2020; the deadline was later revised to 2022. The Airports Authority of India has declared 55 out 134 airports as single-use plastics free.

 

Extended producer responsibility

 

Out of the total plastic waste produced from 1950-2015, only 9% has been recycled. The rest has ended up in landfills or in the environment — oceans and water bodies. Low household segregation and weak collection and transportation systems that support source segregation inhibit the recycling of plastics. This is why the world is looking at the system of Extended Producer Responsibility (EPR) — where the producer of plastic would be responsible to take the product back and recycle it. But this is easier said than done.

The Plastic Waste Management Rules, 2016 define EPR as the responsibility of a producer for environmentally sound management till the end of life of the product. The ‘producer’ is defined in such a way that it covers all manufacturers, importers and users (brand owners). Section 9(2) of the Rules says the primary responsibility for collection of used multi-layered plastic sachets or pouches or packaging is of producers, importers and brand owners who introduce the products in the market. They need to establish a system for collecting back the plastic waste generated by their products. Section 13 of the Plastic Waste Management Rules, 2016 also require producers and brand owners to register themselves with the state pollution control board or the CPCB (if operating in more than two states). However, the March 27, 2018 amendment to the Rules, which substituted “non-recyclable multi-layered plastic” with “multi-layered plastic which is non-recyclable or non-energy recoverable or with no alternate use” has further weakened the Rules. This gave producers a loophole to claim that packaging material, if not recycled, can be put to some other use.

 

In the business of waste management, there has been the emergence of Producer Responsibility Organisations (PROs) — a third party that facilitates the responsibility of producers to take back waste from the open market, recycle or process, and file compliance. So, brand owners and other producers of plastic now hire an agent — PRO — to do the work; they pay for both the cost of collection and the cost of ensuring compliance. However, the PRO does not find a mention in the Plastic Waste Management Rules, 2016, nor in the amendment of 2018. So, CPCB withdrew the PRO scheme and the Board advised producers and other stakeholders to plan their EPR implementation as per the requirements of the Plastic Rules of 2016, as amended in 2018, and engage agencies at their discretion.

 

Non-compliance with EPR– On April 24, 2019, the CPCB asked 52 companies and nine industries to submit their EPR plans according to the Plastic Waste Management (PWM) Rules, 2016. The defaulters were made liable for action under the Environment Protection Act (EPA), 1986/National Green Tribunal (NGT) Act, 2010. This was the first time that the CPCB held companies accountable for not complying with the PWM Rules, 2016. The undertaking submitted by these companies takes responsibility to collect back and dispose of 20 per cent of the used multi-layered plastic (MLP) and other plastics produced/used by their brands. This was proposed to be eventually escalated to 100 per cent in three years.

 

On June 25, 2019, the CPCB issued directions for producers/importers/ brand owners (called PIBO) providing an outline for framing the action plan under EPR for plastic waste management. It included three ways-

 

  • Through own distribution channel: The Plastic Producers, Importers and Brand Owners (PIBO) must have a contract with a recycler or can send the waste for disposal to cement plants etc. A documentary proof is to be submitted to the CPCB.

 

  • Through Urban Local Bodies: The ULB would make the contract with the recycler or with a cement plant etc.

 

  • Through an agency, which, in turn, would either contract with a ULB or a recycler or a cement plant for plastic waste management.

 

It is to be noted that in all such cases, waste collected should be equivalent to the estimated quantity of plastic waste generated. The PIBO is required to file quarterly reports on the progress made in waste collection and processing. Manufacturers and PIBOs will share the details about the type of plastic used in packaging and the quantity consumed.

Recycling

 

As per the 2016 Rules, all persons recycling or processing waste or proposing to recycle or process plastic waste are required to apply to the State Pollution Control Board (SPCB) for grant of registration.

 

Agenda

 

  • Inventorise plastic waste– not just in terms of how much we produce, but what happens to the waste after it is used and thrown.

 

  • Ban/restrict multi-layered plastic and sachets that cannot be recycled– we need to take a tough view on this, as the current system provides for industry to continue to manufacture and use plastic that is unfeasible to recycle.

 

  • Minimise, reduce and then work to recycle– Many states in India have come up with bans on what they have categorised as single-use plastic.

 

  • Include the business of plastic waste recycling in policy and provide it incentives.

 

  • Start implementing the EPR system as provided in Plastic Waste Management Rules, 2016

 

  • Ensure enforcement of segregation at source by local governments– It is clear that re-processing, recycling or any kind of material recovery from making a new product or for energy recovery — is only possible if plastic waste is not contaminated and is segregated. This can best (and possibly only) be done at the household/institutional level.

 

References

  1. Managing plastic waste in India- challenges and agenda- A report published by Centre for Science and Environment. https://www.cseindia.org/content/downloadreports/10352
  2. https://www.thehindu.com/news/national/tamil-nadu/kumbakonam-municipality-adopts-bio-mining-reclaims-garbage-dump/article8477773.ece.

 

– Shreya, Deputy Manager (Environment)

 

 

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   1 comment

पर्यावरण शब्दकोष (8)

Image source : https://www.motherearthnews.com/nature-and-environment/preserving-biodiversity-zmaz81mjzraw

क्र. शब्द                                                         अर्थ
1 चेरनोबिल रेडियोधर्मी आपदा (Chernobyl Radioactive Disaster ) 1986 में  यूक्रेन के चेरनोबिल परमाणु ऊर्जा संयंत्र की दुर्घटना एक दोषपूर्ण रिएक्टर डिजाइन का परिणाम थी जो अपर्याप्त प्रशिक्षित कर्मियों के साथ संचालित की गई थी। दुर्घटना के  परिणामस्वरूप विस्फोटक  भाप और आग के साथ रेडियोधर्मी रिएक्टर के 190 मीट्रिक टन यूरेनियम का 30 प्रतिशत पर्यावरण में फ़ैल गया , और सोवियत संघ ने अंततः रिएक्टर के चारों ओर 19 मील-चौड़ा “अपवर्जन क्षेत्र” स्थापित करते हुए 3,35,000 लोगों को विस्थापित किया था । दुर्घटना की रात विस्फोट के कारण चेरनोबिल संयंत्र के  दो श्रमिकों की मृत्यु हो गई और तीव्र विकिरण सिंड्रोम के परिणामस्वरूप कुछ ही हफ्तों में 28 और लोगों की मौत हो गई थी जबकि 100 से अधिक घायल हुए थे । वैज्ञानिकों का अनुमान है कि दुर्घटनाग्रस्त संयंत्र के चारों ओर का क्षेत्र 20,000 वर्षों तक रहने योग्य नहीं होगा।
2 चरमोत्कर्ष समुदाय

(Climax community)

चरमोत्कर्ष समुदाय (Climax community) शब्द का उपयोग किसी पारिस्थितिक समुदाय के  उत्तरवर्तन  (succession)  के अंतिम चरण को व्यक्त करने के लिए किया जाता है। इसमें प्रजातियों की आबादी स्थिर हो जाती है और एक-दूसरे व आपसी पर्यावरण के साथ संतुलन में रहती है। इस प्रक्रिया में अक्सर हजारों और संभवतः लाखों साल लगते हैं।चरमोत्कर्ष समुदाय में परिवर्तन हो सकता है यदि जलवायु में परिवर्तन हो या एक या अधिक प्रजातियों में दीर्घकालिक विकासवादी परिवर्तन हो जाए।
3 क्षोभमंडल

(Troposphere)

क्षोभमंडल पृथ्वी के वायुमंडल की सबसे निचली परत है। वायुमंडल का अधिकांश द्रव्यमान (लगभग 75-80%) क्षोभमंडल में है। क्षोभमंडल का विस्तार क्षोभ-सीमा तक होता है, जो पृथ्वी की सतह से लगभग 10–18 किमी (6–11 मील) ऊपर है।अधिकांश प्रकार के बादल क्षोभमंडल में पाए जाते हैं, और लगभग सभी मौसम परिवर्तन  वायुमंडल की इस परत के भीतर होते हैं। ऊंचाई के साथ घटता तापमान इस मंडल की विशेषता है।
4  

क्षोभ-सीमा

(Tropopause)

क्षोभ-सीमा, क्षोभमंडल  तथा समताप मंडल (stratosphere) के मध्य का सीमा-स्तर है , जहां ताप के ह्रास-दर में यकायक परिवर्तन हो जाता है। इसकी ऊँचाई ऋतुओं एवं मौसमों के अनुसार बदलती रहती है। परंतु विषुवत रेखा पर यह लगभग 18 किलोमीटर तथा ध्रुवों पर 6 किलोमीटर है।
5  

क्षारीयता/खारापन  

(Alkalinity)

पानी में विघटित क्षारीय पदार्थों की माप (7.0 पीएच से अधिक) क्षारीयता कहलाती है । इससे  पानी द्वारा अम्ल को बेअसर करने की क्षमता का भी पता चलता है।  क्षारीयता के तीन प्राथमिक प्रकार हैं: बाइकार्बोनेट, कार्बोनेट और हाइड्रॉक्साइड। अन्य प्रकार के क्षारीयता भी हैं जो कुल क्षारीयता में योगदान करते हैं, जैसे कि स्यान्यूरेट (cyanurate)  क्षारीयता।
6 जल/पानी

(Water)

जल / पानी एक पारदर्शी, गंधहीन, स्वादहीन तरल, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का एक यौगिक होता है जो 32 ° F या 0 ° C पर जमने वाला और 212 ° F या 100 ° C पर उबल जाता है।  पानी समुद्रों, झीलों, नदियों और वर्षा का निर्माण करता है और यह समस्त जीवों के तरल पदार्थों का आधार है।
7 जलजनित रोग

(Waterborn disease)

जलजनित रोग वे हैं जो दूषित पानी के अंतर्ग्रहण द्वारा संचारित होते हैं। महत्वपूर्ण जलजनित रोगों में डायरिया, हैजा, टाइफाइड, हेपेटाइटिस ए व ई और पोलियोमाइलाइटिस शामिल हैं।
8 जैविक (biotic) एक पारिस्थितिकी तंत्र में जैविक घटक सभी जीवित चीजें होती हैं। इसके अंतर्गत जीव-जंतु, पेड़- पौधे और सूक्ष्मजीव शामिल हैं। जैविक घटकों में जीवित जीव के साथ-साथ मृत जीवों के अपशिष्ट भी शामिल होते हैं।
9 जलोढ़ मिट्टी

(Alluvial soil)

नदियों, बाढ़ आदि द्वारा छोड़ी गई मिट्टी जो रेत और भूमि से मिलकर बनी होती है, जलोढ़ मिट्टी कहलाती है । यह मिट्टी उन स्थानों पर भी पाई जाती है जहाँ कभी नदी बहती थी।
10 जैव-विविधता

(Biodiversity)

जैव-विविधता, विभिन्न स्रोतों से जीवों के बीच की भिन्नता है साथ ही साथ यह हमारे ग्रह की सबसे जटिल और महत्वपूर्ण विशेषता भी है। यह पृथ्वी पर जीवन की समृद्धि और विविधता का वर्णन करती है। इस के बिना पृथ्वी पर जीवन कायम नहीं रह सकता। इसके अंतर्गत स्थलीय, समुद्री और रेगिस्तानी पारिस्थितिक तंत्र के अलावा पृथ्वी पर उपस्थित समस्त पारिस्थितिक तंत्र शामिल है जो साथ मिलकर जैव-विविधता का निर्माण करते हैं।

 

पूजा सुन्डी

उप प्रबंधक (पर्यावरण)

 

Source : Internet/Google

  • https://www.nationalgeographic.com/culture/topics/reference/chernobyl-disaster/
  • dictionary.com
  • https://socratic.org/questions/what-is-a-climax-community
  • https://www.britannica.com/science/troposphere
  • https://hindi.indiawaterportal.org
  • https://blog.orendatech.com/what-is-alkalinity
  • https://www.usgs.gov/
  • https://www.britannica.com/science/water
  • https://www.medicinenet.com/waterborne_bacterial_disease/definition.htm
  • https://study.com/academy/lesson/what-is-biotic-definition-factors-examples.html
  • https://www.collinsdictionary.com/dictionary/english/alluvial
  • https://byjus.com/biology/biodiversity/

 

 

पर्यावरण शब्दकोश (7)

 

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   0 comment

एनएचपीसी में रिमोट सेंसिंग तथा जीआईएस प्रयोगशाला का उद्घाटन

 

एनएचपीसी, निगम मुख्यालय में दिनांक 14/01/2021 को ‘रिमोट सेंसिंग तथा जीआईएस प्रयोगशाला’ का उद्घाटन श्री ए.के. सिंह, सीएमडी, एनएचपीसी द्वारा सभी निदेशकगणों और वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में किया गया।

 

इस अवसर पर श्री ए.के. सिंह ने कहा कि एनएचपीसी आधुनिक तकनीकों के प्रयोग के लिये हमेशा प्रतिबद्ध रहा है और यह प्रयोगशाला हमारे निगम की पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता को भी प्रदर्शित करती है तथा निगम में अंतरिक्ष चित्रों के माध्यम से  पर्यावरण की बेहतर मॉनिटरिंग  और अध्ययन संभव हो सकेगा।

 

अपने स्वागत उद्बोधन में कार्यपालक निदेशक श्री एन एस परमेश्वरण ने यह जानकारी प्रदान की कि विभाग द्वारा प्रयोगशाला का आरम्भ करने के साथ ही रिसर्च एवं डेवलपमेंट के तहत दो परियोजनाओं को अध्ययन के लिये लिया है- पहली: “रंगित परियोजना का निर्माण पश्चात आंकलन और अंतरिक्ष चित्र आधारित पर्यावरण अध्ययन।“ दूसरी: “परियोजना के तहत सेवा-II परियोजना का सामाजिक-आर्थिक अध्ययन” किया जा रहा है।

 

इसी कड़ी में श्री गौरव कुमार, उप महाप्रबंधक (पर्यावरण) ने “रिमोट सेंसिंग एवं जीआईएस प्रयोगशाला की स्थापना एवं उपयोगिता पर एक प्रस्तुति प्रदान की जिसमें समग्रता से प्रयोगशाला के उद्देश्य, संचालित परियोजनायें व अब तक किये गये कार्यों की क्रमवार जानकारी प्रदान की गयी।  कार्यक्रम का समापन में श्री वी आर श्रीवास्तव, महाप्रबंधक (योजना-पर्यावरण) के द्वारा दिये गये धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन श्री राजीव रंजन प्रसाद, वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण) द्वारा किया गया।

 

इस रिमोट सेंसिंग प्रयोगशाला की स्थापना एनएचपीसी के पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग द्वारा की गयी है।  इसे आरम्भ किये जाने का उद्देश्य अपनी सभी परियोजनाओं के पर्यावरण पर सतत निगरानी रखना है साथ ही इस माध्यम से रिसर्च और डेवलपमेंट कार्यों को आगे बढाना है। रिमोट सेंसिंग एक ऐसी उन्नत तकनीक है जिसके माध्यम से बिना किसी भौतिक सम्पर्क के पृथ्वी के धरातलीय रूपों और संसाधनों का अध्ययन, वैज्ञानिक विधि से किया जाता हैं। कोविड की परिस्थितियों को देखते हुए यह कार्यक्रम विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सम्पन्न हुआ।

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   0 comment

इस अंक की तस्वीर

एनएचपीसी  के निगम मुख्यालय में दिनांक 14/01/2021 को पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग द्वारा स्थापित

रिमोट सेंसिंग तथा जीआईएस प्रयोगशालाका उद्घाटन करते हुए श्री .के. सिंह, सीएमडी, एनएचपीसी

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   0 comment

इस अंक की तस्वीर

Orchid : Dendrobium anceps Sw.

 

 

उपरोक्त तस्वीर एनएचपीसी के तीस्ता लो डैम-III एवं IV परियोजनाओं के अंतरगर्त स्थापित ऑर्किडेरियम (Orchidarium) एवं वनस्‍पतिशाला (Arboretum) में पुन : स्थापित किए गए जंगली ऑर्किडस में से एक ऑर्किड नामत: Dendrobium anceps Sw. की है। यह ऑर्किडेरियम/वनस्‍पतिशाला वन्यजीव/जैव विविधता संरक्षण योजना के अंतर्गत ‘रियांग, दार्जलिंग जिला, पश्चिमी बंगाल’ में दार्जिलिंग वन विभाग एवं नॉर्थ बंगाल विश्व विद्यालय के माध्यम से विकसित किया गया है । ऑर्किड की यह प्रजाति 200 से 1400 मीटर की ऊंचाई पर असम, बांग्लादेश, पूर्वी हिमालय, नेपाल, भूटान, सिक्किम, अंडमान द्वीप समूह, म्यांमार, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया, निकोबार द्वीप समूह और वियतनाम में उष्णकटिबंधीय और उपोष्ण घाटियों में पाया जाता है। एक फूल आमतौर पर कुछ हफ़्ते तक रहता है। फूल में एक अलग खुशबू (एप्पल-पाई की तरह ) पाई जाती है । इसके फूल सुबह में सुगंधित होते हैं। Dendrobium anceps Sw.  को उनके सुंदर पर्णसमूह के लिए भी जाना जाता है। इस खूबसूरत आर्किड के अस्तित्व के लिए, संरक्षण कार्य करना आवश्यक है।

 

रितुमाला गुप्ता, वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

Category:  Environment


 |    November 9, 2020 |   0 comment

पर्यावरण वार्ता (अंक 13 )

 

पर्यावरण ब्लॉग के नवीन अंक में हम सतत विकास की संकल्पना पर बात करते हैं। संज्ञान में लें कि पर्यावरण और विकास की बहस बहुत पुरानी है तथा दोनों को एक-साथ देखने की दृष्टि ही सतत विकास की अवधारणा है। पहले ही महात्मा गाँधी ने भांप कर कहा था कि “प्रकृति प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन एक भी मनुष्य के लालच को वह पूरा नहीं कर सकती”, इसे समझते हुए  यदि गंभीरतापूर्वक देखें तो वैश्विक स्तर पर सतत विकास की अवधारणा का जन्म पर्यावरण की चिंताओं के दृष्टिग्त नहीं हुआ है। प्रकृति ने स्वयं अवरोध उत्पन्न किये कि विश्व को अपनी हवा, अपने पानी और अपनी मिट्टी की चिंता  करने के लिये मजबूर होना पड़ा। इस बाध्यता का कारण भी बाजार के हित में ही अंतर्निहित था। व्यापारी हो चुके राष्ट्रों को अपने आर्थिक लाभ प्रभावित होने और उत्पादन प्रणालियों के बंद हो जाने का भय सताने लगा था। जिन राष्ट्रों की पूर्ण निर्भरता अपने औद्योगिक उत्पादनों पर थी वे अब ऐसी तकनीक चाहते थे जो विकास का पहिया भी न रुकने दे और उनके कारण पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों की कुछ रोकथाम भी सम्भव हो।

 

उत्पादों के द्वितीयक प्रभावों ने भी उत्पादक राष्ट्रों की चिंता बढा दी थी उदाहरण के लिये डीडीटी जैसे कीटनाशक अगर मच्छर की रोकथाम कर रहे थे तो उसके मानवजीवन पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव अब वैज्ञानिकों की चिंता का कारण बनने लगे थे। वर्ष 1962 में वैज्ञानिक रॉकल कारसन की किताब ‘दी साइलेंट स्प्रिंग’ ने डीडीटी के प्रभावों को सामने लाकर सतत विकास के दृष्टिकोण को नई दिशा प्रदान की। यह पुस्तक यह संदेश प्रदान करने में सफल रही कि एक उत्तम निष्कर्ष के लिये भी नकारात्मक प्रभावों की अनदेखी करना घातक हो सकता है। इसी कड़ी में वर्ष 1968 में प्रकाशित पॉल इहरलिच की पुस्तक ‘पॉप्युलेशन बम’ को भी गिना जाना चाहिये जिसके माध्यम से बढ़ती जनसंख्या द्वारा संसाधनों के दोहन पर प्रकाश डालते हुए पर्यावरण संरक्षण पर गहरी चिंता वयक्त की गयी थी। पर्यावरण की इन आरम्भिक चिंताओं पर ठोस प्रहार करते हुए वर्ष 1971 में आर्थिक सहयोग तथा विकास संगठन “पॉल्यूटर्स पे” सिद्धांत के साथ सामने आया जिसका मूल भाव था कि प्रदूषण फैलाने वाले देशों को पर्यावरण की सुरक्षा-संवर्धन का खर्च उठाना चाहिये। यह सिलसिला अपने परिणाम तक वर्ष 1972 में पहुँचा जब स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में पर्यावरण पर केंद्रित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन आयोजित किया गया था। सारी दुनिया अब एकमत थी कि विकास के साथ-साथ पर्यावरण का भी समुचित रूप से संरक्षण होना चाहिये। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की स्थापना के साथ पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा में सतत विकास की दृष्टि समाहित हुई। इसके पश्चात से लम्बा समय सतत विकास के दृष्टिगत विश्व के विज्ञानिकों को कार्य करते हुए हो गया है। हमारा प्रयास ऐसा ही विकास होना चाहिये जिसमें प्रकृति को हुई हानि को न्यूनतम किया जा सके और उत्पादन का लाभ भी हो। एनएचपीसी अपनी सभी परियोजनाओं में सतत विकास के लक्ष्यों को निर्धारित करती है और  इस  दिशा में कार्य करने हेतु उद्यत है।

 

 

एन.एस. परमेश्वरन

कार्यपालक निदेशक

 

 

Image Source : https://www.petersons.com/blog/environmental-jobs-green-jobs-in-sustainable-development/

Category:  Environment


 |    November 9, 2020 |   0 comment

Frequently Asked Questions (FAQs) 5

Image Source = https://www.eagrovision.com/wp-content/uploads/2019/09/15632752926.jpg

 

GREENHOUSE GASES AND GLOBAL WARMING

 

 Q. What are Greenhouse Gases?

Greenhouse gases are gases in Earth’s atmosphere that trap heat. They let sunlight pass through the atmosphere, but they prevent the heat that the sunlight brings from leaving the atmosphere. The main greenhouse gases are:

  1. Water vapor
  2. Carbon dioxide
  3. Methane
  4. Ozone
  5. Nitrous oxide
  6. Chlorofluorocarbons

 

Q. What is the Greenhouse Effect?

The greenhouse effect is a process that occurs when gases in Earth’s atmosphere trap the Sun’s heat. This process makes Earth much warmer than it would be without an atmosphere. The greenhouse effect is one of the things that makes Earth a comfortable place to live.

 

Q. How does the Greenhouse Effect work?

As you might expect from the name, the greenhouse effect works like a greenhouse. A greenhouse is a building with glass walls and a glass roof. Greenhouses are used to grow plants, such as tomatoes and tropical flowers. A greenhouse stays warm inside, even during the winter. In the daytime, sunlight shines into the greenhouse and warms the plants and air inside. At night time, it’s colder outside, but the greenhouse stays pretty warm inside. That’s because the glass walls of the greenhouse trap the Sun’s heat.

 

The greenhouse effect works much the same way on Earth. Greenhouse gases in the atmosphere, such as carbon dioxide, trap heat just like the glass roof of a greenhouse. During the day, the Sun shines through the atmosphere. Earth’s surface warms up in the sunlight. At night, Earth’s surface cools, releasing heat back into the air. But some of the heat is trapped by the greenhouse gases in the atmosphere. That’s what keeps our Earth warm.

 

Q. What contributes to Global Warming?

There are scientific evidences that human activities are causing global warming by generating more and more greenhouse gases. The main sources of global warming are:

  1. Burning of fossil fuels like coal and oils for electricity generation,
  2. Land-use changes (particularly deforestation),
  3. Agriculture and
  4. Transport.

 

Q. What are the effects of Global Warming?

Each year, scientists learn more about the consequences of global warming and many agree that environmental, economic and health consequences are occurring which will further intensify if current trends continue. Here’s just a smattering of what we look forward to:

  1. Melting glaciers, early snowmelt and severe droughts will cause more dramatic water shortages and increase the risk of wildfires.
  2. Rising sea levels will lead to coastal flooding.
  3. Forests, farms and cities will face troublesome new pests, heat waves, heavy downpours and increased flooding. All those factors will damage or destroy agriculture and fisheries.
  4. Disruption of habitats such as coral reefs and Alpine meadows could drive many plant and animal species to extinction.
  5. Allergies, asthma, and infectious disease outbreaks will become more common due to increased growth of pollen-producing ragweed, higher levels of air pollution, and the spread of conditions favorable to pathogens and mosquitoes.

 

What can we do to prevent Global Warming?

In order to prevent global temperatures from increasing more than 2 degrees above pre-industrial levels, current climate science suggests that atmospheric CO2 concentrations should not exceed 450ppm. This requires global emissions to decline to roughly 80% below 1990 levels by the year 2050.  Such dramatic emissions reductions require a sharp move away from fossil fuel, significant improvements in energy efficiency and substantial reorganisation of our current economic system.  This transition can only be achieved by far-reaching national and international climate policies.

 

[Contribution by: Brahmeshwar Kumar, Senior Manager (Environment)]

Refrences : 

www.unfccc.int

www.ipcc.ch

www.carbonaction.co.uk

 

 

 

Frequently Asked Questions (FAQs) 4

 

 

Category:  Environment


 |    November 9, 2020 |   0 comment

Bhringaraj – the little hairy daisies

image source : https://kalakkalsamayal.blogspot.com/2014/03/bhringaraj-thuvaiyal.html

 

Nomenclature

Scientific Name: Eclipta prostrata (Eclipta alba – old)

Hindi & Sanskrit: Bhringaraj

English: False daisy

Tamil: Karisalankanni


Ever noticed those little daisies among the weeds? A small herbaceous plant with flowers that look like tiny replicas of the white daisies and asters. With a white and green centre and hairy white little petals closely arranged. If yes, you are looking at the best ever medicine in Ayurved for growing good hair. Commonly called in English as false daisy, Bhringaraj or Eclipta prostrata is considered to be an all in one solution for hairfall, hair growth as well as for a good black colour and texture for hair. Wherever the moms know it, they make special oils for daughters by cooking coconut oil with a paste of bhringaraj leaves, for good hair growth. Bhringaraj is a commonly used ingredient in commercial ayurvedic hair oils as well. But the plant is such a common plant that anybody who has the slightest interest in plants would not miss those tiny little white flowers that grow among weeds in moist places. The plant flourishes at places which are always moist – near paddy fields, drains, and in kitchen backyards at portions which never dry up. Sometimes in well-watered lawns too, like in the little lawn behind Jyoti Sadan, NHPC. The plant belongs to the sunflower family Asteraceae and is a herbaceous perennial.

 

Medicinal value:

Bhringaraj is classically known for its strengthening and rejuvenating actions upon the scalp and within the hair follicles. Polypeptides present in bhringaraj have demonstrated hypotensive properties, but also strong anti-inflammatory activity throughout the body, including the skin. In the liver, bhringaraj has demonstrated the ability to regulate the production of hepatic enzymes. It is a strong hepato-protective, supporting the correct balance of liver enzymes, ensuring efficient and effective liver metabolism.

 

-Anitha Joy , Sr. Manager (Environment)

Reference – medicinal value

https://www.herbalreality.com/herbs/bhringaraj/

Category:  Environment


 |    November 9, 2020 |   0 comment

पर्यावरण शब्दकोश (7)

Image Source : http://www.kopin.org/food-for-thought/#post/0

 

क्र. शब्द अर्थ
1 कच्छ

(Swamp/Marsh)

 

यह भूमि का वह क्षेत्र है जो स्थायी रूप से संतृप्त या पानी से भरा होता है। यह मुख्यत: दो प्रकार का होता है- मीठे पानी का कच्छ/दलदल और खारे पानी का दलदल। मीठे पानी के दलदल आमतौर पर अंतर्देशीय, जबकि खारे पानी के दलदल तटीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। दलदल संक्रमण क्षेत्र हैं। ये न तो पूरी तरह से भूमि हैं और न ही पूरी तरह से पानी। इन्हें अक्सर उन प्रकार के पेड़ों से नामित किया जाता है जो उनमें उगते हैं- जैसे कि सरू के दलदल  (cypress swamp)  या कठोर लकड़ी के दलदल (hardwood swamp) ।

 

2 क्लोरोफ्लोरोकार्बन

(Chlorofluorocarbon)

 

क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) कार्बन, फ्लोरीन और क्लोरीन के परमाणुओं से युक्त गैर-विषाक्त व गैर-ज्वलनशील रसायन है। इसका उपयोग एरोसोल स्प्रे के निर्माण, फोम और पैकिंग सामग्री के एजेंटों में तथा रेफ्रिजरेंट और  सॉल्वैंट्स के रूप में किया जाता है।  क्लोरोफ्लोरोकार्बन में मौजूद क्लोरीन परमाणु वायुमंडलीय ओजोन के साथ प्रतिक्रिया कर ओजोन अणुओं के ऑक्सीजन में रूपांतरण का कारण बन, पृथ्वी की ओजोन परत को नुकसान पहुंचाते हैं । सीएफसी के उपयोग पर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल द्वारा वैश्विक प्रतिबंध लगाया गया है।

 

3 खाद

(Compost /manure)

खाद का उपयोग पौधों के पोषक तत्वों के स्रोत के रूप में किया जाता है। यह मृत पौधों और जानवरों का विघटित रूप है जिनको उत्पादन बढ़ाने के लिए मिट्टी में मिलाया जाता है। खाद विघटन के बाद पोषक तत्व में रूपांतरित हो जाते हैं। मानव और पशु उत्सर्जन का उपयोग भी खाद के रूप में भी किया जाता है। ऐसा खाद नाइट्रोजन, फास्फोरस, और पोटेशियम से समृद्ध होताहै।  यह उर्वरक का एक प्राकृतिक रूप है जिसके द्वारा मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है। इससे कोई प्रदूषण नहीं होता है एवं यह एक मूल्यवान, धारणीय और नवीकरणीय संसाधन है।

 

4 खरपतवार

(Weed)

 

कोई भी जंगली पौधा जो अवांछित जगह पर उगता है, विशेष रूप से किसी बगीचे या खेत में जहाँ यह खेती किए गए पौधों को स्वतंत्र रूप से बढ़ने से रोकता है, खरपतवार कहलाता है । एक खरपतवार कोई भी पौधा हो सकता है जिससे अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य और आम जनता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ताहै। खरपतवारों को आक्रामक पौधों के रूप में भी जाना जाता है।यह आमतौर पर बड़ी संख्या में बीजों का उत्पादन करते हैं, जिससे उनके प्रसार में सहायता मिलती है।खरपतवार विदेशी या देशी प्रजाति हो सकती है जो एक पारिस्थितिकी तंत्र में अपना उपनिवेश बना लेती जिसमें यह पहले मौजूद नहीं था।

 

5 खरपतवार नाशक

(Weedicide / weed killer)

 

खरपतवार नाशक वे रसायन होते हैं जो खरपतवार से छुटकारा पाने के लिए खेत में छिड़क दिए जाते हैं। इनका उपयोग विशेष फसलों में खरपतवारों के विकास को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। ये अवांछित पौधों को मारने के लिए बनाए गए हैं एवं इसके प्रभाव से बाकी की फसल को नुकसान नहीं पहुँचता । खरपतवार नाशक में उपस्थित विषाक्त पदार्थ मनुष्यों में कैंसर और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण हो सकते हैं। इसके अलावा ये पदार्थ बारिश या किसी अन्य तरीके से भूजल तक पहुंच कर पानी के द्वारा मानव प्रणाली में प्रवेश करते हैं।

 

6 खारा जल

(Saline/brackish water)

 

खारा जल वह पानी है जो ताजे पानी की तुलना में नमकीन है, लेकिन समुद्री पानी जितना नमकीन नहीं है।  अक्सर ये ताजा और समुद्री पानी के बीच संक्रमणकालीन क्षेत्र में पाया जाता है।यह ताजे पानी के साथ समुद्र के पानी के मिश्रण के परिणामस्वरूप हो सकता है जैसा कि नदियों के मुहाने का पानी। कुछ खास मानवीय गतिविधियां भी खारे पानी का उत्पादन कर सकती हैं, जैसे कुछ सिविल इंजीनियरिंग परियोजनाओं द्वारा तटीय दलदली भूमि में उत्पन्न बाढ़ । खारे पानी में अधिकांश स्थलीय पौधों की प्रजातियों को नुकसान पहुँचता है। उपयुक्त प्रबंधन के बिना यह पर्यावरण के लिए हानिकारक है।

7 खनिज

(Mineral)

 

 

खनिज प्राकृतिक रूप से उपलब्ध अकार्बनिक ठोस है, जो एक निश्चित रासायनिक संरचना और परमाणु व्यवस्था  का अनुसरण करता है । खनिज की कई हजार ज्ञात प्रजातियां हैं, जिनमें से लगभग 100 खनिज ऐसे हैं जो चट्टानों के प्रमुख घटक हैं और चट्टान बनाने वाले खनिज कहलाते हैं।

 

 

8 गाद

(Silt)

 

गाद ठोस धूल की तरह का तलछट है जो पानी, बर्फ या हवा के द्वारा परिवहन और जमा किया जाता  है।यह चट्टान और खनिज के कणों से बनते हैं जिनका आकार मिट्टी के कणों से बड़ा लेकिन रेत कणों से छोता होता है। एकल गाद के कण इतने छोटे होते हैं कि उन्हें देखना मुश्किल होता है। गाद के रूप में वर्गीकृत होने के लिए एक कण को 0.5 सेंटीमीटर (.002 इंच) से कम होना चाहिए।यह मिट्टी और रेत के महीन टुकड़े हैं जो किसी नदी या झील के तल पर तलछट के रूप में पाए जाते हैं। यदि किसी नदी में बहुत अधिक गाद बहती है, तो वह गन्दा दिखता है।

 

9 चिकित्सकीय अपशिष्ट

(Medical / Biomedical waste)

 

चिकित्सा अपशिष्ट वैसे अपशिष्ट है जिसमें संक्रामक सामग्री (या ऐसी सामग्री जो संभवत: संक्रामक है) पाए जाते हैं। इसके अंतर्गत चिकित्सकों के कार्यालयों, अस्पतालों, दंत चिकित्सा पद्धतियों, प्रयोगशालाओं, चिकित्सा अनुसंधान सुविधाओं और पशु चिकित्सा क्लीनिक जैसी स्वास्थ्य सुविधाओं से उत्पन्न अपशिष्ट शामिल हैं।इस कचरे में शारीरिक तरल पदार्थ जैसे रक्त या अन्य संदूषक हो सकते हैं। इसे चिकित्सा अनुसंधान, परीक्षण, निदान, टीकाकरण या मानव या जानवरों के उपचार के दौरान उत्पन्न कचरे के रूप में  भी परिभाषित किया गया है। कुछ उदाहरण हैं – पट्टियाँ, दस्ताने, सुइयां, ऊतक, परित्यक्त शल्य औजार आदि।

 

10 चिपको आंदोलन

(Chipko movement)

 

यह 1973 में एक अहिंसक आंदोलन था जिसका उद्देश्य पेड़ों की सुरक्षा और संरक्षण करना था। तत्कालीन उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड ) के चमोली जिले  में पेड़ों की कटाई के खिलाफ विद्रोह और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने हेतु इस आन्दोलन की शुरुवात हुई और कुछ ही समय में यह आन्दोलन उत्तर भारत के अन्य राज्यों में भी फैल गया। आंदोलन का नाम ‘चिपको’ इसलिए पड़ा क्योंकि लोगों ने पेड़ों को गले लगाया और काटने से बचाने के लिए उन्हें घेरा।

 

 

पूजा सुन्डी, उप प्रबंधक (पर्यावरण)

(स्रोत : इन्टरनेट/गूगल)

 

 

पर्यावरण शब्दकोश (6)

Category:  Environment


 |    November 9, 2020 |   0 comment

An eco-friendly wedding

 

The colourful flowers and petals, vibrant themes, swinging chandeliers and happily ever after chants that fill the air with love and laughter brings the onset of wedding season in India.  Amidst sonorous and booming musical tones coming from life sized speakers the concept of an eco-friendly wedding becomes just a meagre whisper. A tonne of waste is produced through decorative items, food, disposable plates, cups, used tissues, etc. Colossal amount of plastic waste, food waste, food leftover is generated during such ceremonies. As we know plastic takes hundreds of years to decompose, generating more of it has lead to man-made mountains of waste and at some places reaching the height of Qutub Minar in Delhi. Inappropriate knowledge on how to organize various associated events in an environment friendly manner ultimately leads to causing harm to the environment and indirectly to us. Unfortunately, the fact regarding indirect harm to the mankind is understood by very few. Various steps can be taken at wedding functions to avoid sending waste to the already piling landfills.

 

A few measures that can be easily adopted in wedding scenes are as under:

 

Going back to steel :

This avoids the use of disposables and hence reduces waste. On an average one person generates a minimum of 5 pieces of disposables at a wedding. Nowadays, Indian weddings are extravagant and a costly affair. It is interesting to note that in India before 1990’s weddings used to be very environment friendly keeping minimal use of everything which produced less waste. With seasonal flowers for decorations, food served on banana leaves or reusable earthen pots, steel plates, glasses etc. and the simplicity of pandal beautification using materials that were bio-degradable never went out of fashion. The used banana leaves were then fed to cows who would digest the fibrous material (that would otherwise take months to decompose) and produce manure the other day. The practice of using plastic and other disastrous items in weddings, get together etc. came only after 1990’s and since then we have been loading Mother Earth with tonnes of garbage in the process of such celebrations. As a result, the burden has far exceeded its carrying capacity. In such a scenario, the need and drive to Go Back to Steel becomes imperative. Let’s go back to from where we started.

Presently, multitude of options can be seen when it comes to renting steel utensils for various events including weddings in the form of plate/crockery banks. Besides one can hire them for free provided he/she uses ask-use-wash-return policy. A certain security amount has to be deposited which is given back after returning the borrowed items. The leftover food can be sent to various NGOs operating in the vicinity so that waste can be minimized and famished section of the society can be fed.

 

Decoration using waste materials – it’s possible !

A lot of waste materials like coconut shells, banana leaves, painted gulmohar pods, origami papers and waste plastic bottles can be employed to give an artistic and imaginative look to the wedding theme. Seasonal/ commonly available flowers and even lush green leaves will surely paint a beautiful picture. One’s creative acumen can be put to best use in such scenario.

 

Never mix dry waste with wet waste- Segregation at source is the solution :

It is crucial to segregate waste at its source of generation. The plastic waste, if any, may be sent for recycling and food waste composted or sent to bio-gas plants. Separate places should be designated to collect items like glass, spoons, plates, napkins etc. so as to ensure their proper management and cleaning. A simple practice can be wonderfully helpful in managing food waste in an excellent way. It is unfortunate to learn that in India segregation has not been made mandatory. Majority people still mix biodegradable with non-biodegradable waste. Instead stricter laws should be enforced and non-compliance should be penalised.

 

Making wedding invites interesting and memorable :

Printing less number of invites can be profitable as it offers reduction in cost and paper because at the end the beautifully adorned cards are sent either to raddiwala or thrown away in bins and forgotten. They can only be reserved for old and close family members. Printing on seed paper or adopting the practice of offering planted pots as wedding invites can prove to be much better alternatives. The cost difference is less and can be ignored. Moreover, the efforts towards going the green way will be appreciated and followed by people. Boasting of arranging an eco-friendly wedding definitely comes with popularity as an added advantage. It is all about being conscious and setting the trend.

 

Using cotton napkins instead of paper tissues is a great idea but beware- it might tempt the guests to steal them !

Paper tissues that will unnecessarily create solid waste can be well replaced by cotton napkins. The printed or personally designed napkins can be reused after giving a wash. Well, the stealing part shouldn’t be worrisome as it will establish the fact that those printed napkins were pretty handsome and well appreciated. The wedding board too can be made of wood, jute, cloth and other decorative items. Such initiatives can be employed and will curb the usual practice of sending trash and unsegregated waste to already swelling landfills.

 

Innovative ideas :

The family can request guests not to wrap gifts in plastic. Small display boards can be installed in dining rooms to make people aware of the eco-friendly measures taken during the event. Even the guests at the event can discuss ways to organize such commemorations in an eco-friendly manner with the host. Usually people are ignorant about such practices but once they are guided they do take the initiative and measures beforehand in future.

As denizens of the Earth, we must take every opportunity to help maintain its beauty by taking eco-friendly initiatives in whichever phase of life possible and spreading the word. As an example to state- inculcating small habits like bringing our own tea/coffee cups in office will be a small but impactful step in curbing use of single use plastic.

 

– Shreya , Dy. Manager (Environment)

Source / References :
https://www.thebetterindia.com/86743/green-wedding-shyamala-suresh-eco-friendly/
https://www.theknot.com/content/eco-friendly-wedding-guide
Youtube videos-
Category:  Environment


 |    November 9, 2020 |   0 comment

पर्यावरण वार्ता (अंक 12 )

कोविड-19 का प्रकोप विश्व में फैलता जा रहा है। प्रतिदिन ग्लोब पर संक्रमित होने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है। मानवता को अपेक्षा करनी चाहिए कि जितनी शीघ्रता से हो सके, कोई प्रभावी दवा अथवा टीके का इजाद हो सके और हम कोरोना प्रसारित महामारी से मुक्ति पा सकें। केवल फैलता हुआ संक्रमण ही समस्या नहीं है, लॉकडाउन के कारण कार्यालय, फैक्ट्रियाँ, स्कूल-कॉलेज, यात्रा-परिवहन सब कुछ हाशिये पर है। लोक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था थम गई है। विश्व सबसे बड़ी मंदी की तरफ धकेला जा रहा है, अर्थात किसी भी मोर्चे पर कोई अच्छी खबर नहीं, पर क्या सचमुच ऐसा है?

 

 

सभी पर्यावरण शोध संस्थानों का मंतव्य है कि वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में बड़ी लगाम लग गई है। अमेरिका के न्यूयार्क से ले कर भारत के मुंबई तक प्रदूषण का स्तर पचास प्रतिशत से भी नीचे गिर गया है (बीबीसी हिन्दी)। इसे इन दिनों दिख रहे नीले और चमकीले आसमान से देखा समझा जा सकता है। गंगा और यमुना जैसी देश की सर्वाधिक प्रदूषित नदियाँ पारदर्शी हो गई हैं। चाँद अधिक चमकीला, तारे अधिक जगमग, फूल अधिक चटखीले और पशु-पक्षी मानव बस्तियों में स्वच्छंद दिखाई पड़ रहे हैं। कई पर्यावरणविदों का मानना है कि यह वायरस मनुष्य और प्रकृति के बीच पैदा हुए असंतुलन का दुष्परिणाम है। परिवेश के परिवर्तनों को देखते हुए इस तथ्य से सहमत हुआ जा सकता है। वस्तुत: विगत कुछ दशकों से हो रहे पारिस्थितिकीय परिवर्तन, अनियंत्रित आर्थिक विकास और प्राकृतिक संसाधनों के बिना सोचे समझे किए जा रहे दोहन ने पारिस्थितिकीय तंत्र के अनुचित तथा असंतुलित प्रयोग को बढ़ाया है। कोरोना-काल हमें ठहर कर यह सब मूल्यांकित करने और सतत विकास की अवधारणा को नए तरीके से सोचने के लिए बाध्य कर रहा है।

 

 

एनएचपीसी के सभी अधिकारी और कार्मिक, केंद्र सरकार के निर्देशों के अनुरूप व्यक्तिगत सुरक्षा का पालन करते हुए देश की प्रगति में यथासंभव योगदान दे रहे हैं। मैं कामना करता हूँ कि इस कठिन समय से हम धैर्य पूर्वक सुरक्षा मानदंडों को पूरा करते हुए पार पा सकेंगे। सभी स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें, देश के विकास की चिंता करें, पर्यावरण की चिंता करें, यही सर्वे भवन्तु सुखिन: की मैं कामना करता हूँ।

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     

                                          (हरीश कुमार)

कार्यपालक निदेशक (पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन)

 

 

 

Image source :  https://www.kwit.org/post/impact-covid-19-earth-day-and-environment        

 

Category:  Environment


 |    July 22, 2020 |   0 comment

कोविड-19 : लॉकडाउन और दिनचर्या

Image Source =https://www.lboro.ac.uk/news-events/news/2020/april/coronavirus-lockdown-sleeping-tips/

 

सोचा नहीं था कभी कि  एक दिन एक खलनायक की कहानी इस तरह से दर्शानी पड़ेगी। आज मानवता के लिए जो सबसे बड़ा खलनायक है वो है कोरोना वायरस (कोविड-19)। कोरोना की कहानी कोई नई नहीं है। इस खानदान के बिगड़ैल वायरसों ने पहले भी कई बार मानव सभ्यता पर हमला किया है, लेकिन हर बार इंसानी जज्बे ने उस पर जीत हासिल की है। मगर हर पराजय के बाद वायरसों ने पहले से ज्यादा शक्ति हासिल कर इंसानों पर हमला किया है। एक बार फिर इस वंश के कोविड-19 ने पूरी दुनिया में तबाही मचा रखी है।

 

हमारे भारत देश में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने देशहित में 22 मार्च 2020 (01 दिन) को जनता कर्फ़्यू (लॉकडाउन);  तत्पश्चात 25 मार्च से 14 अप्रैल (21 दिन) का लॉकडाउन(1.0); 15 अप्रैल से 03 मई (19 दिन) का लॉकडाउन(2.0); 04 मई से 17 मई (14 दिन) का लॉकडाउन(3.0); पुनः 18 मई से 31 मई (14 दिन)  का लॉकडाउन(4.0) का एलान देशभर में किया गया। लॉकडाउन का मकसद कोरोना के संक्रमण को फैलने से रोकना है। इस दरम्यान लोगों को घरों में रहने को कहा गया।जून 2020 से पुरे देश में अनलॉकिंग की प्रक्रिया विभिन्न चरणों में जारी है।

 

लॉकडाउन वह स्थिति है जब लोगों को उनके ही सीमित इलाके में कैद कर दिया जाता है। वास्तव में इसमें आम लोगों को बाहर जाने से रोक दिया जाता है। लॉकडाउन का मतलब यही है कि आप जहां पर हैं, वहीं रहें। लॉकडाउन में व्यक्ति-विशेष को किसी बिल्डिंग, इलाके, या राज्य, देश तक सीमित किया जा सकता है।यह एक इमरजेंसी व्यवस्था है जो महामारी या किसी प्राकृतिक आपदा के वक्त किसी इलाके में लागू होती है। लॉकडाउन की स्थ‍िति में लोगों को घरों से निकलने की अनुमति नहीं होती है, उन्हें सिर्फ दवा या खाने-पीने की जरूरी  चीजों के लिए घर से बाहर निकलने की इजाजत मिलती है।किसी इलाके में लॉकडाउन के दौरान सामान्य तौर पर जरूरी चीजों की आपूर्ति प्रभावित नहीं होती है। इसमें राशन, मेडिकल से जुड़ी चीजें, बैंक, दूध आदि की दुकान चलती रहती हैं। लॉकडाउन में गैर-जरूरी गतिविधियों को रोक दिया जाता है।यात्रा पर रोक इसमें अहम है। यातायात के सार्वजनिक साधनों को लॉकडाउन में बंद कर दिया जाता है।भारत में लॉकडाउन के दौरान निजी कंपनियों को भी कर्मचारियों से घर से काम कराने के निर्देश दिए गए हैं। दिहाड़ी मजदूरों को केंद्र और राज्य सरकार ने अपनी तरफ से आर्थिक सहायता देने की बात की है। सरकार ने यह भी आदेश दिया है कि कंपनियां लॉकडाउन की अवधि की सैलरी नहीं काट सकतीं।अगर लॉकडाउन की अवधि में कोई मेडिकल इमरजेंसी होती है तो केंद्र और राज्य सरकार की आपातकाल स्थिति के लिए मेडिकल सेवा चालू रहती है। हर इलाके में हॉस्पिटल, फार्मेसी चालू रहती है,कोई व्यक्ति इलाज कराने या दवा लेने सावधानी पूर्वक  घर से  निकल सकते हैं।

 

 

किसी भी बीमारी को दूर करने के लिए यूं तो चिकित्सा की आवश्यकता होती है, लेकिन इसके लिए जीवन में संयम भी बहुत हद तक कारगर साबित होता है। कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए अभी तक जो भी बातें सामने आ रही हैं, उसके अनुसार सामाजिक दूरियां बनाना ही इसे आगे बढ़ने से रोक सकती है। आज जब सिर पर मंडरा रहा यह वायरस हमारी मौत बनकर बाहर घूम रहा है, तब हम अपने घरों में कैद होने के लिए बाध्य हैं।आज दुनिया के लोग इस वायरस से बचने के लिए अपने आपको क्वारेंटाइन कर रहे हैं। लेकिन हम अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि हमारी  भारतीय संस्कृति में क्वारेंटाइन की परम्परा आदिकाल से रही है।इसी कड़ी में  अब सभी को यह समझ में आने लगा है कि स्वागत करने के लिए नमस्कार करना विश्व के स्वास्थ्य के लिए हितकर है।आज सभी  को कोरोना का भय यह सब समझा रहा है।आज हमें गर्व होना चाहिए कि पूरा विश्व हमारी संस्कृति को सम्मान की दृष्टि से देख रहा है।

 

मानव व्यवहार और दिनचर्या : 

महामारियों के इतिहास को देखने से पता चलता है कि जब कोई रोग दुनिया के बड़े फलक पर फैलता है तो वह न केवल लोगों के रहन-सहन को पूरी  तरह बदल देता है, बल्कि व्यापार, राजनीति और अर्थव्यवस्थाओं के संचालन के तौर-तरीकों पर भी असर डालता है। इस लॉकडाउनमें कोविड-19 नामक बीमारी यानी कोरोना वायरस के संक्रमण से जो पहली चीज बदली है, वह सामान्य मानव व्यवहार और हमारी दिनचर्या है।

 

इस समयसभी सरकारी एवम् गैर-सरकारी कर्मचारी अपने दफ़्तर का कार्य घर से ही इंटरनेट सेवा के माध्यम से निपटा रहे हैं।सभी विभागीय मीटिंग वीडियो-कॉन्फरेन्सिंग के ज़रिए सम्पन्न कराई जा रही हैं।बच्चों के स्कूल क्लास वीडियो-कॉन्फरेन्सिंग के ज़रिए संचालित किए जा रहे हैं।घर के सभी सदस्य किचन कार्यों में एवम् घर के दैनिक कार्यों में थोड़ा-बहुत योगदान देकर समय का सदुपयोग कर रहे हैं।वहीं दूसरी ओर टेलीविज़न पर धार्मिक धारावाहिक पुनःप्रसारित किए जा रहे हैं, जिससे अच्छे आदर्श, संस्कार, शिक्षा, कर्तव्य, त्याग, क्षमा, तपस्या,  धर्मपरायणता आदि अपनाए जाने की सीख मिल रही है। रामायण, महाभारत, श्री मदभगवद् महापुराण जैसी महाकाव्य का पुनःप्रसारण टेलीविज़न पर दिखाए जाने से बच्चे वो सबकुछ स्वतःसीख रहें हैं जो उन्हें आज के दौर में सीखना बहुत ज़रूरी है।

 

अभिभावकों के साथ-साथ बच्चे भी अब प्रकृति के प्रति पहले की तुलना में ज़्यादा जागरूक होकर इसपर परिचर्चा कर रहे हैं।अभिभावकों को इसलॉकडाउन में मिले समय का सदुपयोग कर बच्चों की दिनचर्या को ऐसे ढालना चाहिए जो जीवनभर उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रख सके।उनकी दिनचर्या में व्यायाम, योग, ध्यान, पढ़ाई, खेल से लेकर हॉबी तक को शामिल करना चाहिए।अपने घर में बंद होने के ख्याल से परेशान होना स्वाभाविक है, लेकिन इस समय लॉकडाउन एक जरूरी कदम है। यह जितना मानव सभ्यता के लिए जरूरी है, शायद उतना ही अपनी पृथ्वी के लिए भी। प्रकृति की व्यवस्था में जो भी होता है, बहुत ही सुव्यवस्थित तरीके से होता है।यही समय है हम सबको अपनी जिम्मेदारी दिखाने एवम् निभाने की।जैसे-जैसे पृथ्वी की आयु बढ़ रही है, उसकी आंतरिक फ्रीक्वेंसी भी बढ़ती जा रही है। मानवीय क्रियाकलापों से जो शोर पैदा हो रहा है, वह इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है।

 

घर में बंद रहने से,रोज एक जैसी दिनचर्या से बोर होने से बचने के लिए अपनी दिनचर्या में आवश्यक बदलाव व विविधता लाकर समय का सदुपयोग कर इसे सार्थक बनाया जा सकता है।समय बिताने के लिए वाईफाई और इंटरनेट की लत के आदी न बनकर, देर तक अपनी वाई-फाई डिवाइस के सीधे संपर्क में आने से बचना चाहिए, क्यूंकी  इसका रेडिएशन हमारे  स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता। इस समय शारीरिक वर्कआउट, हेल्दी-डाइट और अच्छी नींद लेना हमारी सेहत के लिए बहुत जरूरी है।संसार के सारे कार्य-व्यवहार आशाओं पर ही चलते है, इसी के अनुरूप हमें अपना व्यवहार इस समय रखना है। अगर हम अपने व्यवहार में संयम और स्थिरता दिखाएंगे, तभी इस महामारी से निजात मिल सकेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही कोरोना की वैक्सीन ईजाद कर ली जाएगी। तब तक अपने घरों के दरवाजे बंद रखने में ही हम सब की भलाई है।

 

 

मनीष कुमार

सहायक प्रबंधक (फिशरीज)

 

 

 

Category:  Environment


 |    July 22, 2020 |   0 comment

कोरोनाकाल में कुछ कहना चाहती है प्रकृति

Image Source = https://www.newyorker.com/podcast/the-new-yorker-radio-hour/the-coronavirus-and-climate-change-the-great-crises-of-our-time

 

शहर-दर-शहर सन्नाटे के जंगल बनते जा रहे हैं और हरे भर वन गुलजार हो गये हैं। आदमी घर के भीतर कैद रहने के लिये बाध्य है जबकि पशु-पक्षी मानो जश्न-ए-आजादी मना रहे हैं। घर की खिड़की खोल, जरा सलाखों से बाहर तो देखिये, ऐसा नीला आसमान देखे कितना समय गुजर गया? रात बाहर बालकनी में निकल कर आकाश को निहार, आप पायेंगे कि सितारे कुछ अधिक हैं, मोतियों जैसे जग-मग-जग-मग कर रहे हैं। कोरोना काल में इन्सान बेबस हो गया है जबकि उसका परिवेश और पर्यावरण नये परिधान पहन सजीला-छबीला हो चला है। अपनी जन्मभूमि चीन के वुहान शहर से दुनिया भर में फैला कोरोना वायरस मानव जनसंख्या पर और अर्थव्यवस्था पर चाहे जैसा भी प्रभाव डाल रहा हो, सकारात्मक बात यह है  कि यह विभीषिका जीवन जीने के दर्शनशास्त्र को सामने रख रही है।

 

धरती यदि बोल पाती तो अवश्य कहती कि उसकी संततियों में से नालायक मनुष्यों को लॉकडाउन में ही रहने की आवश्यकता है। देखो न, वे बंद हैं तो हवा साफ हो गयी, पानी निर्मल हो गया, मिट्टी में जहर घटने लगा। पंजाब के जालंधर में रहने वालों को वहां से हिमाचल प्रदेश में स्थित धौलाधार पर्वत श्रृंखला की चोटियां दिख रहीं हैं, आश्चर्य है न? यह पहाड़ तो हमेशा से ही जालंधर से देखा जा सकता था, लेकिन धूल-धुंए ने यह सच भुला ही दिया। दिल्ली-आगरा में जमुना का पानी निर्मल हो गया। फेन और झाग ले कर बहने वाली, गंदा नाला बन चुकी यमुना आज अपने रंग, ढंग और चाल पर इताराती नजर आ रही है। यमुना के प्रदूषण में सत्तर प्रतिशत योगदान घरेलू कचरे का है और तीस प्रतिशत औद्योगिक गंदगी इसमें समाहित होती है। अब लोग घर के भीतर हैं और उद्योगों पर ताले हैं। इस समय यमुना की प्रसन्नता को सुनना चाहे तो उसकी कलकल में सुने। साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल (एसएएनडीआरपी) ने गंगा और कावेरी नदियों में भी आये ऐसे ही बदलाव का संज्ञान लिया है। यह महसूस किया जा सकता है कि गंगा स्वच्छता अभियान में अरबों रुपये स्वाहा हुए लेकिन जो न हो सका वह कोरोना काल के लॉकडाउन अवधि में हो गया।

 

भारत ही नहीं सारी दुनियाँ से ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं कि हलचल-विहीन सड़कों पर जंगली जानवर धड़ल्ले  से आ जा रहे हैं। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में गजराज निर्भीकता से टहलते देखे गये, ऐसा ही एक दृश्य कर्नाटक के कोडागु जिले में सामने आया जहाँ हाथियों को सड़कों पर मस्ती करते, चहलकदमी करते देखा गया। इतना ही नहीं नोएडा के जीआईपी मॉल के पास एक नीलगाय को सड़क पार करते देखा गया है तो हरिद्वार में सडकों पर सांभर, चीताल और हिरण चहलकदमी कर रहे है। गुड़गांव के गलेरिया मार्केट में मोरों का झुंड झूम रहा था वहीं केरल के कोझिकोड में सडकों पर बिलाव देखे जा रहे हैं। कई स्थान भयकारक भी हो गये हैं क्योंकि तेंदुओं को बस्तियों में आते देखा जा रहा है। मनुष्य और पशु के बीच हमेशा दुराव रहा है, मनुष्य ने अपने हिस्से की जमीन से उन्हे बाहर निकाल दिया है, आज क्या वे यह बताने के लिये शहरों में चहलकदमीं कर हैं कि यह हमारी जमीन है?

 

इतना ही होता तो बात न थी लेकिन अपनी धरती पर कितने बडे बोझ हैं इन्सान, बेल्जियम की रॉयल ऑब्जर्वेट्री के विशेषज्ञ बताते हैं कि इन दिनों इंसान स्थिर क्या हुए धरती की ऊपरी सतह पर कंपन यहाँ तक कि सीस्मिक नॉईज घट गया। इसका सरल शब्दों में मतलब है कि धरती की बाहरी सतह यानि क्रस्ट पर होने वाले कंपन के कारण भीतर एक शोर सुनाई पड़ता है, उसके फेंफडे अब गहरी गहरी राहत की सांस ले रहे हैं। 1 से 20 हर्त्ज वाली इन्फ्रासाउंड फ्रीक्वेंसी इंसानी गतिविधियों से पैदा होती हैं इसमें तीस से पचास प्रतिशत की गिरावट देखी गयी है। इसका एक अर्थ यह भी है कि मानवजनित कार्यों के थमते ही प्रकृति ने स्वयं को सुधारात्मक गतिविधियों में लगा दिया है। पर्यावरण में ऐसे गुणात्मक बदलवों  को देख कर अब विशेषज्ञों का मानना है कि महामारी से निजात पाने के बाद भी विश्व को समय समय पर लॉकडाउन जैसे विकल्पों को आजमाना चाहिये। मित्रों, कोरोनाकाल आज नहीं तो कल समाप्त हो जायेगा, क्या हम इस कठिन समय से कुछ सीख सके है?

 

 

-राजीव रंजन प्रसाद

वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण )

 

Category:  Environment


 |    July 22, 2020 |   0 comment

Photograph of the Week

वनमहोत्सव के अंतर्गत एनएचपीसी में उल्लास से मनाया गया “अपना पेड़ कार्यक्रम”

 

वनों का संरक्षण-संवर्धन अत्यधिक आवश्यक है इस दृष्टिकोण से एनएचपीसी ने सर्वदा निगम मुख्यालय सहित सभी परियोजना स्थलों में हरीरिमा की अभिवृद्धि में महति योगदान दिया है। इस कड़ी में प्रतिवर्ष जुलाई माह में सोल्लास मनाया जाने वाला वन महोत्सव एनएचपीसी द्वारा समारोहपूर्वक आयोजित किया गया। उल्लेखनीय है कि वन महोत्सव वर्ष 1950 में श्री कन्हैयालाल मुंशी, तत्कालीन केंद्रीय कृषि और खाद्य मंत्री द्वारा आरम्भ कराया गया था। इस उत्सवपूर्ण आयोजन द्वारा यह अपेक्षा की गई थी कि इससे लोगों में वृक्ष लगाने और बचाने की चेतना उत्पन्न होगी। इस आयोजन के तहत देश भर में लोगों द्वारा लाखों पौधे लगाए जाते हैं।

 

एनएचपीसी निगम मुख्यालय में वन महोत्सव का आयोजन “अपना पेड़ कार्यक्रम” शीर्षक के साथ कॉलोनी परिसर में गेट क्रमांक-1 के निकट किया गया। इस अवसर पर श्री ए के सिंह, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक महोदय ने सभी निदेशकगण और वरिष्ठ अधिकारियों एवं उनके परिवारजनों की उपस्थिति में पौधारोपण किया । इसके पश्चात समस्त निदेशकगण एवं वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा स्वयं एवं परिजनों के साथ उत्साहपूर्वक पौधे लगाये गये। तदोपरांत अपना पेड़ कार्यलय परिसर में पौधारोपण किया गया। निगम मुख्यालय के अनेक कार्मिकों ने इस अवसर पर “अपना पेड़ कार्यक्रम” के अंतर्गत पौधे लगाने के लिये पंजीकरण कराया था, सभी ने अपने परिवार जनों के साथ पौधे लगाये व उन्हें बचाने का संकल्प भी किया। इस अवसर पर लगाये जाने के लिये, विशेष रूप से औषधीय महत्व, फलदार तथा छायादार श्रेणी के पादपों का चयन किया गया जिनमें प्रमुख हैं – आम, आँवला, अनार, अमरूद, नीबू, मौसमी, जामुन, बेल, मुनगा, करीपत्ता, गिलोय, शहतूत, अश्वगंधा, चम्पा, अमलतास, टिकोमा, गुलमोहर, अपराजिता, मधुमालती, रात की रानी, तुलसी आदि। “अपना पेड़ कार्यक्रम” के आयोजन के पीछे विचार यह था कि सभी को कम से कम एक पौधे की देखभाल करनी चाहिए, हरियाली बढ़ानी चाहिए; इस तरह पर्यावरण के लिये छोटा ही सही परंतु अपना योगदान देना चाहिये।

 

Category:  Environment


 |    July 22, 2020 |   0 comment

COVID MUSINGS

Image source : https://www.nyoooz.com/features/lifestyle/musings-in-the-times-of-covid-19.html/3479/

 

 

As Covid lockdown locks down life at office, morning walks and all frequent and occasional shopping sprees, the immediate realization of the real worth of all that you lived for is astounding. Your big and small vehicles have no use, outfits that were your style statements are wearily gathering dust in the wardrobe, the bank balance finds use only for the essential needs for sustenance. If it was not for those pre-existing loans, all that salary was not really required. You realize, work is indeed possible from home. And work do not really need all that time spent at workplace. As worship sessions in large gatherings cease, the ultimate and noble realization dawns. God do not really need huge structures to delve in. He/she just needs humane hearts.

 

Even as humans relax and contemplate upon the real worth of all that was sought for, the planet is in recoup mode, and its other species are reclaiming the spaces left vacant by its self-proclaimed supreme being. The air is cleaner, rivers clear of industrial wastes, the humdrum of markets replaced by silences. The country records its best air quality indices of the decade.

 

When Nilgai come to the roads in Gurugram, the rhino visits towns adjacent to Guwahati, elephants go searching for people at forest checkposts in Kerala, dolphins return to the ports in Italy, the shy Sika deer roam the streets in Japan, prides of lions hang out on the roads of Kruger NP in South Africa, and many more sightings of otherwise shy wild animals in human habitations, we are gently reminded that they are just visiting their old homes. We, the most arrogant of species on earth never think of the number of nests on a tree when we cut one down, or the small and large animal refugees when tracts of forests are cleared for human use. But nature definitely has its own effective and insurmountable methods of reclaiming its spaces. Covid is just one.

 

An old movie flashes into memory. Two brothers. A story of two tiger cubs separating and reuniting. The foreigner hunter cum writer of the movie transporting ancient sculptures recovered from dense forests, through rivers is one of the shots in the movie. It gives a feeling of huge cities overgrown by dense forests. Plants easily overgrow neglected places is a fact just too familiar. Ecology calls it succession. The natural process of reclaiming of spaces. An unintended encounter while flicking pages online was with Kaliakra in Bulgaria, where history was taken over by nature …Another, while trying to explore the picturesque settings of the movie “Two brothers” was Mahendraparvata.

 

Mahendraparvata of Cambodia is a huge ancient city that was mentioned in ancient stone inscriptions.The once-mighty metropolis was one of the first capitals of the Khmer empire, which ruled in Southeast Asia between the 9th and 15th centuries. It was long believed that the ancient city was hidden beneath thick vegetation on a Cambodian mountain, not far from the temple of Angkor Wat. Cambodians have been making religious pilgrimages to the site for hundreds of years. Recently, researchers combined air borne laser scanning with ground surveys and excavations to weave a narrative of the development and demise of this ancient city. Maps of the city have been created using LIDAR (light detection and ranging) technology. The detailed maps show a well-planned city overgrown by thick vegetation on the mountain of Phnom Kulen, Cambodia. The Phnom Kulen is presently a national park in the Siem Reap province of Cambodia, established in the year 1993. A large city and innumerable temple complexes, which were part of the Indian cultural zone taken over by nature.

 

Kaliakra is a site of more recent history. It is a long and narrow headland in the Southern Dobruja region of the northern Bulgarian Black Sea Coast. The Kaliakra peninsula stretches 2km into the Black Sea. Offering a strategic vantage point over the Black Sea, the cape has seen a long history of fortifications; occupied successively by the Thracians, the Romans, the Byzantines, the Bulgarians, the Ottoman Empire and the Kingdom of Romania. It features the remnants of fortified walls, water-main, baths and residence of Despot Dobrotitsa (1379-1386) in the short-lived Principality of Karvuna’s medieval capital. The coast is steep with vertical cliffs reaching 70 metres (230 ft) down to the sea.

 

Kaliakra is presently a nature reserve, where dolphins and cormorants can be observed. It sits on the Via Pontica, a major bird migration route from Africa into Eastern and Northern Europe. Many rare and migrant birds can be seen here in spring and autumn and is home to several rare breeding birds (e.g. pied wheatear and a local race of European shag). The rest of the reserve also has unusual breeding birds; saker falcon, lesser grey shrike and a host of others.

 

This Covid season, the sector that has got brutally affected is tourism. As flights and SUVs are in parking mode, the birds and animals and obviously all other small and large non-human inhabitants of most of those picturesque and idyllic tourist destinations are having their day out. Our lives may return to normal, but the new normal is likely to be a different kind of normal for a few years, if accounts of areas where lockdown has been lifted are to be believed. Let us happily confine ourselves in stay safe mode for a while… and allow the planet some breathing space.

 

Anita Joy 

Senior Manager (Environment)

Category:  Environment


 |    July 22, 2020 |   0 comment

COVID-19: PRECAUTIONS TO BE TAKEN

Image source = https://www.theguardian.com/environment/2020/apr/22/earth-day-bypasses-virus-with-journey-into-gaming-world

 

We all know due to continuous spread of highly contagious COVID-19, the world is not in a good shape today. Number of reported cases infected with the deadly virus has been on a constant rise throughout the world. The people of our country have been advised to stay home. The country is under lockdown. The world has come to a standstill. Under such a crisis we all need to take care of family and ourselves.

 

Firstly, it is crucial to understand what COVID-19 is and how it spreads.COVID-19 is a disease caused by a new strain of coronavirus. ‘CO’ stands for corona, ‘VI’ for virus, and ‘D’ for disease. Formerly, this disease was referred to as ‘2019 novel coronavirus’ or ‘2019-nCoV.’ The COVID-19 virus is a new virus linked to the same family of viruses as Severe Acute Respiratory Syndrome (SARS) and some types of common cold.The main causes for its spread are- air by cough or sneeze, personal contact, contaminated objects and mass gatherings. The symptoms include- dry cough, high fever, sore throat and difficulty in breathing.

 

Following are some facts about COVID-19:

 

  1. People of all ages CAN be infected by the coronavirus. Older people, and people with pre-existing medical conditions (such as asthma, diabetes, heart disease) appear to be more vulnerable to becoming severely ill with the virus.
  2. Cold weather and snow CANNOT kill the Coronavirus.
  3. Hand dryers are NOT effective in killing the coronavirus.
  4. There is NO evidence that regularly rinsing the nose with saline has protected people from infection with the coronavirus.
  5. The coronavirus CAN be transmitted in areas with hot and humid climates.
  6. Ultraviolet light SHOULD NOT be used for sterilization and can cause skin irritation.
  7. Garlic is healthy but there is NO evidence from the current outbreak that eating garlic has protected people from the coronavirus.
  8. The coronavirus CANNOT be transmitted through mosquito bites.
  9. Thermal scanners CAN detect if people have a fever but CANNOT detect whether or not someone has the coronavirus.
  10. Antibiotics DO NOT work against viruses, antibiotics only work against bacteria.
  11. There is NO evidence that companion animals/pets such as dogs or cats can transmit the coronavirus.
  12. Spraying alcohol or chlorine all over your body WILL NOT kill viruses that have already entered your body.
  13. To date, there is NO specific medicine recommended to prevent or treat the coronavirus.
  14. Taking a hot bath DOES NOT prevent the coronavirus.
  15. Vaccines against pneumonia, such as pneumococcal vaccine and Haemophilus influenzae type b (Hib) vaccine, DO NOT provide protection against the coronavirus.
  16. You can recover from the coronavirus disease (COVID-19). Catching the new coronavirus DOES NOT mean you will have it for life.
  17. Being able to hold your breath for 10 seconds or more without coughing or feeling discomfort DOES NOT mean you are free from the coronavirus disease (COVID-19) or any other lung disease. The best way to confirm if you have  the virus producing COVID-19 disease is with a laboratory test.
  18. Drinking alcohol does not protect you against COVID-19 and can be dangerous.

 

Following measures must be taken to slow down and prevent the spread of COVID-19:

 

As with other respiratory infections like the flu or the common cold, public health measures are critical to slow the spread of illnesses. Public health measures are everyday preventive actions that include:

  • Staying home when sick.
  • Covering mouth and nose with flexed elbow or tissue when coughing or sneezing.
  • Dispose of used tissue immediately.
  • Washing hands often with soap and water.
  • Cleaning frequently touched surfaces and objects.

 

Some key points on how to beat the disease:

 

  • Don’t fear and don’t panic- sprouting fear can cause more damage to us. As the mortality rate is low and due to early care, the chances of recovery(that takes approximately a week) are high. The people are scared because of the social stigma attached to it. We must know the facts as facts minimize fear. Let’s be positive and hopefuland we willfight the disease.

 

  • We must use homemade reusable face cover, particularly when we step out of our house to help protect the community at large. But it is not recommended for health workers, those working with or in contact with COVID-19 patients and COVID-19 patients, as they are required to wear specified protective gear.

 

  • The Ministry of AYUSH has released a list of Ayurveda approved practices that can help us boost our immunity during the current times. They are enumerated as under:

 

  1. Drinking warm water throughout the day.
  2. Daily practise of yoga. This can include Yogasna, Pranayama and meditation for at least 30 minutes daily.
  3. Incorporate spices like Turmeric (Haldi), Cumin (Jeera) and Coriander (Dhaniya) in your daily cooking. These spices are known to help boost immunity through the study of Ayurveda.
  4. Take one tablespoon full (10gm) of Chyavanprash every morning. However, diabetic patients should make sure they only have sugar free versions.
  5. Drink herbal tea (kadha). Your kadha should include Tulsi, Dalchini (Cinnamon), black pepper, dry ginger (Shunthi) and raisins. You can also add Jaggery (Gur) and fresh lemon juice according to your taste. Drink this concoction at least twice a day.
  6. Add half teaspoon of Turmeric (Haldi) in a glass of warm milk and drink it once or twice a day.
  7. For dry cough/sore throat- steam inhalation with Mint (pudina) leaves or Ajwain (caraway seeds) once a day. Taking Lavang (clove) powder mixed with sugar or honey once or twice a day can improve the condition.

 

There is no vaccine available to cure COVID-19 currently but we can all be cautious at every stage. We must follow guidelines issued by the World Health Organization (WHO) or Ministry of Home Affairs (MHA) from time to time.

 

Shreya

Asstt. Manager ((Environment)

References:
https://www.mygov.in/covid-19
https://timesofindia.indiatimes.com/life-style/health-fitness/health-news/ayurveda-tested-immunity-practices-to-followduring-the-coronavirus-pandemic/photostory/74912589.cms?picid=74912631

 

Category:  Environment


 |    July 22, 2020 |   0 comment

एनएचपीसी के विभिन्न क्षेत्रीय कार्यालयों में विश्व पर्यावरण दिवस 2020 के आयोजन की झलकियां

क्षेत्रीय कार्यालय, बनीखेत

क्षेत्रीय कार्यालय बनीखेत में  विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया |कार्यक्रम में पौधारोपण के साथ सन्देश दिया गया कि विश्व पर्यावरण दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य प्रकृति की रक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाना तथा लोगों को पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति जागरूक और सचेत करना है । जैव विविधता को बनाए रखने के लिए  धरती के पर्यावरण का संरक्षण महत्वपूर्ण है। प्रकृति के साथ सद्‍भाव में रहना ही धरती पर भयावह स्थिति से बचने का एकमात्र तरीका है तथा अधिक से अधिक वृक्ष लगा के प्रकृति को हरा–भरा बनाए रखने में योगदान देना चाहिए ।

 

क्षेत्रीय कार्यालय, चंडीगढ़

क्षेत्रीय कार्यालय चंडीगढ़ में विश्व पर्यावरण दिवस, कोविड-19 महामारी को ध्यान में रखते हुए सामाजिक दूरी के सभी मानदंडों को ध्यान में रखते हुए मनाया गया। इस अवसर पर क्षेत्रीय कार्यालय चंडीगढ़ के आवासीय परिसर सेक्टर 42 ए में पौधरोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया एवं समस्त अधिकारियों द्वारा पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण का सन्देश दिया गया।

 

 

क्षेत्रीय कार्यालय, जम्मू

क्षेत्रीय कार्यालय जम्मू में उत्साह के साथ विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन किया गया। पौधारोपण के द्वारा पर्यावरण को और बेहतर करने की दिशा में जागरूकता फैलाई गई। पर्यावरण संरक्षण सबका कर्तव्य है। घरों में छोटे-छटे इनडोर पौधे लगाकर भी वातावरण को स्वच्छ बनाए रखा जा सकता है। पर्यावरण के अनुकूल पौधे लगा के उन पौधों का ध्यान रखना भी जरूरी है। उपस्थित लोगों को वृक्षारोपण के महत्व के बारे में बताते हुए आस-पास के वातावरण को स्वच्छ बनाए रखने हेतु प्रेरित किया गया।

 

 

Regional Office , Siligudi

‘World Environment Day, 2020’ was observed in Regional Office (RO), Siliguri with the Theme, ‘Celebrating Biodiversity’ which signifies a concern that is both urgent and existential in the context of COVID-19, the extant global disease pandemic. ‘Celebrating Biodiversity’ demonstrates the interdependence of humans and the webs of life, in which they exist. 

 

Environment Day was observed in RO, Siliguri in ‘Miyawaki’ way by initiating forestation in the campus of RO in a unique way. ‘Miyawaki’ is a technique pioneered by Japanese Botanist Shri Akira Miyawaki helping to build dense and native forest in Urban areas by planting native species in a selected area. After the initial care, the plantation becomes maintenance-free after three years. The occasion, highlighted the uniqueness of ‘Miyawaki’ Method and gave thrust on NHPC’s commitment towards Environment. A total of 176 Saplings were planted and the varieties of plants used to form canopies of varied heights (Long, Medium and Short) were, Bakul (Mimusops Elengi) , Amla (Phyllanthus Emblica), Guava (Psidium Guajava) , Neem (Azadirachta Indica) and Tagar (Valeriana Jatamansi) respectively. 

 

 

 

Category:  Environment


 |    June 20, 2020 |   0 comment

एनएचपीसी की उत्तराखंड स्थित परियोजनाओं में विश्व पर्यावरण दिवस 2020 के आयोजन की झलकियां

धौलीगंगा पावर स्टेशन

धौलीगंगा पावर स्टेशन द्वारा कार्यालय परिसर व इसके समीपवर्ती गाँव तपोवन छिरकिला बांध परिसर में जनसामान्य और ग्रामीण बालक-बालिकाओं के साथ मिलकर बांध परिसर के पास के ग्राम खेत के राजकीय अन्तर कॉलेज परिसर में भी फलदार पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण का सन्देश दिया गया।विश्व पर्यावरण दिवस समारोह के द्वारा पर्यावरण संरक्षण हेतु जनसहभागिता पर बल देते हुए प्रकृति को बचाए व बनाए रखने की अपील की गई।कार्यक्रम के दौरान कोरोना संक्रमण (कोविड-19) से बचाव के दृष्टिगत गृह मंत्रालय भारत सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए सामाजिक दूरी का पूर्णतया पालन किया गया।

 

कोटलीभेल जलविद्युत परियोजना

कोटलीभेल (चरण-1ए) जलविद्युत परियोजना द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस-2020 का आयोजन हर्षोल्लास के साथ संपन्न किया गया।कोरोना संक्रमण (कोविड-19) से बचाव के दृष्टिगत गृह मंत्रालय भारत सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए एक सेमिनार (संगोष्ठी) का आयोजन भी किया गया।सेमिनार के माध्यम से पर्यावरण संबंधी मुद्दे, पृथ्वी पर मानव जाति के अस्तित्व और उसके समस्त क्रियाकलापों से जुड़ी होने के कारण पर्यावरण संरक्षण के प्रति “वन” व “वन्य प्राणियों” की सुरक्षा, धरती को स्वच्छ एवं प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए पोलिथीन / प्लास्टिक कचरे के अलावा अजैविक कचरे को उचित ठिकाने लगाने व भूःस्खलन, वन्य-संरक्षण, झीलों, नदियों और वन्य जीव-जंतुओं के संरक्षण के माध्यम से पर्यावरण की रक्षा करने की ओर विशेष बल दिया गया। पर्यावरण संरक्षण हेतु पौधरोपण, जल संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के प्रति कटिबद्धता हेतु कार्मिकों को प्रतिज्ञा दिलाई गई । सेमिनार के पश्चात सभी कार्मिकों द्वारा वृक्षारोपण किया गया और सभी उपस्थित जनों को एक पौधा भी भेंट किया गया।

 

टनकपुर पावर स्टेशन

टनकपुर पावर स्टेशन में विश्व पर्यावरण दिवस – 2020 उत्साहपूर्वक पौधारोपण के साथ मनाया गया ।समारोह में विगत कुछ सालों में बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण से उत्पन्न विभिन प्रकार के आपदाओं पर चर्चा करते हुए इसके समाधान हेतु अधिकाधिक पौधों को लगाकर उनके देखभाल की अपील की गई । इस अवसर पर कोविड 19 से उत्पन्न महामारी से मानव अस्तित्व पर संकट एवं सरकार द्वारा लगाए गए लॉकडाउन से पर्यावरण में हुए सुधार पर भी चर्चा की गई। जैव-विविधता एवं पर्यावरण संरक्षण हेतु विशेष तौर पर औषधीय पौधों के संरक्षण तथा विकास पर बल दिया गया। प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से उत्पन्न समस्याओं पर प्रकाश डाला गया।जैव-विविधता एवं पर्यावरण संरक्षण को शक्तिशाली बनाने हेतु अधिकाधिक पौधरोपण करने की प्रतिबद्धतता के साथ आवासीय परिसर में रुद्राक्ष के पौधे के अलावा औषधीय व फलदार (लीची, आम, नींबू, नीम, कचनार, तेजपात,करौंदा आदि ) के करीब 30 पौधौं का रोपण किया गया ।इस कार्यक्रम के दौरान केंद्र सरकार द्वारा जारी कोविड -19 के दिशा-निर्देशों का अनुपालन करते हुए सामाजिक दूरी का ध्यान रखा गया ।

 

श्री मनोज कुमार कुशवाहा, वरिष्ठ प्रबन्धक (पर्यावरण) द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस की आवश्यकता तथा जैव-विविधता, कोरोना संक्रामण, स्वच्छता एवं कचरा प्रबंधन पर लोगों को जागरूक किया गया।उनके द्वारा जैव-विविधता, पर्यावरण संरक्षण एवं स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न उपायों पर चर्चा की गई ताकि आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ एवं समृद्ध पर्यावरण उपलब्ध कराया जा सके ।

Category:  Environment


 |    June 20, 2020 |   0 comment

एनएचपीसी की पूर्वोत्तर स्थित परियोजनाओं में विश्व पर्यावरण दिवस 2020 के आयोजन की झलकियां

दिबांग बहुद्देशीय परियोजना

दिबांग बहुद्देशीय परियोजना, रोइंग में विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन परियोजना के सभी वरिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा वृक्षारोपण अभियान के साथ शुरू हुआ। वृक्षारोपण कार्यक्रम  कार्यालय प्रांगण में उचित सामाजिक दूरी और कोविड 19 से बचाव के लिए दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए संपन्न हुआ। कार्यक्रम में पारिस्थितिकी तंत्र हेतु जैवविविधता के महत्व पर प्रकाश डाला गया एवं सभी को पर्यावरण के प्रति सजग तथा संवेदनशील रहने का आग्रह किया गया। साथ ही एनएचपीसी द्वारा जैवविविधता के संरक्षण हेतु उठाए गए क़दमों एवं भविष्य की योजना के बारे में भी अवगत कराया गया ।

 

 

रंगित पावर स्टेशन

रंगित पावर स्टेशन में “जैवविविधता ” थीम के साथ विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर जैवविविधता पर जानकारी देते हुए बताया गया कि जीव -जंतुओं एवं वनस्पतियों की विभिन्न प्रजातियां पृथ्वी की जैवविविधता और पर्यावरण का निर्माण करती हैं। जैवविविधता को बनाए रखने के लिए आस-पास के पर्यावरण को स्वच्छ रख कर उसका संरक्षण व संवर्धन आवश्यक है। कार्यक्रम के दौरान कोविड 19 के मद्देनजर सरकार के द्वारा जारी सारे दिशानिर्देशों जैसे कि सामाजिक दूरी , मास्क पहनना इत्यादि का अनुपालन करते हुए पौधरोपण किया गया। विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में जैवविविधता थीम पर कार्मिकों के बच्चों के लिए घर से चित्रांकन प्रतियोगिता का आयोजन कर विजेताओं को पुरस्कृत किया गया।

 

 

सुबनसिरी लोअर जलविद्युत् परियोजना

सुबनसिरी लोअर जलविद्युत् परियोजना, गेरुखामुख में विश्व पर्यावरण दिवस अत्यंत उत्साह केसाथ मनाया गया जिसमें पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रतिबद्धता दिखाई गई। विश्व पर्यावरण दिवस की थीम जैवविविधता के प्रति जागरूकता और पर्यावरणीय संरक्षण के प्रति प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से परियोजना के विभिन्न स्थानों पर बैनर के माध्यम से प्रदर्शन किया गया।सुबनसिरी लोअर जलविद्युत् परियोजना, गेरुखामुख में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर दो अलग अलग स्थानों पर पौधरोपण किया गया जिसमें नीम एवं अशोक के पौधे लगाए गए।

 

“जैवविविधता और पर्यावरण संरक्षण ” के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से श्री शशि पाल सिंह, वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण ) द्वारा केंद्रीय विद्यालय गेरुखामुख के वरिष्ठ कक्षाओं के छात्र छात्राओं के लिए वेबिनार के माध्यम से लेक्चर का आयोजन किया गया। इसके माध्यम से प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए जैवविविधता के महत्व, इसकी क्षति और संरक्षण के विभिन्न उपायों के बारे में छात्र-छात्राओं को जागरूक किया गया।

 

कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों द्वारा गृह मंत्रालय , भारत सरकार और असम सरकार द्वारा कोविड 19 प्रबंधन केलिए समय समय पर जारी दिशानिर्देशों का पूर्णतया पालन किया गया।

 

 

Teesta-V & Teesta-Vl Power Station

Teesta-V Power Station & Teesta-VI HE Project organized World Environment Day at Balutar East Sikkim. As part of observance, more than 150 tree saplings were planted by the employees and their family members in Residential Colony at Balutar & Barrage Complex at Sherwani with the theme of World Environment Day-2020 ‘Celebrating Biodiversity’- a concern that is urgent and existential. The symbiotic relationship between human and other species was addressed. Awareness on protection of Biodiversity was promoted on the occasion. It was said that Global Corona Virus Pandemic act as reminder that human health is linked to clean & healthy environment.  The practice of Reduce, Reuse and Plant tree saplings in surroundings was encouraged.  

Category:  Environment


 |    June 20, 2020 |   0 comment

एनएचपीसी की हिमाचल प्रदेश स्थित परियोजनाओं में विश्व पर्यावरण दिवस 2020 के आयोजन की झलकियां

चमेरा-। पावर स्‍टेशन

चमेरा पावर स्‍टेशन-।, खैरी में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।हर्बल पार्क में जामुन का पौधा लगाकर इस पौधारोपण कार्यक्रम की शरुआत की गई। पर्यावरण को बचाने एवं सँवारने की अपील करते हुए धरती पर मानव जीवन तथा मानवता को बचाने के लिए पर्यावरण संरक्षण के महत्व पर चर्चा की गई। वर्तमान में घटित हो रही प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के लिए पर्यावरण का संरक्षण करने पर बल दिया गया। कार्यक्रम के दौरान कोविड 19 से बचाव हेतु सरकार द्वारा जारी दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए उचित सामाजिक दूरी बनाई रखी गई एवं मास्क का प्रयोग किया गया।

 

 

चमेरा-।। पावर स्‍टेशन

चमेरा -II पावर स्टेशन, करिया में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर कालोनी परिसर में स्थित हर्बल पार्क में पौधारोपण के कार्यक्रम का आयोजन किया गया।पौधारोपण के दौरान विभिन्न प्रजाति के 100 पौधे लगाए गए जिसमें अनार, खुमानी, जामन, प्लम आदि के पौधे सम्मिलित थे। इस अवसर पर वर्तमान परिदृश्य में पर्यावरण संरक्षण को लेकर एनएचपीसी एवं भारत सरकार तथा राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर चर्चा की गई। पर्यावरण को बनाए व बचाए रखने हेतु पूर्ण सहयोग देने की अपील की गई ताकि भावी पीढी को एक स्वस्थ व प्रदूषण मुक्त पर्यावरण प्रदान किया जा सके । चमरा-II पावर स्टेशन द्वारा हर्बल पार्क में जैवविविधता संरक्षण के तहत पौधारोपण के दौरान चिड़ियों के लिए घौसलों का निर्माण किया गया तथा उनके आहार –पानी की व्यवस्था की गई ।कार्यक्रम के दौरान कोविड 19 हेतु जारी निर्देशों का पालन करते हुए सभी कर्मचारियों ने उचित दूरी बनाए रखा एवं मास्क का प्रयोग किया ।

 

 

पारबती-II जल विद्युत परियोजना

पारबती-II जल विद्युत परियोजना,नगवाईं में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन हेतु कर्मचारियों को शपथ दिलाई गई एवं पौधारोपण किया गया।परियोजना की विभिन्न इकाइयों पर पौधारोपण किया गया जिसकेअंतर्गत फलदार पौधे लगाए गए। श्री प्रताप कुमार मालिक, वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण) द्वारा उपस्थित जनसमूह को जानकारी देते हुए बताया गया कि इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस का थीम “जैव विविधता” है जिसका उद्देश्य पादपों और जीव-जंतुओं के संरक्षण पर केंद्रित है। कार्यक्रम के दौरान सामाजिक दूरी का ध्यान रखा गया ।

 

 

पारबती-III पावर स्टेशन

पार्बती-III पावर स्टेशन, बिहाली में “विश्व पर्यावरण दिवस” के अवसर पर सपांगनी स्थित आवासीय परिसर में लगभग सौ फलदार व औषधीय पौधों का रोपण किया गया। इस आयोजन को “अपना पेड़” अभियान के रूप में आयोजित किया गया।इसके साथ ही पावर स्टेशन द्वारा पहले से सडक के किनारे लगे हुए पौधों के अनुरक्षण के उद्देश्य से “ट्री गार्ड “ लगाने के अभियान का शुभारम्भ किया गया । इस अभियान में कुल 60 पौधों के लिए “ट्री गार्ड” का प्रावधान किया गया। अपने आस-पास की जैविक सम्पदा का संरक्षण कर पृथ्वी के पर्यावरण को और अधिक स्वच्छ व स्वस्थ बनाने हेतु लगातार प्रयास करते रहने की अपील की गई।

 

पर्यावरण दिवस के शुभावसर पर पावर स्टेशन द्वारा कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ रह “कोरोना योद्धाओं” जिसमें स्थानीय पुलिसकर्मी , एनएसएस के छात्रगण व सैंज व्यापार मण्डल शामिल हैं, को सुरक्षा किट : 200 मास्क , 40 जोड़ी गलब्स , 5 लीटर सैनीटाईजर, 3 स्प्रे बोतल व 15 लीटर सोडियम हाईपोक्लोराईड आदि समाहीत रूप से प्रदान किया गया।कार्यक्रम के दौरान सामाजिक दूरी बनाए रखा गया ।

 

बैरास्यूल पावर स्टेशन

बैरास्यूल पावर स्टेशन, सुरंगानी में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर वृहत वृक्षारोपण किया गया। विश्व पर्यावरण दिवस के विषय जैवविविधता पर चर्चा करते हुए उपस्थित लोगों से पर्यावरण संरक्षण हेतु बढ़-चढ़ कर भाग लेने का आवाह्न किया गया । साथ ही साथ अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण करने एवं पर्यावरण के प्रति जागरूक बनने का आग्रह करते हुए हर्बल पार्क, प्रशासनिक भवन, सुरंगानी में वृक्षारोपण का कार्यक्रम संपन्न किया गया। वृक्षारोपण कार्यक्रम के तहत जड्डू आवासीय परिसर में भी वृक्षारोपण किया गया।

 

 

Category:  Environment


 |    June 20, 2020 |   0 comment

एनएचपीसी निगम मुख्यालय में विश्व पर्यावरण दिवस 2020 का आयोजन

पृथ्वी के पर्यावरण संरक्षण व संवर्धन के प्रति समर्थन प्रदान करने के उद्देश्य के साथ विश्व भर के देशों द्वारा 5 जून, 2020 को ” विश्व पर्यावरण दिवस ” उत्साहपूर्वक मनाया गया । इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस का विषय “जैव विविधता” है। इस वैश्विक आयोजन में अपनी प्रतिभागिता सुनिश्चित करते हुए एनएचपीसी निगम मुख्यालय, फरीदाबाद के साथ-साथ इसके विभिन्न परियोजना स्थलों पर 5 जून, 2020 को विश्व पर्यावरण दिवस का उत्साहपूर्वक आयोजन किया गया।

 

एनएचपीसी कार्यालय परिसर में जैव विविधता का प्रसार करने के उद्देश्य से नए बैंक परिसर के पास एक हर्बल पार्क का निर्माण कराया गया है। इस हर्बल पार्क का उद्घाटन श्री ए.के.सिंह, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक महोदय ने सभी निदेशकगण, मुख्य सतर्कता अधिकारी एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में किया।श्री ए.के.सिंह, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक महोदय, सभी निदेशकगण, मुख्य सतर्कता अधिकारी एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा कार्यालय परिसर में पौधरोपण किया गया। विश्व पर्यावरण दिवस- 2020 के विषय “जैव विविधता” के अनुरूप, विशेष तौर पर औषधीय महत्व के पौधे जैसे आंवला, घृतकुमारी , गिलोय, तुलसी, नींबू-घास, हल्दी, अश्वगंधा, शतावरी आदि का हर्बल पार्क में रोपण किया गया है ।आयोजन को और भी प्रासंगिक और उद्देश्यपूर्ण बनाते हुए इस अवसर पर कर्मचारियों के बीच औषधीय पौधों का वितरण किया गया।

 

एनएचपीसी निगम मुख्यालय एवं आवासीय परिसर के साथ-साथ सभी क्षेत्रीय कार्यालयों और परियोजनाओं में वृहत पैमाने पर विश्व पर्यावरण दिवस का उत्साहपूर्वक आयोजन करते हुए पौधरोपण किया गया ।सभी आयोजनों में केंद्र सरकार द्वारा जारी कोविड-19 के दिशानिर्देशों का अनुपालन करते हुए सामाजिक दूरी बनाए रखने का अनुपालन किया गया ।

Category:  Environment


 |    June 20, 2020 |   0 comment

एनएचपीसी की जम्मू कश्मीर स्थित परियोजनाओं में विश्व पर्यावरण दिवस 2020 के आयोजन की झलकियां

उड़ी पावर स्टेशन

उड़ी पावर स्‍टेशन में विश्‍व पर्यावरण दिवस हर्षोल्‍लास के साथ मनाया गया । पावर स्‍टेशन में इस अवसर पर पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया । पावर स्‍टेशन के अधिकारियों और कार्मिकों ने उत्‍साह के साथ उपस्थित दर्ज की । उपस्थित सभी अधिकारियों व कार्मिकों को पर्यावरण संगत कार्य व्‍यवहार करने का संदेश दिया गया साथ ही इस आशय की जागरूकता आम जनमानस में भी उत्‍पन्‍न करने की अपील की गई।

 

किशनगंगा पावर स्टेशन

किशनगंगा पावर स्टेशन द्वारा पर्यावरणीय धारणीयता सुनिश्चित करने के उद्देश्य के साथ पौधरोपण कार्यक्रम द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर जैव विविधता संरक्षण की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूकता, मानव जीवन में पर्यावरण का महत्व और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार रहने की अपील की गई। कोविड 19 के मद्देनजर उचित मानदंडों का अनुसरण करते हुए कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

 

 

 

सेवा II पावर स्टेशन

सेवा II पावर स्टेशन में विश्व पर्यावरण दिवस पर पौधरोपण अभियान का आयोजन किया गया। इसके तहत तक़रीबन 50 पौधों को पंक्तिबद्ध तरीके से रोपित किया गया। पहाड़ों में बढ़ती गर्मी को देखते हुए सभी कर्मचारियों व उनके परिवार के सदस्यों से आग्रह किया गया कि सभी बच्चों के जन्मदिन पर उनसे एक पौधा लगवा कर प्रकृति के प्रति उनके लगाव को बढ़ाने का प्रयास करें। प्रदुषण मुक्त पर्यावरण के प्रति द्वारा गैर पारम्परिक ईंधन से विद्युत उत्पादन पर किए जा रहे कार्यों पर चर्चा करते हुए पौधरोपण अभियान, कार्बन फुट प्रिंट कम करना, ऊर्जा / ईंधन कि बचत, प्लास्टिक व कागज के कम से कम उपयोग जैसे पर्यावरणीय पहलों पर कार्य करने कि अपील कि गई।

 

 

 

सलाल पावर स्टेशन

सलाल पावर स्टेशन द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए वृक्षारोपण अभियान के तहत फील्ड हॉस्टल ज्योतिपुरम में पौधे लगाए गए। इस अवसर पर पौधरोपण को पर्यावरण दिवस तक ही सीमित न रखते हुए एक सतत प्रयास कि तरह व्यहवार में लाने का सन्देश दिया गया। पर्यावरणीय खतरा व्यक्तिगत नहीं अपितु वैश्विक मुद्दा है अतः समेकित प्रयास द्वारा ही इसका समाधान संभव है।

 

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर सलाल पावर स्टेशन में एक प्लास्टिक बेलिंग मशीन का उद्घाटन किया गया। ज्योतिपुरम में इस मशीन की स्थापना प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण के विरुद्ध एक सकारात्मक पहल है। मशीन का उपयोग गैर – विघटक ठोस कचरे को कॉम्पैक्ट आकार में सम्पीड़ित करने के लिए किया जाएगा जिसे आगे की रीसाइक्लिंग के लिए संकलित व परिवहन करना आसान रहेगा।

 

इस अवसर पर अधिकारियों एवं कर्मचारियों को पौधे भी वितरित किए गए और साथ ही साथ पौधे की वृद्धि व अस्तित्व सुनिश्चित करने का अनुरोध भी किया गया। बच्चों में पर्यावरण जागरूकता हेतु ज़ूम ऍप के माध्यम से चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया।

 

 

 

दुलहस्ती पावर स्टेशन

दुलहस्ती पावर स्टेशन में पर्यावरण संरक्षण का सन्देश देते हुए तथा कोविड 19 महामारी से सम्बंधित सामजिक दूरी के मानदंडों का पालन करते हुए विश्व पर्यावरण दिवस का उत्साह के साथ आयोजन किया गया। इस अवसर पर पावर स्टेशन के फील्ड हॉस्टल प्रांगण में पौधरोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसके तहत फलदार पौधे लगाए गए। कार्यक्रम में सभी से अधिकाधिक पौधे लगाने तथा पर्यावरण संरक्षण हेतु जागरूकता फैलाने का आव्हान किया गया।

 

 

 

उड़ी-II पावर स्टेशन

उड़ी-II पावर स्टेशन में विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन उत्साह के साथ किया गया। इस अवसर पर कार्यालय सह आवासीय परिसर में पौधरोपण कर पर्यावरण संरक्षण का सन्देश दिया गया। अधिकारियों एवं कार्मिकों द्वारा विभिन्न प्रकार के फलदार वृक्षों के पौधे लगाए गए। कोविड 19 महामारी के मद्देनजर जारी विभिन्न सुरक्षा निर्देशों का पालन करते हुए कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

 

Category:  Environment


 |    June 20, 2020 |   0 comment

एनएचपीसी की लद्दाख स्थित परियोजनाओं में विश्व पर्यावरण दिवस 2020 के आयोजन की झलकियां

निम्मो बाजगो पावर स्टेशन

निम्मो बाजगो पावर स्टेशन, अल्ची में विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन हर्षोलास के साथ किया गया। इस अवसर पर पावर स्टेशन के सभी अधिकारी और कर्मचारीगण द्वारा पौधरोपण कर प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी व प्रतिबद्धता वयक्त की गई।कोविड 19 महामारी के प्रसार को देखते हुए सरकार द्वारा जारी दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए सामाजिक दूरी के साथ मास्क पहन कर कार्यक्रम में भाग लिया गया।

 

 

 

Chutak Power Station

Environment Day was observed at Chutak Power Station. On the occasion,  the sapling plantation programme at Chutak Power Station Barrage Site was conducted. About 50 apricot saplings were planted on the Environment Day. All employees present at the Power Station actively participated in the plantation programme. COVID-19 norms of social distancing and other safety measures were adhered to during the plantation programme.