पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन के लिए संयुक्त राष्ट्र हमेशा अपने मौलिक सिद्धांत पर जोर देता है – “थिंक ग्लोबली, एक्ट लोकली” अर्थात वैश्विक सोच के साथ आंचलिक स्तर पर कार्य करना। यह सिद्धांत दार्शनिक व वैश्विक सोच के अनुरूप है। इस संदर्भ में विश्व पर्यावरण दिवस समारोह में भाग लेने का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। वर्ष 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम से शुरू होने के बाद से ही विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून को दुनिया भर में व्यापक स्तर पर मनाया जाता है। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए दीर्घकालीन जागरूकता अभियान हेतु  5 जून को एक महत्वपूर्ण दिवस के रूप में चिह्नित किया गया है। प्रथम विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन मील का पत्थर सिद्ध हुआ जिसके पश्चात न केवल भारत में अनेक हरित नीतियाँ-कानून निर्मित और प्रतिस्थापित हुए, साथ ही वैश्विक चिंताओं को समझते हुए दुनिया भर के देशों ने अपनी परिधि में पर्यावरण प्रिय प्रयासों को प्रोत्साहित किया। पर्यावरण संरक्षण के इस उत्सव ने विगत सालों में वैश्विक समुदाय की सोच और पारिस्थितिकी क्षरण संबंधी खतरों के परिणामों पर कार्य करने के तरीकों में जबरदस्त परिवर्तन किया है। विश्व पर्यावरण दिवस का वार्षिक कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित की गई विशेष थीम या विषय पर आधारित होता है। वर्ष 2021 का विषय “Restoration of Ecosystem” अर्थात पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली निश्चित रूप से इस धरती के साथ-साथ हमारी एवं भविष्य की पीढ़ी के लिए एक बेहतर जगह बनाने में व्यवहार के साथ विचार में भी बदलाव लाने वाला साबित होगा।

 

हमारा लगाया हुआ एक पेड़ भी वैश्विक परिवेश के लिये ऐसा ही योगदान है, जैसे बूंद-बूंद से घड़ा भरता है। इसे देखते हुए विश्व पर्यावरण दिवस के आयोजन की महत्ता बढ़ जाती है। पेड़-पौधे, नदियां, जंगल, जमीन, पहाड़ आदि केवल मानव जीवन के लिए ही आवश्यक नहीं अपितु उनके सह-संयोजन से हमारा पारिस्थितिक तंत्र निर्मित हुआ है। किसी पारितंत्र में कीट-पतंग से ले कर मानव तक प्रत्येक समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। इस बात को चीन के उदाहरण से समझा जाता है जहाँ एक दौर में यह मान लिया गया था कि गोरैया फसल का नुकसान करती है इसलिये अनावश्यक जीव है। इस सोच के साथ वर्ष 1958 में समूचे चीन में गोरैया को मारने का ऐसा अभियान आरम्भ हुआ कि यह नन्हा पक्षी उस परिक्षेत्र से समाप्त ही हो गया। चिड़िया अनाज के कुछ दाने अवश्य खाती थी परंतु वह उन कीट-पतंगों की जनसंख्या को भी तो नियंत्रित रखती थी जो खड़ी फसल को हानि पहुँचा सकते थे। परिणाम यह हुआ कि चीन में भयानक अकाल की स्थिति निर्मित हुई जिसमें लगभग ढाई करोड़ मनुष्यों की जान चली गयी। यह उदाहरण पारितंत्र की कार्यशैली को समझने में महत्व का है साथ ही बोध कराता है कि हमें उसके संवर्धन की आवश्यकता क्यों है।

 

एनएचपीसी ने एक पर्यावरण प्रिय संस्था के रूप में अपने परियोजना क्षेत्रों में पारितंत्र के संरक्षण, संवर्धन व पुनरुद्धार पर सतत कार्य किया है। इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में निगम मुख्यालय के साथ-साथ विभिन्न परियोजनाओं एवं पावर स्टेशनों में कोविड-19 से बचाव हेतु जारी निदेशों का कड़ाई से पालन करते हुए पर्यावरण जागरूकता अभियान तथा पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसके साथ ही सलाल पावर स्टेशन ज्योतिपुरम में दो आर्गेनिक वेस्ट कंपोस्टिंग मशीन के संचालन का उदघाटन भी किया गया। रंगित पावर स्टेशन में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर वृक्षारोपण कार्यक्रम के साथ कार्मिकों के बच्चों के लिए ऑनलाइन पेंटिंग प्रतियोगिता आयोजित कर भावी पीढ़ी को पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रोत्साहित किया गया। परियोजनाओं के निर्माण की अवधि में ही अनेक प्रबंधन योजनायें जिनमें क्षतिपूरक वनारोपण, जलागम उपचार, जैव-विविधता संरक्षण, जलाशय परिधि उपचार, संकटापन्न जीव संरक्षण आदि महत्वपूर्ण योजनायें प्रतिपादित की जाती हैं। वस्तुत: यही सतत विकास की अवधारणा भी है।

 

तापस सिन्हा

महाप्रबंधक (प्रभारी)

पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग

 

 

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