Image Source = https://www.thehindu.com/sci-tech/energy-and-environment/plan-for-district-environment-impact-assessment-panels-under-fire/article28313596.ece

 

प्रस्तावना:

जलविद्युत परियोजनाओं की संकल्पना के पश्चात उनके निर्माण से पहले पर्यावरण स्वीकृती की आवश्यकता होती है। इस संबंध में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 के अंतर्गत जारी की गयी पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना 2006, महत्वपूर्ण है। यह अधिसूचना राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के उद्देश्यों को पूर्ण करने हेतु निर्मित की गई है जिसमें दी गई प्रक्रियाओं के अनुसार भारत के किसी भी क्षेत्र में प्रस्तावित विकास परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए  पर्यावरणीय स्वीकृति की आवश्यकता होती है। अधिसूचना में सूचीबद्ध की गई सभी नई परियोजनाओं, उनसे जुड़े क्रियाकलापों, उनके विस्तार अथवा आधुनिकीकरण करने लिए पर्यावरण स्वीकृति लिया जाना एक आवश्यक प्रक्रिया है।

 

 1.      परियोजना का वर्गीकरण:

पर्यावरण प्रभाव आंकलन (ईआईए) अधिसूचना 2006 के अनुसार, किसी भी विकास कार्य से कई प्रकार के प्रभाव जुड़े हैं जिनकी समुचित विवेचना करने के लिए प्रस्तावित की गई परियोजनाओं को दो प्रमुख श्रेणि‍यों – अ (A) एवं ब (B) में विभाजित किया गया है।

 

1.1. श्रेणी ‘अ’ : अनुसूची के श्रेणी ‘अ’ में सम्मिलित सभी परियोजनाओं या गतिविधियों के संचालन के लिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी /EAC) की सिफारिश आवश्यक है। अनुसूची के श्रेणी ’ब’ में सम्मिलित सभी परियोजनाओं या गतिविधियों के संचालन के लिए राज्य/ केंद्र शासित प्रदेश के पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (एसईआईएए /SEIAA) से पूर्व-पर्यावरणीय स्वीकृति की आवश्यकता होती है। जलविद्युत परियोजनाओं के संबंध में,  ≥ 50 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन को अनुसूची श्रेणी ‘अ ’ के 1 (सी) में शामिल किया गया है, अत: इन परियोजनाओं को केंद्रीय मंत्रालय स्तर पर मूल्यांकन किया जाता है। < 50 मेगावाट से ≥ 25 मेगावाट के जलविद्युत उत्पादन को अनुसूची श्रेणी ‘ब ’ के 1 (सी) में शामिल किया गया है, जिसे राज्य स्तर पर  मूल्यांकन किया जाता है।

 

1.2 श्रेणी ‘ब’ : यह भी ध्यान रखना होगा कि, श्रेणी ‘ब’ में वर्गीकृत की गई कोई भी परियोजना या गतिविधि श्रेणी ‘अ’ में माना जा सकता है यदि वह निम्नलिखित आहर्ताओं के 10 किमी के भीतर / हिस्से के  अंतर्गत आता है :

  • वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत अधिसूचित संरक्षित क्षेत्र,
  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा समय-समय पहचाने गए गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्र,
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्र जैसे- महाबलेश्वर पंचगनी, माथेरान, पचमढ़ी, दहानू, दून घाटी,
  • अंतर-राज्य सीमाएँ और अंतर्राष्ट्रीय सीमाएं इत्यादि।

 

2.      पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया:

प्रस्तावित परियोजना/ गतिविधियों के लिए जब संभावित स्थान की पहचान कर ली जाती है तब निर्माण गतिविधि से पहले, परियोजना प्रबंधन (आवेदक) द्वारा पूर्व-पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त करने के लिए आवेदन किया जाता है। इसके लिए निर्धारित प्रपत्र – 1 भर कर, पूर्व-व्यवहार्यता परियोजना रिपोर्ट (Pre-feasibility project report) के साथ आवेदन किया जाता है।  पर्यावरण स्वीकृति प्रक्रिया के चार शृंखलाबद्ध क्रम होते हैं:

 

 2.1. स्क्रीनिंग (Screening) : यह परियोजना के प्रकार का आरंभिक वर्गीकरण करने की प्रक्रिया है। इस चरण में किन नई परियोजनाओं या क्रियाकलापों के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट आवश्यक है, इसकी सुनिश्चितता होती है।  यह प्रक्रिया केवल प्रवर्ग ‘ब’ के लिए लागू है। इस प्रक्रम में,  श्रेणी ‘ब 1’ परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट आवश्यक है परंतु श्रेणी ‘ब 2’ परियोजनाओं को पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट की आवश्यकता नहीं है।

 

2.2 स्कोपिंग (Scoping): जलविद्युत परियोजना अनुसूची ‘अ’ के 1 (c) के अंतर्गत केंद्रीय सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा निर्माण पूर्व गतिविधियों और पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन (ईआइए) एवं पर्यावरणीय प्रबंधन योजनाओं (ईएमपी) के निर्माण करने के लिए व्यापक संदर्भ की शर्तें (Terms of References) की मंजूरी दी जाती है। यह टर्म्स ऑफ रिफरेन्स, ईआइए (EIA) और ईएमपी (EMP) अध्ययन के लिए संरचना उपलब्ध कराती है। टर्म्स ऑफ रिफरेन्स का मानकीकृत  प्रारूप वैबसाइट (envfor.nic.in) पर भी उपलब्ध है। मंत्रालय द्वारा गठित विशेषज्ञ आंकलन समिति (EAC) या राज्य स्तरीय विशेषज्ञ आंकलन समिति (SEAC) स्वविवेक से/ परियोजना की परिस्थिति के अनुरूप टर्म्स ऑफ रेफरेन्स में अतिरिक्त अध्ययन भी प्रस्तावित कर सकती है । आवेदक द्वारा प्रेषित किए गए प्रारूप 1 / प्रारूप 1 अ में दी गई जानकारी के आधार पर केंद्रीय मंत्रालय के विशेषज्ञ आंकलन समिति (EAC) द्वारा आंकलन करने के पश्चात टर्म्स ऑफ रेफरेन्स का अनुमोदन पत्र आवेदक को संप्रेषित किया जाता है। इसके पश्चात, मान्यता प्राप्त परामर्शकों के माध्यम से विस्तृत पर्यावरण प्रभाव आकलन अध्ययन कराया जाता है।

 

2.3 लोक परामर्श (Public Consultation) : “लोक परामर्श” उस प्रक्रिया को संदर्भित करता है जिसके द्वारा स्थानीय प्रभावित व्यक्तियों की प्रतिक्रिया या अन्य व्यक्ति जो परियोजना या गतिविधि के पर्यावरणीय प्रभावों में स्वीकार्य हिस्सेदारी रखते हैं, उनका अभिमत या राय ली जाती है। लोक परामर्श में आमतौर पर स्थानीय प्रभावित व्यक्तियों की प्रतिक्रिया को संबोधित करने हेतु, परियोजना के प्रत्येक जनपद में जनसुनवाई निर्धारित तरीके से की जाती है एवं संबंधित व्यक्ति से परियोजना या गतिविधि पर लिखित में प्रतिक्रिया प्राप्त की जाती है। लोक परामर्श के दौरान  व्यक्त की गई प्रतिक्रिया पर आवेदक पर्यावरण संबंधी मुद्दे को संबोधित करता है एवं ईआईए और ईएमपी रिपोर्ट में उचित बदलाव अथवा वैकल्पिक रूप से परामर्श के दौरान व्यक्त की गई प्रतिक्रिया को संबोधित करते हुए ईआइए (EIA) और ईएमपी (EMP) के मसौदा के साथ पूरक रिपोर्ट  भी तैयार करता है ।जनसुनवाई के आयोजन का संचालन राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) या केंद्र शासित प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण समिति (UTPCC) द्वारा निर्दिष्ट तरीके किये जाने के उपरांत जनसुनवाई कार्यवाही (proceedings) को विनियामक प्राधिकरण (regulatory authority) को प्रेषित कर दिया जाता है।

 

 2.4 मूल्यांकन (Appraisal) : इस प्रक्रिया में परियोजना प्रबंधक द्वारा अंतिम ईआईए/ ईएमपी रिपोर्ट, कार्यकारी सारांश, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर), जन सुनवाई की कार्यवाहियों को क्रमश: पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय या राज्य प्रबंधन के विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति या राज्य स्तरीय मूल्यांकन समिति द्वारा विस्तृत मूल्यांकन किए जाने हेतु अग्रेषित किया जाता है। आवेदन की प्राप्ति के पश्चात  केंद्रीय या राज्य स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति द्वारा संबंधित पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज पर निर्णय सुनिश्चित किया जाता है। ईएसी की सिफारिश के पश्चात परियोजना को अनुपालन शर्तों के अधीन पर्यावरणीय मंजूरी दी जाती है।  नियामक प्राधिकरण द्वारा ईएसी या एसईएसी की सिफारिशों (recommendations) पर विचार करने के उपरांत, अपेक्षित निर्णय की जानकारी से आवेदक को सूचित किया जाता है।

 

3.      पर्यावरणीय मंजूरी की वैधता अवधि:

पर्यावरणीय मंजूरी, नदी घाटी परियोजनाएँ (शेड्यूल आइटम 1 सी),  के संबंध में दस साल की अवधि के लिए मान्य है जो कि तीन साल की अधिकतम अवधि के लिए विस्तारित की जा सकती है।

 

4.      पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्ति के उपरांत निगरानी:

पर्यावरण मंजूरी नियमों और शर्तों पर आधारित परियोजना/कार्यकलापों की अर्ध-वार्षिक अनुपालन रिपोर्ट, प्रत्येक कैलेंडर वर्ष में 1 जून और 1 दिसंबर को संबंधित नियामक प्राधिकरण या पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालयों को हार्ड और सॉफ्ट प्रतियां, परियोजना प्रबंधन द्वारा प्रेषित करना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन अध्ययन की अनुशंसाओं पर विमर्श के लिए ईएसी द्वारा गठित मॉनिटरिंग कमिटी की परियोजना में समय-समय पर बैठक होती रहती है।

 

पर्यावरण प्रभाव आंकलन अधिसूचना 2006 का उपयोग पर्यावरण और वन मंत्रालय (एमओईएफ) द्वारा  पर्यावरण पर तेजी से औद्योगिकीकरण के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने और उन रुझानों को अकृत करने के लिए एक प्रमुख उपकरण के रूप में किया जाता है जो अंतत: जलवायु परिवर्तन का कारण बन सकते हैं।

 

-रितुमाला गुप्ता

वरि. प्रबंधक (पर्यावरण) 

स्रोत : पर्यावरण, वन  एवं जलवायु मंत्रालय, भारत सरकार – ईआईए अधिसूचना 2006