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पर्यावरण वार्ता (अंक 17)

पर्यावरण के सिद्धांतों को जीवन में आत्मसात करना आवश्यक है, इस सम्बन्ध में महात्मा गाँधी अनुकरणीय हैं। एक संत, एक युगप्रवर्तक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में हम उन्हें जानते हैं परंतु एक पर्यावरण चिंतक के रूप में भी उनकी अनिवार्य रूप से चर्चा होनी चाहिये। विचार कीजिये कि पहनावे में खादी का प्रयोग, दार्शनिकता में अहिन्सा के तत्व तथा जीवन शैली में स्वच्छता का अनुसरण, क्या पर्यावरण संरक्षण के मूल सिद्धांत नहीं हैं ? गाँधी जी मानते हैं कि प्रकृति हमें पहनने-खाने का इतना कुछ देती है कि किसी लोभ के लिये उसका दोहन अनुचित है। यह धरती, इसमें बसने वाले प्रत्येक पेड़ पौधे और जीवजंतु की है, साथ ही जो गंदगी अथवा प्रदूषण जिसने फैलाया है उसको ही स्वच्छ करना होगा। इन तीन बिंदुओं पर ध्यान पूर्वक विचार करें तो आज पर्यावरण प्रिय जीवन शैली अपनाने के जो विचार हैं, सतत विकास की जो अवधारणा है एवं ‘पॉल्यूटर पेज़’ से जुड़ी नियमावलियाँ हैं, सब कुछ महात्मा गाँधी की विचार प्रक्रिया से उत्पन्न जान पड़ता है। उनका प्रसिद्ध कथन इसीलिये बार-बार वैशविक मंचों से उद्धरित भी किया जाता है कि प्रकृति सभी मनुष्यों की आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है, उनके लालच को नहीं। “ 2 अक्टूबर को जब हम महात्मा गाँधी की जयंती मनाते हैं तब उनका सूत्रवाक्य विस्मृत कर देते हैं, उन्होंने कहा था कि “मेरा जीवन ही मेरा संदेश है”।

 

 

महात्मा गाँधी के जीवन दर्शन से हो कर, हमें अपने कार्यों की समुचित विवेचना करनी चाहिये। भारत एक ग्रामवासी देश कहा जाता है; हमारे सभी उद्यम गाँवों के विकास के लक्ष्य के साथ होने चाहिये। एनएचपीसी द्वारा यह प्रयास किया जाता है कि अपनी परियोजनाओं के लिये पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन करते हुए परियोजना प्रभावित परिवारों के हित में योजनाओं को निर्मित किया जाये। जलविद्युत परियोजनाओं को वैसे भी ‘पर्यावरण प्रिय’ माना जाता है। हाल के दौर में जिस तरह का ईंधन संकट ब्रिटेन में देखा गया अथवा कोयला की अनुपलब्धता के कारण विद्युत संकट चीन में देखा जा रहा है, ऐसे में किसी भी देश की दूरगामी रणनीति गैरपारम्परिक ऊर्जास्त्रोतों की ओर लौटना ही हो सकती है। प्रकृति ने हमें धूप और पानी प्रचुरता में दिया है जिनका समुचित प्रयोग राष्ट्र को अपनी ईंधन व ऊर्जा आवश्यकताओं के दृष्टिगत आत्मनिर्भर बना सकता है। एनएचपीसी ने न केवल जल अपितु अब सौर ऊर्जा उत्पादन की दिशा में अपने मजबूत कदम बढ़ा दिये हैं। महात्मा गाँधी के प्रकृति के साथ चलने का मंत्र और विकास की उनकी परिभाषा को एनएचपीसी ने अपने योजना निर्माण और प्रतिपादन में आत्मसात किया है। मेरा एनएचपीसी पर्यावरण ब्लॉग के सभी पाठकों से यह आग्रह होगा कि महात्मा गाँधी से प्रेरित हो कर अपनी जीवनशैली में पर्यावरण से जुड़ी सोच, समझ को अवश्य विकसित करें।

 

 

वी आर श्रीवास्तव

कार्यपालक निदेशक

पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग

 

 

Image source : https://www.downtoearth.org.in/news/lifestyle/gandhi-at-150-the-pilgrim-s-progress-66997
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 |    October 21, 2021 |   1 comment

अंक की तस्वीर

एनएचपीसी के 510 मेगावाट तीस्ता-V पावर स्टेशन, सिक्किम को इंटरनेशनल हाइड्रोपावर एसोसिएशन (IHA) से मिला ‘ब्लू प्लैनेट प्राइज़’

 

श्री ए.के. सिंह, सीएमडी, एनएचपीसी और श्री बाई.के. चौबे, निदेशक (तकनीकी), एनएचपीसी और अन्य वरिष्ठ अधिकारीगण तीस्ता V पावर स्टेशन को मिले आईएनए- ब्लू प्लैनेट प्राइज’ ट्रॉफी के साथ

 

एनएचपीसी के 510 मेगावाट तीस्ता-V पावर स्टेशन जो कि हिमालयी राज्य सिक्किम में स्थित है,  को 120 देशों में संचालित लंदन स्थित गैर लाभकारी सदस्यता संघ इंटरनेशनल हाइड्रोपावर एसोसिएशन (आईएचए) द्वारा प्रतिष्ठित ‘ब्लू प्लेनेट प्राइज’ से सम्मानित किया गया है। एनएचपीसी के स्वामित्व वाले इस पावर स्टेशन का निर्माण एनएचपीसी द्वारा किया गया है और संचालन भी एनएचपीसी द्वारा किया जा रहा है। तीस्ता-V पावर स्टेशन के लिए इस पुरस्कार की घोषणा 23.09.2021 की वर्ल्ड हाइड्रोपावर कांग्रेस 2021 के दौरान की गई। यह पुरस्कार तीस्ता-V पावर स्टेशन को आईएचए के हाइड्रोपावर सस्टेनेबिलिटी असेसमेंट प्रोटोकॉल (एचएसएपी) के ऑपरेशन स्टेज टूल का उपयोग करके 2019 में आईएचए के मान्यता प्राप्त लीड असेसर्स की एक टीम द्वारा किए गए इसकी सस्टेनेबिलिटी असेसमेंट के आधार पर प्रदान किया गया।

 

इस अवसर पर बोलते हुए श्री ए.के. सिंह, सीएमडी, एनएचपीसी ने कहा, “तीस्ता-V पावर स्टेशन का सस्टेनेबिलिटी असेसमेंट हमारे संगठन के लिए सीखने का अनुभव था क्योंकि यह भारत में किया गया पहला ऐसा असेसमेंट था। इस असेसमेंट के परिणाम इस बात को विशिष्ट रूप से उजागर करते हैं कि किस प्रकार एनएचपीसी स्थानीय समुदाय सहित सभी हितधारकों को शामिल करते हुए और पर्यावरण पर प्रभाव को कम करते हुए विदयुत विकास के लिए प्रतिबद्ध है। इस पुरस्कार से मिले सम्मान से वैश्विक मंच पर एनएचपीसी की छवि में वृद्धि होगी। यह हमें सस्टेनेबेल जलविद्युत उत्पादन में उच्च मानकों को प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करेगा।”

 

आईएचए के सदस्यों में प्रमुख जलविद्युत ऑनर्स और ऑपरेटर, डेवलपर्स, डिजाइनर, आपूर्तिकर्ता और सलाहकार शामिल हैं। आईएचए ब्लू में प्लॅनेट पुरस्कार उन जलविद्युत परियोजनाओं को प्रदान किया जाता है जो सतत विकास में उत्कृष्टता प्रदर्शित करती हैं। हाइड्रोपावर सस्टेनेबिलिटी असेसमेंट प्रोटोकॉल जलविद्युत परियोजनाओं की सस्टेनेबिलिटी को मापने के लिए अग्रणी अंतर्राष्ट्रीय साधन है। यह पर्यावरणीय, सामाजिक, तकनीकी और गर्वनेंस के मानदंडों की बृहद श्रृंखला के लिए जलविद्युत परियोजना के प्रदर्शन हेतु मापदण्ड का तरीका प्रदान करता है। मूल्यांकन वस्तुनिष्ठ साक्ष्य पर आधारित होते हैं और परिणाम मानकीकृत रिपोर्ट में प्रस्तुत किए जाते हैं।

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 |    October 21, 2021 |   0 comment

Global Climate Risk Index 2021

Image source : https://www.studymarathon.com/daily-news-en/global-climate-risk-index-2021/

 

The Germanwatch Global Climate Risk Index is an analysis based on one of the most reliable data sets available on the impacts of extreme weather events and associated socio-economic data, the MunichRe NatCatSERVICE.

 

The Global Climate Risk Index indicates a level of exposure and vulnerability to extreme weather events, which countries should understand as warnings in order to be prepared for more frequent and/or more severe events in the future. The index focuses on extreme weather events such as storms, floods and heat waves but does not take into account important slow-onset processes such as rising sea levels, glacier melting or ocean warming and acidification. It is based on past data and is not be used as a basis for a linear projection of future climate impacts, etc. The index analyses and ranks to what extent countries and regions have been affected by impacts of climate-related extreme weather events, their level of exposure and vulnerability.

 

The Climate Risk Index (CRI) report 2021 is the 16th edition of the annual report and has taken into account the data available from 2000 to 2019. Data from 180 countries were analyzed. The key findings of the report are as under:

 

  • Storms and their direct implications i.e. precipitation, floods and landslides, were one major cause of losses and damages in 2019. Of the ten most affected countries in 2019, six were hit by tropical cyclones.

 

  • Developing countries are particularly affected by the impacts of climate change. They are hit hardest because they are more vulnerable to the damaging effects of a hazard but have lower coping capacity. Eight out of the ten countries most affected by the quantified impacts of extreme weather events in 2019 belong to the low- to lower-middle income category. Half of them are Least Developed Countries.

 

  • Mozambique, Zimbabwe and the Bahamas were the most affected countries by the impacts of extreme weather events in 2019, followed by Japan, Malawi and the Islamic Republic of Afghanistan.

 

  • India ranked as the seventh worst-hit country in terms of climate change in 2019. In 2019, the monsoon conditions continued for a month longer than usual, with the surplus of rain causing major hardship. The floods caused by the heavy rains were responsible for deaths across 14 states in India and led to the displacement of 1.8 million people. Furthermore, with a total of eight tropical cyclones, the year 2019 was one of the most active Northern Indian Ocean cyclone seasons on record. Six of the eight cyclones intensified to become “very severe”. The worst was Cyclone Fani in May 2019 which caused widespread devastation.

 

  • Altogether, between 2000 and 2019, over 475 000 people lost their lives as a direct result of more than 11,000 extreme weather events globally and losses amounted to around US$ 2.56 trillion (in purchasing power parities).

 

  • The global COVID-19 pandemic has reiterated the fact that both risks and vulnerability are systemic and interconnected. It is therefore important to strengthen the resilience of the most vulnerable against different types of risk (climatic, geophysical, economic or health-related).

 

  • Signs of escalating climate change can no longer be ignored on any continent or in any region.

 

  • Effective climate change mitigation and adaptation is required to prevent or minimize potential damage in the self-interest of all countries worldwide.

 

Efficacy /Importance: 

The Climate Risk Index (CRI) can help to assess the vulnerability of the county to extreme climatic events. It can help countries to understand the patterns of climatic events and develop proper warning systems and management practices in order to be prepared for more frequent and/or more severe climatic events in the future. It can also help investors to assess the risks to their investments in countries due to climatic events.

 

 

– Dr. Anuradha Bajpayee,

Senior Manager (Env), CO

References:
  1. Germanwatch. Jan. 2021. GLOBAL CLIMATE RISK INDEX 2021: Who Suffers Most from Extreme Weather Events? Weather-Related Loss Events in 2019 and 2000-2019.
  2. Earth Observatory. 2019. Unusual Monsoon Season Causes Flooding in India. Available at https://earthobservatory.nasa.gov/images/145703/unusual-monsoon-season-causes-flooding-in-india
  3. The Weather Company. 2020. Throwback to a Stormy Year: A Look at the 8 North Indian Ocean Cyclones of 2019. Available at https://weather.com/en-IN/india/news/news/2020-01-03-stormy-year-8- north-indian-ocean-cyclones-2019.

 

 

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 |    October 21, 2021 |   0 comment

“खज़ानों के हीरे : बावड़ी जल संचय की पारंपरिक प्रणाली”

चित्र आभार – रितुमाला गुप्ता , वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

 

प्राचीन काल से ही भारत में जल के महत्व को समझते हुए जल संरक्षण एंव प्रबंधन के कार्य किए गए हैं। मुख्य रूप से “वर्षा जल संचय” – जल संरक्षण की एक प्राचीन परंपरा है जो वर्तमान परिदृश्य में अधिक प्रासंगिक हो गयी है। जल संरक्षण और प्रबंधन तकनीकों में अंतर्निहित मूल अवधारणा यह है कि वर्षा का पानी जब भी और जहां भी गिरे उस जल का संरक्षण किया जाना चाहिए। पुरातात्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि जल संरक्षण और प्रबंधन की प्रथा, प्राचीन भारत के विज्ञान में गहराई से निहित है। प्राचीन भारत में बाढ़ और सूखा दोनों नियमित घटनाएँ थीं एवं यह एक कारण हो सकता है कि देश के हर क्षेत्र की भौगोलिक विषमताओं और सांस्कृतिक विशिष्टताओं के आधार पर पारंपरिक जल संरक्षण और प्रबंधन तकनीक उपायों का निर्माण किया गया होगा । हमारे देश के जल संरक्षण और प्रबंधन के विरासत को दर्शाने के लिए जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा वर्ष 2020 में “”भारत की तरल संपत्ति के लिए बावड़ी खानदानी ख़ज़ाने  ( http://jalshakti-dowr.gov.in/sites/default/files/eBook/eBook-Stepwell/mobile/index.html”  पुस्तिका प्रकाशित कि गयी है और बावड़ी को खानदानी ख़ज़ानों  का दर्जा दिया गया है।

 

सदियों के अनुभव के आधार पर, भारतीयों ने आने वाले शुष्क मौसमों के लिए मानसूनी जल वर्षा को सँभालने, संचित और संग्रहित करने के लिए पारंपरिक जल संरक्षण ढांचों – “बावड़ी” की संरचनाओं का निर्माण उस समय की परिस्थिति व आवश्यकता के अनुसार किया गया। “बावड़ी” – मानव निर्मित कुएँ या तालाब हैं जो जल जमा करते हैं। सूखे की अवधि के दौरान इन बावड़ियों द्वारा अलवरण जल की उपलब्धता को सुनिश्चित किया जाता था। इस पुस्तक में समस्त भारत में बनाये गए सौ से अधिक अद्वितीय और दिलचस्प पुरातत्व धरोहरों – खज़ाने के हीरों (बावड़ियों) का विवरण व उनके स्थानों के सटीक जीपीएस निर्देशांक के साथ उल्लेख किया गया है।

 

मुख्य रूप से बावड़ी, भारत के पश्चिमी एवं दक्षिण-पश्चिमी राज्यों क्रमश: राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश सहित हरियाणा और दिल्ली में स्थित है जहाँ शुष्क उष्ण जलवायु की स्थिति है। कई जल संरक्षण संरचनाएं सूक्ष्मता से विकसित की गई जो उस क्षेत्र के लिए विशिष्ट थीं एवं कलात्मक रूप से उस क्षेत्र के मौजूदा शासकों से जुड़ी हुई थीं और समय के साथसाथ बावड़ियों के साथ विभिन्न संस्कृतियों का विकास भी हुआ  था। इन पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों में से कुछ अभी भी उपयोग में हैं, हालांकि आज कम लोकप्रिय हैं। समय के साथ बावड़ी उपेक्षित व  नष्ट हो रहे है और यह समृद्ध सांस्कृतिक विरासत विलुप्त होने के कगार पर भी हैं। लगभग हर साल वर्षा के प्रतिमान में परिवर्तन होने के कारण देश में जल संचयन की पारंपरिक प्रणाली को पुनर्जीवित करने के लिए प्राचीन उपाय “बावड़ी पर्यावरण के लिए, ” प्रभावी और अनुकूल भी है ।   पुरातत्व धरोहरों – खज़ाने के हीरों (बावड़ियों)  का सम्मान एवं   पुनर्स्थापित करना हम सब की जिम्मेदारी है ।

 

रितुमाला गुप्ता , वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

 

Ref: http://jalshakti-dowr.gov.in/sites/default/files/eBook/eBook-Stepwell/mobile/index.html

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निम्मो बाजगो पावर स्टेशन में मत्स्य प्रबंधन योजना का सफल कार्यान्वयन

चित्र आभार : लेखक

 

परिचय:

जलविद्युत परियोजनाओं ने क्षेत्र के सतत विकास में हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जलविद्युत विकास, सामाजिक व आर्थिक बेहतरी और पर्यावरण संरक्षण के साथ आता है। पर्यावरण के विभिन्न पहलुओं पर जलविद्युत के निर्माण के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है जिसमें जलीय पारिस्थितिकी भी शामिल है। यह उल्लेख करना आवश्यक है की जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के घटक जैसे मत्स्य और उसका वैज्ञानिक प्रबंधन  जलविद्युत परियोजनाओं  के पर्यावरण प्रबंधन का अभिन्न अंग है। एनएचपीसी ने पर्यावरण के प्रति हमेशा एक  जागरूक संगठन के रूप में पर्यावरण प्रबंधन योजनाओं को लगातार प्रतिबद्ध तरीके से कार्यान्वित किया है , जिसे विभिन्न मंचों पर समय-समय पर सराहा गया है। यह लेख निम्मो बाजगो पावर स्टेशन में कार्यान्वित मत्स्य प्रबंधन योजना एवं इससे प्राप्त सामाजिक लाभ पर प्रकाश डालता है।

 

क्षेत्र का विवरण:

लद्दाख का क्षेत्र एक विरोधाभास है – लद्दाख से होकर बहने वाली शक्तिशाली सिंधु नदी के बावजूद, यहां ठंडे रेगिस्तान जैसी स्थिति बनी रहती है। ज़ांस्कर और लद्दाख पर्वत शृंखला बारिश के बादलों को लद्दाख प्रवेश करने से रोकते हैं फलस्वरूप सालाना वर्षा औसतन मात्र 9 से 10 से.मी. है। सिंधु नदी मानसरोवर झील (ऊँचाई 5180 मीटर) के पास पश्चिमी तिब्बत में कैलास पर्वत श्रृंखला से निकलती है और 404 किलोमीटर की लंबाई के बाद ग्राम दमचोक के पास जम्मू और कश्मीर में प्रवेश करती है। सिंधु नदी की सहायक नदियाँ ज्यादातर स्थायी हिमखंडों, ग्लेशियरों और हिम क्षेत्रों से निकलती हैं। सिंधु नदी लद्दाख से होकर बहती है और पाकिस्तान के मैदानों में प्रवेश करती है।

 

निम्मों बाजगो पावर स्टेशन:

लद्दाख में लेह जिले के अलची गाँव के पास सिंधु नदी पर एनएचपीसी द्वारा निर्मित 45 मेगावाट का निम्मों बाजगो पावर स्टेशन, दुनिया में सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित पनबिजली परियोजना  में से एक है। यह परियोजना MSL से 10,000 फीट पर स्थित है जहाँ तापमान -30 डिग्री सेल्सियस से +40 डिग्री सेल्सियस तक बदलता है। यह परियोजना एक रन-ऑफ-रिवर  योजना है जिसके अंतर्गत नदी पर 59.0m उच्च कंक्रीट गुरुत्वाकर्षण बांध का निर्माण किया गया है। बांध के निर्माण से लगभग 19.5 किमी लंबे जलाशय का निर्माण हुआ है, जिसका क्षेत्रफल 342 हेक्टेयर है। कार्यकारी परियोजना का पूर्ण जलाशय स्तर (FRL) 3093 है। अक्तूबर, 2013 में परियोजना को सफलतापूर्वक कमिशन कर दिया गया है। तब से आज तक परियोजना लेह-लद्दाख में बिजली आपूर्ति में लगातार महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

 

बांध निर्माण से मछलियों पर प्रभाव के अध्ययन की आवश्यकता क्यूँ है ?

नदियों ने मानव उपनिवेश और उपयोग के लिए सेतु के रूप में कार्य किया है, और परिणामस्वरूप लोगों ने कई नदियों के पारिस्थितिक तंत्रों को प्रभावित किया है। बांधों के निर्माण के कारण नदियों के व्यापक फैलाव से आम तौर पर प्रवाह पैटर्न और डाउनस्ट्रीम तापमान व्यवस्थाओं में परिवर्तन होने की संभावना रहती है। परिणामस्वरूप, नदी सतह की भौतिक संरचना बदल सकती है, और जैविक समुदाय अपने खाद्य आपूर्ति और भौतिक रासायनिक वातावरण में परिवर्तन के कारण प्रभावित हो सकते हैं। इसमें सबसे अधिक प्रभावित मछलियों की वो प्रजातियाँ होती है जो प्रजनन हेतु नदी में प्रवासन (migration) करती हैं व बांध बन जाने के कारण ऊर्ध्वप्रवाह व अनुप्रवाह में प्रवास नहीं कर पाती, जिससे उनकी प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है व उनकी संख्या में गिरावट आ जाती है। नतीजन, जलीय पारिस्थितिकी तंत्र भी प्रभावित होने के लिए बाध्य है, अतः यह अति महत्वपूर्ण है कि बांध के निर्माण से पहले प्रस्तावित परियोजना क्षेत्र के आसपास के क्षेत्रों में नदी और उसकी सहायक नदियों की लिमोनोलॉजिकल (limnological) विशेषताओं का अध्ययन किया जाए ताकि जलीय जीवों पर बांध के संभावित प्रभावों को समझा जा सके और नदी में मछलियों व वनस्पतियों पर प्रभावों को कम करने के लिए प्रबंधन योजनाओं को प्रस्तावित किया जाए।

 

सिंधु नदी की जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर परियोजना निर्माण से संभावित प्रभावों का मूल्यांकन:

इस संबंध में, Centre of Research for Development, (CoRD), कश्मीर विश्वविद्यालय द्वारा अक्तूबर, 2004 में परियोजना हेतु पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) व पर्यावरण प्रबंधन योजना (EMP) तैयार किया गया है। ईआईए अध्ययन में सिंधु नदी के प्रासंगिक भाग की जलीय पारिस्थितिकी का विस्तृत अध्ययन किया गया है।

 

  • जलीय वनस्पति: ईआईए अध्धयन के दौरान मछलियों की प्रजातियों के साथ साथ विभिन्न साइटों से कुल 29 फाइटोप्लांकटन प्रजातियों को दर्ज किया गया था। इनमें 14 बेसिलिरिओफाईसी, 10 क्लोरोफाईसी और 5 सियानोफाईसी के थे। सिंधु और उसकी सहायक नदियों में फाइटोप्लांकटन की तुलना में फाइटोबेन्थोस प्रजातियों को काफी अधिक संख्या में पाया गया। प्लवक और बनथिक दोनों समुदायों में प्लवकवादी समूह जैसे यूग्लीनोफाईसी (Euglenophyceae), क्राइसोफाईसी (Chrysophyceae) और ज़ैंथोफाईसी ( Xanthophyceae ) पूरी तरह से अनुपस्थित पाये गए थे।

 

  • जलीय जीव: माइक्रो – अकशेरूकीय (Macro-invertebrates) , सूक्ष्म – उपभोक्ताओं और मछलियों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का गठन करते हैं और एक जलीय प्रणाली में डेट्राइटस आधारित मत्स्य की सफलता का निर्धारण भी करते हैं। फाइलम आर्थोपोडा को दो वर्गों – इंसेक्टा और एम्फीपोड़ा द्वारा दर्शाया गया है। इन कीट द्वारा पूरे वर्ष भर सभी नमूना स्थलों पर मैक्रो-इनवर्टेब्रेट समुदाय के प्रमुख भाग का गठन किया गया । हेमिप्टेरा ( Hemiptera ) और डिप्टेरा ( Diptera ) द्वारा कीटों के प्रमुख भाग का गठन किया गया। यह जलीय वनस्पति व जलीय जीव ही पानी में मछलियों का प्राकृतिक भोजन होते हैं इसलिए इनका अध्ययन भी आवश्यक है क्यूंकी इनकी संख्या में गिरावट प्राकृतिक पर्यावरण में मछलियों की उत्तरजीविता को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।

 

  • सिंधु नदी में मत्स्य विविधता: ईआईए सर्वेक्षण के दौरान सिंधु और इसकी सहायक नदियों से एकत्र की गई आठ मछली प्रजातियां पायी गयी थीं: साइजोथोरैक्स प्लाजियोस्टोमस (Schizothorax plagiostomus), साइजोथोरैक्स लैबियाटस (Schizothorax labiatus), साइजोथोरैक्स प्रोगैस्टस (Schizothorax progastus), टायकोंबारबस कोनिरोस्ट्रिस ( Ptychobarbus conirostris ), डिप्टीचस मैक्युलेट्स (Diptychus maculates) (साइप्रिनिडे/Cyprinidae), ट्रिपलोफिसा स्टॉलिकजैक (Triplophysa stoliczkae) (बैलीटोरिडा/Balitoridae) और ग्लाइप्टोस्टेरनन रेटिकुलटम (Glyptosternum reticulatum) (सेसोरिडा/Sisoridae) । सिंधु और उसकी सहायक नदियों से अब तक रिपोर्ट की गई मछलियों की कुल संख्या 15 है। परियोजना क्षेत्र के संग्रह स्थलों से एकत्रित मछलियाँ सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के विभिन्न हिस्सों में व्यापक रूप से वितरित है। साइजोथोरैक्स और टायकोंबारबस लद्दाख की नदी की सच्ची प्रजातियाँ हैं, जो टरबिड  (turbid) जल में निवास करती हैं, जबकि डिप्टीचस स्वच्छ बड़ी धाराओं में निवास करती है।

 

 

जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभावों का प्रबंधन/शमन :

EMP में बांध के सभी संभावित प्रभावों को नियंत्रित करने या शमन के उद्धेश्य से अध्यायवार प्रबंधन व्यवस्थाओं का विस्तृत उल्लेख किया गया है।एक नदी के मत्स्य विविधता पर प्रभाव को कम करने के लिए आमतौर पर कई उपाय किए जाते हैं। उदाहरण के लिए,  मछली के ऊर्ध्वप्रवाह व अनुप्रवाह प्रवास के लिए बांध में विभिन्न प्रकार के फिशवेज (मछली के लिए रास्ता) प्रदान किए जा सकते हैं। हालांकि, वर्तमान बांध की ऊंचाई को ध्यान में रखते हुए ‘मछली की सीढ़ी’ (फिश लैडर) प्रभावित मछली को कोई राहत प्रदान नहीं कर सकता। अतः एक अन्य उपाय जो मछली को बांध के ऊपर और नीचे जाने में मदद कर सकता है, वह है “मछली बायपास” का प्रावधान। हालांकि, सिंधु की स्थानीय स्थलाकृति मछली बाईपास के प्रावधान को लगभग असंभव और अव्यवहार्य बनाती है।एक तीसरा विकल्प बांध संरचना में एक मछली लिफ्ट का समावेश है। परंतु साइप्रिनिड मछली के मामले में अपने कार्य के लिए जैविक अनिश्चितता इत्यादि  इस विकल्प को भी अव्यवहार्य बनाती है। अतः प्रस्तावित किया गया कि मछली के प्रसार की तकनीक को अपनाकर निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त किया जाना चाहिए। नदी में मछलियों के बाधित प्रवासन की संभावनाओं की भरपाई के लिए जैविक और आर्थिक रूप से सबसे अच्छा विकल्प कृत्रिम हैचिंग और नदी और जलाशय की निरंतर बहाली का विकल्प प्रतीत होता है। इसलिए, परियोजना क्षेत्र में मछली हैचरी बनाने की सिफारिश को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा मंजूर की  गयी ।

 

 

परियोजना में मत्स्य प्रबंधन योजना का कार्यान्वयन:  

परियोजना में सभी प्रस्तावित पर्यावरण प्रबंधन योजनाओं का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित किया गया है व इस प्रयास में समय-समय पर परियोजना की समीक्षा की जाती है। राज्य मत्स्य विभाग द्वारा निर्मित व एनएचपीसी वित्त पोषित ट्राउट फिश हैचरी का निर्माण किया गया है। यह हैचरी कश्मीर विश्वविद्यालय व राज्य मत्स्य विभाग के मत्स्य विशेषज्ञों के परामर्श से मत्स्य प्रबंधन योजना के अंतर्गत विकसित की गयी है ताकि बांध द्वारा अवरोध के कारण होने वाली मछलियों के नुकसान की भरपाई की जा सके। निम्मों बाजगो पावर स्टेशन के पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) के तहत, मत्स्य विकास योजना हेतु कुल रु.142.44 लाख राज्य मत्स्य विभाग को प्रदान किए गए थे।

 

  • हैचरी के बारे में :

ट्राउट फिश हैचरी का उद्घाटन दिनांक 04.10.2016 को किया गया। इसके बाद लेह के गांव चुकोट शम्मा हैचरी को लगभग 4 कनाल 8 माल्रा (लगभग 0.22 हेक्टेयर क्षेत्र में चेन लिंक फेंसिंग द्वारा संरक्षित) के क्षेत्र में ‘लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद’, मत्स्य विभाग, लेह (लद्दाख) द्वारा विकसित किया गया है। प्रस्तावित योजना के अनुसार हैचरी में 3 जोड़े अमेरिकी प्रकार के रेसवे शामिल हैं। पानी की आपूर्ति हेतु  डिसिल्टिंग चैंबर के साथ वॉटर इनलेट चैनल बनाए गए हैं। पानी को पास के स्ट्रीम से चैनलाइज़ किया गया है। दो मंजिला हैचरी बिल्डिंग का निर्माण किया गया है जिसमे प्रथम फ्लोर पर फीड स्टोर रूम के साथ सर्विस कक्ष बनाया गया है व भू -तल पर हैचरी कॉम्प्लेक्स बनाया गया है। मछलियों का दाना श्रीनगर में सरकारी फीड मिल से खरीदा जाता है और फिर हैचरी के फीड स्टोर पर संग्रहीत किया जाता है। क्षेत्र के ठंडे और कठोर मौसम को ध्यान में रखते हुए रेनबो ट्राउट (sp. Salmo trutta fario) प्रजाति की मछलियाँ जो कि एक शीत अनुकुल प्रजाति है, उनका हैचरी में सफलता पूर्वक प्रजनन किया जा रहा है।

 

  • सामाजिक लाभ :

निम्मों बाजगो पावर स्टेशन के अंतर्गत निर्मित यह ट्राउट हैचरी आस-पास के क्षेत्र के विकास में अपना योगदान दे रही है व सिंधु नदी की प्राक्रतिक जैव संरचना को बनाए रखने के कार्य में एक स्तंभ की तरह लगातार कार्य कर रही है। यहाँ उत्पादित बीजों को आस-पास के क्षेत्र में निजी मछली फार्मों को बेच दिया जाता है जिससे स्थानीय मछ्ली पालन को बढ़ावा मिलता है व लोगों की आय बढ़ रही है। साथ ही क्षेत्र में गुणवत्ता वाले ट्राउट के बीज आम लोगों को उपलब्ध हो जाते है, जो की पूर्व में उन्हे श्रीनगर से निर्यात करने पड़ते थे। साथ ही परियोजना बांध के डाउन स्ट्रीम व अप स्ट्रीम में भी इन मछलियों की ranching/ stocking की जाती है ताकि उनका घनत्व नदी में स्थिर किये जाने के साथ प्राकृतिक प्रजनन स्तर में आयी गिरावट को संतुलित किया जा सके।

 

निष्कर्ष:

व्यापक अर्थ में देखा जाए तो निम्मों बाजगो परियोजना से पूर्व इस क्षेत्र में बिजली की उपलब्धता न्यूनतम थी,  दैनिक जरूरतों के लिए भी डीजल जनरेटर का उपयोग किया जाता था, जिसके कारण बिजली उत्पादन की उच्च लागत आती थी व क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर भी बढ़ रहा था। निम्मो बाजगो परियोजना ने इसके आसपास के क्षेत्र में स्थित 90 से अधिक गांवों के जीवन स्तर को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बेहतर बनाया है। पूरे वर्ष विश्वसनीय एवं प्रदूषण रहित विद्युत आपूर्ति के फलस्वरूप क्षेत्र में बागवानी, मुर्गीपालन, पशुपालन,डेयरी फार्मिंग व अन्य लघु / कुटीर उद्योगों को अच्छी सहायता मिल रही है। पर्यटन और होटल उद्योग विकसित हुए हैं एवं मछ्ली पालन को बढ़ावा मिलने से लोगों की आय आशा के अनुरूप बढ़ रही है।यह उल्लेखनीय है कि जलविद्युत का वैज्ञानिक और व्यवस्थित विकास हमेशा समाज के लिए एक वरदान साबित हुआ है । 

 

 

 आशीष कुमार दाश , उप महाप्रबंधक (पर्यावरण)

 

अनुराधा बाजपेयी, वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

 

पूजा कन्याल, सहायक प्रबंधक (मत्स्य)

 

 

संदर्भ : यह लेख, पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकनों के निष्कर्षों ,प्रबंधन योजनाओं की कार्यान्वयन, निगरानी और देश में जलविद्युत के बड़े पैमाने पर विकास के अनुभव पर आधारित है।
** चित्र आभार : लेखक
 **(राजभाषा ज्योति, अंक – 38 में पूर्व प्रकाशित)                                           

 

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Interesting Facts about Mexican Coriander / Culantro

Photo source:  Author

 

Introduction :

Mexican Coriander or Culantro (Eryngium foetidum) belongs to family Apiaceae and used as a spice as well as medicinal plant. It is a tropical perennial & annual herb and a native of Mexico and South America. It is also called long coriander, because it is used as a substitute of Coriander. Culantro is a tap-rooted biennial herb with long evenly branched roots. The oblanceolate leaves arranged spirally around the short thick stem from a basal rosette and are as much as 30 cm long and 4 cm broad. The leaf margin is serrated and each tooth of the margin contains a small yellow spine. The plant produces a well-branched cluster of flower heads in spikes forming the characteristic umbel inflorescence on a long stalk arising from the center of the leaf rosette. The calyx is green while the corolla is creamy white in color. The appearance of culantro and cilantro (i.e. coriander) are different but the leaf aromas are similar, although culantro is more pungent. Because of this aroma similarity the leaves are used interchangeably in many food preparations and are the major reason for the misnaming of one herb for the other.

 

Indian Context:

In India it is found mainly in the north-eastern states of Sikkim (bhotay dhonia), Assam (man dhonia), Manipur (awa phadigom or sha maroi), Mizoram (asbahkhawr), Tripura (bilati dhonia), Nagaland (Burma dhania). It is also used in the Andaman & Nicobar Islands and in few parts of Tamil Nadu, Kerala and Karnataka.  As per the study carried out by Tshering Tashi Lepcha, Sujata Upadhyay, S Manivannan, Karma Diki Bhutia, Laxuman Sharma and Venkata Ramana Muddarsu (2018), the comparison of various nutrient contents present in culantro and coriander is as under:

 

S.N. Parameters Culantro Coriander
1 Moisture (%) 83.33 87.9
2 Crude protein (%) 2.63 3.3
3 Reducing sugar (%) 8.26 6.5
4 Ascorbic acid (mg/100 g) 32.33 135
5 Fat (%) 0.73 4.78
6 Fibre (%) 31.50 10.40
7 Ash (%) 3.0 1.7

 

 

Uses :

The local people of Sikkim use culantro as a condiment and use it as spice, chutney as well as for medicinal purposes. As a spice they use it as a seasoning of meats, vegetables, chutneys and soup. The common part of the plant consumed is leaves.

 

Ajay Kumar Jha, Senior Manager (Environment)

Teesta VI HE Project

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एनएचपीसी ने आयोजित किया वन महोत्सव 2021

जुलाई के पहले सप्ताह (1 से 7 जुलाई) में वनों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए वन महोत्सव मनाया जाता है। यह एक वार्षिक वृक्षारोपण उत्सव है, जिसमें पूरे देश में वृक्षारोपण अभियान चलाया जाता है। एनएचपीसी ने हरियाणा वन विभाग, फरीदाबाद के सहयोग से 9 अगस्त 2021 को वनमहोत्सव 2021′ कार्यक्रम का आयोजन पर्यावरण संवर्धन और हरीतिमा के विस्तार करने के उद्देश्य से किया। इस अवसर पर दिल्ली मथुरा राष्ट्रीय राजमार्ग पर एनएचपीसी चौक के निकट वृहद पौधारोपण का कार्यक्रम आयोजित किया गया। पौधारोपण कार्यक्रम का आरम्भ माननीय श्री ए.के. सिंह, सीएमडी, एनएचपीसी तथा श्री राज कुमार, आईएफएस, उप वनसंरक्षक, फरीदाबाद द्वारा पौधा लगा कर किया गया। कार्यक्रम में एनएचपीसी के निदेशकगण श्री एन.के.जैन, निदेशक (कार्मिक), श्री वाई.के. चौबे, निदेशक (तकनीकी) और श्री ए.पी.गोयल, निदेशक (वित्त) द्वारा पौधे लगाए गए। तत्पश्चात एनएचपीसी के अधिकारियों द्वारा पौधे लगा कर राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारों को हरा भरा किया गया। वन महोत्सव 2021 के तहत हरियाणा वन विभाग, फरीदाबाद द्वारा प्रदान किए गए विभिन्न प्रजातियों के सात सौ पौधे लगाये गये जिनमें पीपल (Ficus religiosa ), कदम्ब (Neolamarckia cadamba ) , नीम  (Azadirachta indica), करंज (Millettia pinnata ) आदि भूमि को शीघ्र हरा भरा कर देने वाले और छायादार पौधे लगाए गए हैं। आयोजन स्थल पर पौधों को लगाये जाने के पश्चात ट्री-गार्ड लगा कर उनको सुरक्षा प्रदान की गयी।

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निगम मुख्यालय में वन महोत्सव – 2021 के उपलक्ष में पौधा वितरण

वन महोत्सव – 2021 का आयोजन दिनांक 9/08/2021 को एनएचपीसी एवं वन विभाग, फरीदबाद द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया। इसी क्रम में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता को प्रसारित करने एवं पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता निभाने के उद्देश्य से दिनांक 10/08/2021 को एनएचपीसी कार्यालय परिसर में अधिकारियों एवं कर्मचारियों के मध्य पौधों का वितरण किया गया। विभिन्न प्रजातियों के आठ सौ फलदार तथा औषधीय पौधों का वितरण किया गया, जिसमे सहजन, जामुन, गिलोय, तुलसी, अशोक, सदाबहार, अमरूद, नीम जैसे पौधों को वितरित किया गया। निगम में कार्यरत कार्मिकों ने बढ़-चढ़ कर इस अभियान में रुचि दिखाई और वितरित किये जा रहे पौधों को प्राप्त किया।

 

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पार्बती जल विद्युत परियोजना चरण–II द्वारा वन महोत्सव 2021 के दौरान पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन

पार्बती जल विद्युत परियोजना चरण–II (800 MW), नगवाईं के कार्मिकों ने मिलकर काफी उत्साह व सक्रिय भूमिका निभाते हुये विभिन्न परियोजना स्थलों पर वन महोत्सव- 2021 कार्यक्रम के दौरान पौधारोपण किया । वन महोत्सव मनाने का मुख्य उद्देश्य आम लोगों / नागरिक को अधिक से अधिक पौधारोपण करने के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित करना है। वन महोत्सव के कार्यक्रम के दौरान हिमाचल प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, क्षेत्रीय कार्यालय, कुल्लू के अधिकारियों ने भी भाग लिया। वन महोत्सव, 2021 का कार्यक्रम कार्यालय परिसर नगवाई, आवासीय परिसर सैंज , बांध आवासीय परिसर, बरशैनी तथा टीबीएम साइट शीलागढ़ में आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम के दौरान सौ से अधिक संख्या मे स्थानीय पौधे जिनमें देवदार, सेब, अखरोट, आड़ू, अमलोक, खुबानी तथा बहूनिया आदि प्रजाति सम्मिलित हैं का पौधारोपण  किया गया।

 

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पर्यावरण शब्दकोष (10)

Image source : https://www.istockphoto.com/photos/hydrosphere

 

 

क्र. शब्द अर्थ
1 जलमंडल

(Hydrosphere)

 

किसी ग्रह पर पानी की कुल मात्रा जलमंडल कहलाती है। इसमें सारा पानी शामिल है जो ग्रह की सतह पर, भूमिगत और हवा में मौजूद होता है। किसी ग्रह का जलमंडल तरल, वाष्प या बर्फ हो सकता है। पृथ्वी में तरल जल सतह पर महासागरों, झीलों और नदियों के रूप में मौजूद है। यह जमीन के नीचे भूजल के रूप में कुओं और जलभृतों में पाया जाता है। जलवाष्प सबसे अधिक बादलों और कोहरे के रूप में दिखाई देता है।पृथ्वी के जलमंडल का जमा हुआ भाग बर्फ से बना है जो हिमनद, बर्फ की चोटी और हिमखंड के रूप में मौजूद है। जलमंडल का जमा हुआ हिस्सा हिमावरण/हिममंडल (Cryosphere) कहलाता है।

 

 

2 जलवायु

(Climate)   

 

किसी विशेष स्थान पर लंबे समय तक वातावरण की स्थिति जलवायु कहलाती है। यह वायुमंडलीय तत्वों (और उसकी विविधताओं) का दीर्घकालिक योग है, जो कम समय में मौसम का निर्माण करता है। ये तत्व सौर विकिरण, तापमान, आर्द्रता, वर्षा, वायुमंडलीय दबाव और हवा इत्यादि हैं।

 

 

3 जलवायु अन्तराल

(Climate Lag)

 

जलवायु अन्तराल को एक देरी के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसके तहत जलवायु के कुछ पहलुवों में धीमी गति से काम करने वाले कारक (ओं) के प्रभाव के कारण परिवर्तन हो सकता है। उदाहरण के तौर पर वातावरण में एक विशेष मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड गैस का निस्तारण अपना पूर्ण प्रभाव देता है। इसमें से कुछ गैस को समुद्र द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है जो बाद में वैश्विक कार्बन चक्र के हिस्से के रूप में वायुमंडल में वापस मुक्त हो जाता है।

 

 

4 जलवायु परिवर्तन

(Climate Change)

 

जलवायु परिवर्तन वैश्विक या क्षेत्रीय जलवायु प्रणाली में एक दीर्घकालिक बदलाव है। आमतौर पर जलवायु परिवर्तन विशेष रूप से 20वीं शताब्दी के मध्य से वर्तमान तक वैश्विक तापमान में वृद्धि को संदर्भित करता है। किसी क्षेत्र की औसत जलवायु परिस्थितियों जैसे तापमान व वर्षा  में एक लंबी अवधि में परिवर्तन, जलवायु परिवर्तन कहलाता है।यह किसी स्थान पर पाए जाने वाले सामान्य मौसम में होने वाला परिवर्तन है।

 

 

5 जलवायु प्रणाली

(Climate system)

 

जलवायु प्रणाली 5 प्रमुख घटकों से युक्त अत्यधिक जटिल वैश्विक प्रणाली है जिसमें  वातावरण, महासागर,  हिमावरण/हिममंडल , भूमि की सतह तथा  जीवमंडल  शामिल हैं । इन घटकों की परस्पर क्रिया न केवल दिन-प्रतिदिन के मौसम को निर्धारित करती है, बल्कि दीर्घकालिक औसत भी निर्धारित करती है जिसे जलवायु कहते हैं।

 

 

6 जलीय पारिस्थितिकी तंत्र

(Aquatic Ecosystem)

 

पानी में रहने वाले पौधों और जीवों के समुदायों को जलीय पारिस्थितिक तंत्र के रूप में जाना जाता है। यह मुख्यत:  दो समूहों में विभाजित हैं। मीठे पानी के जलीय पारितंत्र तालाबों से लेकर मुहानाओं/ज्वारनदमुखों ( estuaries ) तक लवणों की कम सांद्रता वाले जल में पाए जाते हैं। समुद्री जलीय पारिस्थितिक तंत्र समुद्रों और महासागरों के खारे पानी में पाए जाते हैं।

 

 

7 जीवमंडल

(Biosphere)

 

जीवमंडल पृथ्वी के उन हिस्सों से बना है जहां जीवन मौजूद है। यह पेड़ों की सबसे गहरी जड़ प्रणाली से लेकर समुद्र की खाइयों के अंधेरे वातावरण तक, हरे-भरे वर्षा वनों और ऊंचे पहाड़ों की चोटियों तक फैला हुआ है। जीवमंडल एक वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र है जो जीवित जीवों और अजैविक कारकों से मिलकर बना है जिससे वे ऊर्जा और पोषक तत्व प्राप्त करते हैं।

 

 

8 जीवमंडल कॉन्फ्रेंस

(Biosphere Conference)

 

 

सन 1968 में वैश्विक जीवमंडल संरक्षण पर पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, यूनेस्को के“जैवमंडल के तर्कसंगत उपयोग और संरक्षण के लिए अंतर सरकारी सम्मेलन”, पेरिस में हुआ। यह सम्मेलन अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण राजनीति की स्थापना में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसके  परिणाम स्वरुप 1970 में यूनेस्को ने  अपना “मैन एंड द बायोस्फीयर प्रोग्राम” (एमएबी) शुरू किया ताकि विश्व के केंद्रीय पारिस्थितिक तंत्र जो “बायोस्फीयर रिजर्व” के रूप में प्रतिनिधित्व करते हैं, उन क्षेत्रों की रक्षा की जा सके ।

 

 

9 जीवाणु

( Bacteria )

जीवाणु सूक्ष्म एकल-कोशिका वाले जीव हैं जो लाखों की संख्या में हर वातावरण में, सभी जीवों के अंदर और बाहर, हर जगह मौजूद हैं। कुछ  जीवाणु  हानिकारक होते हैं लेकिन अधिकांश उपयोगी एवं कई उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। इनका उपयोग औद्योगिक और औषधीय प्रक्रियाओं में किया जाता है।

 

 

10 जीवाणु विज्ञान

(Bacteriology )

यह सूक्ष्म जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसमें जीवाणु की पहचान, अध्ययन व उत्पादन आदि से  संबंधित  अनुप्रयोगों द्वारा  दवा, कृषि, उद्योग एवं जैव प्रौद्योगिकी इत्यादि के विकास में जीवाणुओं का उपयोग किया जाता है ।

 

 

 

पूजा सुन्डी , उपप्रबंधक (पर्यावरण)
पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग 
निगम मुख्यालय

Source : Internet/Google *

  • https://www.nationalgeographic.org/encyclopedia/hydrosphere/
  • https://www.britannica.com/science/climate-meteorology
  • https://www.encyclopedia.com/environment/energy-government-and-defense-magazines/climate-lag
  • https://www.nationalgeographic.org/encyclopedia/climate-change/
  • https://energyeducation.ca/encyclopedia/Climate_system
  • https://www.encyclopedia.com/environment/energy-government-and-defense-magazines/aquatic-ecosystems
  • https://www.nationalgeographic.org/encyclopedia/biosphere/
  • https://www.environmentandsociety.org/tools/keywords/first-international-conference-biosphere-protection
  • https://www.medicalnewstoday.com/articles/157973
  • https://www.dictionary.com/browse/bacteriology

*अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवादित

 

पर्यावरण शब्दकोष (09)

 

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