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पर्यावरण वार्ता (अंक 14 )

 

ब्लॉग के पिछले विविध सम्पादकीयों में हमने अनेक पर्यावरण विषयों पर बात की है, इस अंक में जल संसाधन पर विचार करते हैं। एनएचपीसी की कार्यशैली के दृष्टिगत आज बात नदियों की कर लेते हैं। लगभग 329 मिलियन हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्रफल में फैले भारत देश को सम्पूर्णता से जानने के लिये इसकी नदियों और पर्वतों की समझ आवश्यक है। संस्कृति, धर्म एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास से जुड़ी ये नदियाँ भारतीय जीवन का हृदय एवं आत्मा हैं। यह सौभाग्य है कि हमारे भू-भाग से बहने वाली कतिपय नदियों को विश्व की महानतम नदियों में गिना जाता है। भारतीय उप-महाद्वीप की प्रमुख नदियों के रूप में बारह को वर्गीकृत किया गया है, जिनका कुल आवाह क्षेत्रफल 252.8 मिलियन हेक्टेयर है। हमारी प्रमुख नदियों में गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना तंत्र का आवाह क्षेत्रफल 110 मिलियन हेक्टेयर है जो कि देश की सभी प्रमुख नदियों के आवाह क्षेत्रफल का 43 प्रतिशत से अधिक है। सिन्धु (32.1 मिलियन हेक्टेयर), गोदावरी (31.3 मिलियन हेक्टेयर), कृष्णा (25.9 मिलियन हेक्टेयर) एवं महानदी (14.2 मिलियन हेक्टेयर) देश की अन्य प्रमुख नदियाँ हैं जिनका आवाह क्षेत्रफल 10 मिलियन हेक्टेयर से अधिक है। इसी प्रकार देश की मध्यम श्रेणी की नदियों की भी महति भूमिका है जिनका कुल आवाह क्षेत्रफल 25 मिलियन हेक्टेयर है। सुवर्णरेखा नदी, जिसका आवाह क्षेत्र 19 मिलियन हेक्टेयर है, देश की मध्यम श्रेणी की नदियों में सबसे बड़ी है। नदियाँ ही हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ और समृद्धि का साधन हैं।

 

भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण नदियों के प्रवाह में ही नहीं अपितु भूजल संसाधनों के स्तर में भी कमी दर्ज की गयी है। जलवायु परिवर्तन के कारण भी नदियों की जल उपलब्धता प्रभावित हो रही है। जल के देशभर में असमान उपलब्धता तथा कतिपय क्षेत्रों में विद्यमान रहने वाले जलसंकट का एक कारण है अनियमित वर्षा। आज हमारे पास जो उपलब्ध जलश्रोत हैं वे लगातार सिमट रहे हैं तथा अब प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता लगातार घट रही है। ऐसा नहीं है कि जल संसाधनों की कमी है अपितु उनके उचित प्रबंधन का अभाव प्रतीत होता है। भारत में विश्व के धरातलीय क्षेत्र का 2.5%, जल संसाधनों का 4% तथा कुल जनसंख्या का लगभग 16% समाहित है। प्रथमदृष्टया ही जल की मांग और आपूर्ति की विषमता का इससे अंदाजा लगाया जा सकता है। वर्षा से प्रतिवर्ष देश में लगभग 4000 घन किलोमीटर जल की प्राप्ति होती है। इस जल का अधिकांश हिस्सा रन-ऑफ अथवा अन्य कारणों से उपलब्ध नहीं होता। यही कारण है कि हमें विविध जल संग्रहण योजनाओं के निर्माण पर गहराई से विचार और कार्य करना चाहिये।  क्या हमें अपने जल संसाधनों के प्रबंधन और उनके समुचित संवर्धन के लिये एक दीर्घकालिक योजना बनाने की आवश्यकता नहीं है? कथनाशय यह है कि हमें जल को जीवन ही नहीं एक संसाधन के रूप में भी देखना चाहिये।

 

पिछले दिनों विभाग में सुदूर संवेदन एवं जीआईएस प्रयोगशाला का उद्घाटन माननीय अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक महोदय द्वारा किया गया। मुझे अपेक्षा है कि इस तकनीक के माध्यम से हम पर्यावरण अध्ययन को अधिक वैज्ञानिक और व्यावहारिक बना सकेंगे। इसी तरह सचिव राजभाषा, गृह मंत्रालय द्वारा  पर्यावरण विभाग की बुकलेट  – “एनएचपीसी – हरित प्रयासों से सतत जलविद्युत विकास” का उद्घाटन किया गया। मैं ऐसे प्रयासों की सराहना करता हूँ और इसके व्यापक प्रसार की अपेक्षा रखता हूँ।

 

एन एस परमेश्वरन

कार्यपालक निदेशक (पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन) 

 

Image Source : https://researchmatters.in/news/karnataka%E2%80%99s-rivers-lifelines-south-india

 

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 |    February 23, 2021 |   1 comment

पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग की द्विभाषिक पुस्तिका “एनएचपीसी : हरित प्रयासों से सतत जलविद्युत विकास / NHPC – Green Endeavours for Sustainable Hydropower” का विमोचन

पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग द्वारा हिन्दी/द्विभाषी में तैयार की गई ‘एनएचपीसी- हरित प्रयासों से सतत जलविद्युत विकास” पुस्तिका का श्री ए.के. सिंह , सीएमडी, एनएचपीसी की उपस्थिति में विमोचन करते मुख्य अतिथि डॉ. सुमीत जैरथ, सचिव (राजभाषा), राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार।

 

पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग द्वारा द्विभाषिक पुस्तिका  “एनएचपीसी : हरित प्रयासों से सतत जलविद्युत विकास / NHPC – Green Endeavours for Sustainable Hydropower”  तैयार की गई है। सामाजिक रूप से एक जिम्मेदार संगठन के रूप में, एनएचपीसी अपनी जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के समय, निर्माण के पश्चात और संचालन के विभिन्न चरणों के दौरान पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। जब देश के दूरदराज और पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक स्रोत के रूप में उपलब्ध नदी जल  का उपयोग कर प्रदूषण मुक्त और स्वच्छ बिजली उत्पन्न करने के लिए जल विद्युत परियोजनाओं के विकास की बात आती है, तब एनएचपीसी का मंत्र “पर्यावरण पहले” सर्वप्रथम उजागर होता है। एनएचपीसी द्वारा अपनी परियोजनाओं और उसके आसपास के क्षेत्रों में प्रकृति को संरक्षित कर, भावी पीढ़ी के लिये हरा-भरा पर्यावरण सुनिश्चित करने के दृष्टिगत हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं ।

 

एनएचपीसी द्वारा परियोजनाओं के निर्माण अथवा संचालन के दौरान पर्यावरण पर पड़ने वाले किसी भी संभावित नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए साथ ही साथ संरक्षण एवं सामाजिक-आर्थिक उन्नयन के दृष्तिगत पर्यावरण प्रबंधन योजनायें निर्मित एवं कार्यान्वयित की जाती हैं जिनमें  – जैव विविधता संरक्षण, जलागम क्षेत्र उपचार, क्षतिपूरक वनीकरण योजना, ग्रीन बेल्ट विकास योजना, मलवा निस्तारण और खदान स्थलों का पुनरुद्धार, जलाशय रिम उपचार, मत्स्य प्रबंधन, स्वास्थ्य प्रबंधन, सामाजिक आर्थिक विकास, पुनर्वास और पुनर्स्थापना योजना इत्यादि प्रमुख हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा एनएचपीसी के पर्यावरण प्रबंधनों एवं पर्यावरण और वन स्वीकृति पत्रों के अनुसार निर्धारित पर्यावरण संरक्षण प्रयासों / कार्यों की समयबद्ध तथा गुणवत्तापूर्ण  पूर्ति किये जाने के लिये विभिन्न मंचों पर सराहना की गई है, ऐसी परियोजनाओं में  पार्बती-II परियोजना में जैव विविधता संरक्षण और मलवा निस्तारण उपाय; तीस्ता-V में जलागम क्षेत्र उपचार के कार्य आदि महत्वपूर्ण हैं ।

 

एनएचपीसी द्वारा पावर स्टेशनों के निर्माण पश्चात पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रभाव आकलन अध्ययन भी कराया गया है। यह आकलन अध्ययन सर्वप्रथम जम्मू-कश्मीर स्थित उरी-l (480 मेगावाट) पावर स्टेशन के लिए किया गया; तत्पश्चात सिक्किम स्थित रंगित (60 मेगावाट) पावर स्टेशन; और उत्तराखंड स्थित धौलीगंगा चरण-l (280 मेगावाट) पावर स्टेशन एवं सिक्किम स्थित तीस्ता-V (510 मेगावाट) पावर स्टेशन के लिए कराया गया है।

 

इस संदर्भ में, यह पुस्तिका शीर्षक “एनएचपीसी : हरित प्रयासों से सतत जलविद्युत विकास” न केवल निगम मुख्यालय के स्तर पर अपितु एनएचपीसी के विभिन्न पावर स्टेशनों और परियोजनाओं द्वारा पर्यावरण एवं सामाजिक आर्थिक क्षेत्रों में किए गये कार्यों को संकलित कर उसे समग्र स्वरूप में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तिका, निगम की सतत विकास के लिये प्रतिबद्धता तथा स्वच्छ विद्युत उत्पादन करते हुए, राष्ट्र की प्रगति में योगदान के प्रति प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करती है।

 

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 |    February 23, 2021 |   0 comment

पर्यावरण संरक्षण एक संवैधानिक जिम्मेदारी

Image source:https:https://transform.iema.net/article/failure-enforce-environmental-law-widespread-un-study-finds

 

ज्ञात है कि सतत विकास के तीन प्रमुख स्तंभ होते हैं:  आर्थिक विकास, सामाजिक विकास और पर्यावरण संरक्षण। इन तीनों स्तंभों में से, पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि पृथ्वी पर पर बढ़ते मानवजनित (anthropogenic) गतिविधियों के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन  के साथ मानव स्वास्थ्य तथा  अन्य जैव विविधता पर प्रदूषण का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । हाल ही में कोविड-19 के कारण हुए लॉकडाउन के दौरान किए गए शोध में पाया गया कि न्यूनतम मानवजनित गतिविधि होने से पर्यावरण की गुणवत्ता में  स्वतः सुधार होता है । इसे संज्ञान में लेते हुए  हमें ‘सतत विकास’ के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए एक व्यवस्थित पर्यावरण संरक्षण प्रणाली को अपनाने की ज़िम्मेदारी को समझना होगा । इस संदर्भ में अपने देश का बहुचर्चित संविधान में  समाविष्ट पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न प्रावधानों को इस ब्लॉग के माध्यम से उजागर करने तथा नागरिक को सजग करने का प्रयास किया गया है ।

 

किसी भी देश का संविधान सर्वोच्च कानून होता है जिसका अनुपालन करना  प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी होती  है। भारतीय संविधान के  भाग IV ‘राज्य नीति निदेशक तत्व’ और भाग IV-ए में ‘मौलिक कर्तव्यों’ का जिक्र किया गया है जिसके तहत, पर्यावरण का संरक्षण एवं  संवर्धन हेतु राज्य सरकार की भूमिका व नागरिक के कर्तव्यों को समझाया गया है।  चूँकि भारत क्षेत्रीय या वैश्विक पर्यावरणीय मुद्दों से संबंधित कई अंतर्राष्ट्रीय संधियों और समझौतों का एक हस्ताक्षरकर्ता है, अतः भारतीय संविधान में इन संधियों और समझौतों की निर्णयों को अनुपालन करने का भी प्रावधान किया गया है  जो निम्न अनुच्छेदों में वर्णित है :

 

  • अनुच्छेद 48 (राज्य नीति निदेशक तत्व): राज्य , देश के पर्यावरण का संरक्षण,  संवर्धन और वन तथा वन्य  जीवों की रक्षा  करने का प्रयास करेगा ।

 

  • अनुच्छेद 51 (राज्य नीति निदेशक तत्व): राज्य, संगठित लोगों के एक दूसरे से व्यवहारों में अंतराष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का प्रयास करेगा ।

 

  • अनुच्छेद 51ग  (छ)(मूल कर्तव्य) : भारत के प्रत्येक नागरिक का यह  कर्तव्य होगा कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत  वन, झील, नदी व वन्य जीव हैं ,रक्षा करे और उसका संवर्धन करें तथा प्राणी मात्र के प्रति दया भाव रखे ।

 

  • अनुच्छेद 253 भाग XI (संघ और राज्यों के बीच संबंध): संसद को किसी अन्य देश या देशों के साथ की गई किसी संधि, करार या अभिसमय अथवा किसी  अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, संगम या अन्य निकाय में किए गए किसी विनिश्चय के कार्यान्वयन के लिए भारत के सम्पूर्ण राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कोई विधि बनाने की शक्ति है ।

 

संविधान के उपरोक्त अनुच्छेद 253 में दर्शाये गए मुद्दे के अनुपालन हेतु भारत सरकार द्वारा पर्यावरण संबन्धित विभिन्न राष्ट्रीय अधिनियमों जैसे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 ; वायु एवं जल ( प्रदूषण निवारण व नियंत्रण ) अधिनियमों  को जारी किया गया है  जिसका अनुपालन  विशेषकर विकासात्मक कार्यों के दौरान किया जाना करना अनिवार्य है जिससे कि भारत ‘सतत विकास’ के उद्देश्य को सफलतापूर्वक पूरा कर सके।

 

इसके अलावा, विगत कुछ वर्षों में न्यायिक सक्रियता द्वारा भारतीय संविधान में “ स्वच्छ पर्यावरण एक  मौलिक अधिकार ” जैसी विशिष्ट प्रावधान मौजूद नहीं होने की मान्यता को खारिज  करते हुए  व्याख्या की गई है कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन का अधिकार’ एक मौलिक अधिकार का अर्थ है, स्वच्छ वातावरण में जीवन जीना, बीमारी और संक्रमण के खतरे से मुक्त रहना। इस प्रकार,  माननीय सर्वोच्च न्यायालय व राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एन जी टी) द्वारा समय-समय पर पर्यावरण संरक्षण मुद्दों पर अहम निर्णय दिया है जिसका अनुपालन अनिवार्य है।

 

मनोज कुमार सिंह

वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण)

 

 

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   0 comment

जलवायु और हमारा पर्यावरण

Image Source : https://www.khayalrakhe.com/2018/01/jalvayu-parivartan-climate-change-hindi.html

 

हमारे आस-पास जो कुछ भी है, जैविक अथवा अजैविक सब पर्यावरण की परिभाषा के अंतर्गत समाविष्ट हो जाता है। बहुधा पेड़-पौधे और जीव-जंतु तक हमारा पर्यावरण विमर्श केंद्रित रह जाता है जबकि मिट्टी की घटती हुई उर्वरता से ले कर जहरीले होते आसमान तक चर्चा आवश्यक है। विषय को इसी क्रम में देखते हैं तथा जलवायु को प्रभावित करने वाले कारकों पर एक विहंगम दृष्टि डालने का प्रयास करते हैं।

 

आरम्भ मृदा से….। मृदा पृथ्वी का वह उपरी हिस्सा है जो शैलों के जलवायु, जीवजंतु, स्थलाकृति तथा समय जैसे कारकों द्वारा टूट-फूट अथवा अपक्षय से निर्मित है। मृदा में आवश्यक रूप से अनेक प्रकार के जीवांश पाये जाते हैं एवं यही पेड़-पौधे की समुचित वृद्धि में सहायक भूमिका अदा करते हैं। मृदा का निर्माण आग्नेय, अवसादी तथा कायांतरित शैलों (rocks) से होता है। इन शैलों की रासायनिक संरचना भिन्न होने से इनसे बनी भूमियों व मृदा की प्रवृत्तियाँ, बनावट व संगठन भी भिन्न-भिन्न होता है। मृदा निर्माण की प्रक्रिया के लिये शैलों का अपक्षय (weathering) विभिन्न भौतिक तथा रासायनिक कारणों से होता है। भौतिक अपक्षय के मुख्य सहायक है जल, वायु, पेड़-पौधों एवं जीव-जंतु। रासायनिक अपक्षय के कारक हैं – विलयन, जलीकरण, जल-अपघटन, कार्बोनीकरण, ऑक्सीकरण तथा अपचयन। उपलब्ध भूमि और मिट्टी कैसी है उसकी उपादेयता (utility) भी समझी जानी आवश्यक है। कुछ आँकडे इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं। हमारे देश के भौगोलिक क्षेत्रफल (32.90 करोड हेक्टेयर) में से लगभग 14.20 करोड हैक्टेयर में खेती होती है। जनसंख्या को आधार माने तो वर्तमान में प्रति व्यक्ति भूमि का क्षेत्रफल लगभग 0.12 हेक्टेयर ही है। अच्छी उत्पादकता वाली एक हेक्टेयर भूमि से पच्चीस व्यक्तियों का भरण-पोषण किया जा सकता है जबकि हमारे देश में 3.25 हेक्टेयर भूमि से 25 व्यक्तियों का जीवनयापन संभव हो पाता है। सत्यता यह भी है कि हमारे देश में लगभग 2.5 सेंटीमीटर उपरी स्तर की मिट्टी बनने में पाँच सौ से पंद्रह सौ वर्ष लग जाते हैं। भारत की उपलब्ध भूमि को मृदाओं को चार प्रमुख समूहों अर्थात जलोढ़, काली, लाल तथा लेटराइट में बांटकर उनके गुण-निर्धारित करने का प्रयास किया गया है। मिट्टी तो महत्ता रखती ही है चूंकि हर तरह की खेती का प्रारंभिक आधार वही है तथापि तह में जा कर देखा जाये तो किसी स्थल की जलवायु कुछ बातों पर निर्भर करती है जैसे – वह स्थान समुद्र से कितनी दूर है और उसके आसपास पहाड़ हैं, जंगल या रेगिस्तान।

 

वैश्विक परिदृश्य में जलवायु की विविधता क्षेत्रवार देखी गयी है और उसी अनुसार उनको नाम भी दिये गये हैं। उत्तरी ध्रुव पर आर्कटिक महासागर के आसपास टुंड्रा या ध्रुवीय जलवायु पायी है जिसकी पहचान भयावह ठंड है। इस तरह की जलवायु वाले क्षेत्र में वर्ष भर बर्फ ही जमी रहती है चूंकि तापमान शून्य से बहुत नीचे बना रहता है, केवल गर्मियों में थोड़ी बहुत हरियाली यहाँ दिखाई पड़ती है। अगली श्रेणी में आती है पर्वतीय जलवायु जिसकी विशेषता है कि यह ध्रुवीय जलवायू से गर्म होती है फिर भी अपेक्षाकृत यहाँ पर कड़ी ठंडक बनी रहती है। सर्दियों वाले मौसम की अवधि छ: महीने तक हो सकती है। ऐसे मौसमों वाले पर्वतों पर सफेद बर्फ की चादर पड़ी देखी जा सकती है। ऐसी जलवायु में पर्वतों का श्रृंगार देवदार, चीड़  और फर के  जंगल बनते हैं । जब न तो  सर्दी अधिक होती है  न ही  गर्मी और

 

भारत में वर्षा का माहवार वितरण
मानसून का प्रकार माह/ अवधि वार्षिक वर्षा
दक्षिणी- पश्चिमी जून से सितम्बर 73.7%
परवर्ती अक्टूबर से दिसम्बर 13.3%
उत्तरी-पश्चिमी जनवरी से फरवरी 2.6%
पूर्वी मार्च से मई 10.0%

 

अधिक बरसात भी नहीं होती वह शीतोष्ण (temperate) जलवायु के रूप में वर्गीकृत है। यूरोप का पश्चिमी तट, उत्तरी अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के कुछ हिस्सों में इस तरह की जलवायु पायी जाती है। ऐसे क्षेत्रों में वर्ष भर हल्की वर्षा होती रहती है साथ ही यहाँ गर्मी, सर्दी, पतझड़ तथा वसंत के रूप में चार मौसम पाये जाते हैं। भूमध्य सागरीय जलवायु की चर्चा करें तो इससे सम्बद्ध क्षेत्रों में गर्मियाँ  सूखी होती हैं तथा सर्दियों में वर्षा होती है। अधिक वर्षा होने के कारण ऐसी जलवायु वाले क्षेत्रों में घने जंगल पाए जाते हैं। भूमध्यसागर के निकटवर्ती स्थानों के अतिरिक्त यह जलवायु दक्षिण अफ्रीका, चिली, मध्यपूर्व और आस्ट्रेलिया के तटवर्ती हिस्सों में भी पाई जाती है। इसी तरह गर्म जलवायु में मौसम सूखा रहता है। ऐसी जलवायु से सम्बद्ध क्षेत्रों में वर्षा या तो नहीं होती या बहुत कम होती है। दोपहर में दिन का तापमान बहुत अधिक होता है। अधिक सूखे स्थानों पर मरूस्थल पाया जाता है जबकि कम सूखे स्थानों पर घास के मैदान हो सकते हैं। अफ्रीका व मध्यपूर्व के अधिकतर स्थानों तथा आस्ट्रेलिया व अमेरिका के भी कुछ हिस्सों में यह मौसम पाया जाता है।

 

भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत की उपस्थिति के कारण मध्य एशिया से आने वाली शीतल हवाएँ नहीं आ पाती साथ ही दक्षिण में  हिन्द महासागर  स्थित होने और भूमध्य रेखा से समीपता के कारण यहाँ कटिबंधीय (tropical) जलवायु पायी जाती है जिसका प्रभाव है – दैनिक तापांतर की न्यूनता, अत्यधिक आर्द्रता वाली वायु तथा सम्पूर्ण देश में न्यूनाधिक (modulator) रूप में वर्षा का होना। अर्थात भारत में मुख्य रूप से मानसूनी जलवायु पायी जाती है। यहाँ की भूमि मानसूनी  पवनों के प्रभाव क्षेत्र में आती है। वैसे देखा जाए तो भारत में ध्रुवीय छोड़ कर बाकी चारों प्रकार के मौसम किसी न किसी रूप में पाये जाते हैं। भारत के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पश्चिमी घाट पर्वत का पश्चिमी तटीय भाग, हिमालय पर्वतमाला की दक्षिणावर्ती तलहटी में सम्मिलित राज्य जिनमें असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, सिक्किम, पश्चिम बंगाल का उत्तरी भाग, पश्चिमी तट के कोंकण, मालाबार तट (केरल), दक्षिणी किनारा, मणिपुर एवं मेघालय इत्यादि सम्मिलित हैं। इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा की मात्रा 200  से. से अधिक होती है। भारत के साधारण वर्षा वाले क्षेत्रों में पश्चिमी घाट के पूर्वोत्तर ढाल, पश्चिम बंगाल का दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र, उड़ीसा, बिहार, दक्षिणी-पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा तराई क्षेत्र के समानान्तर पतली पट्टी में स्थित उत्तर प्रदेश, पंजाब होते हुए जम्मू-कश्मीर के क्षेत्र शामिल हैं। यहाँ वार्षिक वर्षा की मात्रा 100 से 200 सेमी तक होती है।इन क्षेत्रों में वर्षा की विषमता 15 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक पायी जाती है।  अतिवृष्टि एवं अनावृष्टि के कारण यहाँ फसलों की बहुत हानि होती है। भारत के कम  वर्षा वाले क्षेत्रों में मध्य प्रदेश, दक्षिण का पठारी भाग,  गुजरात, उत्तरी तथा दक्षिणी आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, पूर्वी राजस्थान, दक्षिणी पंजाब, हरियाणा तथा दक्षिणी उत्तर प्रदेश आते हैं। यहाँ 50 से 100 सेमी वार्षिक वर्षा होती है। वर्षा की विषमता 20 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक होती है। इसके साथ ही भारत में कुछ अपर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्र भी हैं जहाँ वार्षिक वर्षा की मात्रा 50 सेमी से कम होती है। कच्छ, पश्चिमी राजस्थान, लद्दाख आदि क्षेत्र इसके अन्तर्गत शामिल किये जाते हैं।

 

यह भारत के मृदा और जलवायु परिदृश्य पर  एक संक्षिप्त और समग्र दृष्टि भर है। पर्यावरण में पड़ने वाले किसी भी प्रभाव को बदलती हुई जलवायु से ही समझा जा सकता है अत: उसपर कड़ी दृष्टि रखते हुए बदलाव के कारकों की पहचान और निराकरण आवश्यक हो जाता है।

 

                                                                                                                गौरव कुमार,  उप महाप्रबंधक (पर्यावरण) 

राजीव रंजन प्रसाद, उप महाप्रबंधक (पर्यावरण) 

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   0 comment

Stubble Burning

Image source : Google/Internet

 

What is stubble?

Stubble is the crop residue that remains in the fields after the crop is harvested. India produces more than 500 million tons of crop residue every year. While a significant quantity is used as fodder, the residue from wheat-rice crop system in northern India is disposed of by burning.

 

What is stubble burning?

The farmers burn the crop residue as a speedy and economical way of clearing the fields for sowing the next crop, though it has its negative effects on the soil health as well as environment as a whole as it releases harmful gases such as carbon dioxide, carbon monoxide, nitrogen oxides, particulate matter etc. into the air. However, it is believed traditionally that the fire helps to eradicate weeds and pests from the fields that can attack the upcoming crop.

 

Reasons for Stubble Burning :

 

In India, stubble burning has become more prevalent after the mechanization of harvesting process through combine harvesters. Traditionally, the harvesting was done by hand and whole plant was cut from near the ground. Subsequently, after thrashing out the grains, the straw was piled up and stored for use as animal bedding material or for thatching etc.

 

The combine harvesters cut the wheat and rice crop from the upper half of the plants leaving behind the stalks and spreading the straw in fields. As a result, the bulk of organic matter remains in the fields which should ideally be very useful if it decomposes and mixes with the soil. However, the process of decomposition is long and the farmers have to sow the next crop in within a period of few days/weeks. If the decomposing straw and stubble is left in the field, the tillage becomes difficult and also increases the risk of termite attack on the next crop.

 

Stubble burning is practiced on a greater scale after the harvest of paddy in comparison to the wheat, as the wheat straw is used for animal fodder, whereas rice straw is nutrient deficient and is not easily digested by the animals, so it is of little use in the rural community. Also, after the harvest of paddy, there is a limited time period for sowing the next wheat crop usually not more than a couple of weeks and any delay in leads to drop in yield.

 

The farming community in India has always been of limited resources and cannot afford to risk the next crop so, the most economical and faster method of disposal of stubble for a farmer is to burn it and clear the field for the next crop.

 

The burning of stubble has been banned by the legislation, however, the farmers continue to defy the ban due to lack of awareness and non-availability of alternatives that are affordable. At present, a farmer has to spend at least Rs.5000-6000 per acre to manually remove the stubble from the fields.

 

 

Alternatives to stubble burning:

 

(A) Happy Seeder for direct sowing of wheat –

 

There are many efficient ways of utilizing this stubble. It can be in-situ management using a machine such as “Paddy straw chopper-cum-spreader” to shred and plough back in the fields where it decomposes and retains the soil fertility. However, there is a divergent viewpoint regarding in-situ straw management as some experts are of the opinion that it may lead to higher methane emissions that is more harmful than carbon dioxide. They argue for converting the stubble into compressed biogas (CBG) and the residue can be used as farm yard manure.

 

Recently IARI, New Delhi has developed a bio-decomposer which has the capability to turn the stubble into manure in a matter of 15-20 days by accelerating the decomposition process.

Crop diversification such as encouraging mushroom cultivation and replacing the long duration crop varieties with early maturing varieties could helpful in the controlling this practice.

 

The innovation in farm machinery is also required to tackle this problem. An example of this is the machine called “Happy Seeder” developed by Punjab Agriculture University, Ludhiana that is capable of sowing wheat seed without the need to burn the straw and stubble. The researchers have found that the use of happy seeder reduced greenhouse emissions upto 78% besides improvement in crop yield. However, this not affordable for all farmers even after being subsidized and also requires a tractor of more than 45 hp taking it out of reach of small and marginal farmers.

 

 

(B) Biomass Power Plant –

 

Another solution would be to make the stubble a source of income by developing and establish an industrial infrastructure that uses stubble as a raw material. This includes biomass power plants and brick klins that can use stubble as a fuel, small scale industries that makes paper, packaging material or disposable utensils/cutlery using the straw, promoting mushroom cultivation etc.

 

(C) Paddy straw trays –

 

“Alternatives to stubble burning are not popular because they impose additional operational expenses, often from the farmer’s pocket. On the other hand, stubble-burning only requires a matchbox. Further, most of the custom hiring centers are also unwilling to purchase expensive machinery upfront – as they can be operated only for 15 days in a year, after which they have no use.”

 

As such, the ways have to be found to either make the straw a source of income for the farmer or provide incentives to enable him to adopt the alternatives to stubble burning.

 

References:

  • agriculturejournal.org
  • researchmatters.in
  • researchermatters.in
  • thetribuneindia.com
  • science.thewire.in
  • bio4pack.com

 

 

Jaspreet Singh

 Senior Manager (Environment)

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   1 comment

India on Climate Change in G20 Summit 2020

Image Source : https://www.climate-transparency.org/g20-summit-need-for-urgent-climate-action

 

The Group of Twenty, or G20, is the premier forum for international cooperation on the most important aspects of the international economic and financial agenda. It brings together the world’s major advanced and emerging economies. The G20 comprises of Argentina, Australia, Brazil, Canada, China, EU, France, Germany, India, Indonesia, Italy, Japan, Mexico, Russia, Saudi Arabia, South Africa, South Korea, Turkey, UK and USA. The G20 Countries together represent around 90% of global GDP, 80% of global trade, and two thirds of the world’s population. The objectives of the G20 are: Policy coordination between its members in order to achieve global economic stability, sustainable growth; to promote financial regulations that reduce risks and prevent future financial crises; and to create a new international financial architecture.

 

India and G20

 

India’s participation in the G20 process stems from the realization that as a major developing economy it has stake in the stability of the international economic and financial system. India has been actively involved in the G20 preparatory process both at the Sherpas Track and the Financial Track since its inception. India’s agenda at the G20 Summits is driven by the need to bring in greater inclusivity in the financial system, to avoiding protectionist tendencies and above all ensuring that growth prospects of developing countries do not suffer. It has also worked to maintain the dynamism and credibility of G20 deliberations for establishing a framework for strong, sustainable and balanced growth, strengthening international financial regulatory systems, reforming Bretton Woods’s institutions, facilitating trade finance, pushing forward the Doha agenda.

 

2020 G20 Riyadh summit

 

It was the fifteenth meeting of  G20 which was scheduled to take place in Riyadh, Saudi Arabia, on 21–22 November 2020. However, due to the COVID-19 pandemic, it was held virtually. The theme of this G20 summit was “Realizing Opportunities of the 21st Century for All”. The focus was on three aims viz. Empowering People by creating the conditions in which all people – especially women and youth – can live, work and thrive; Safeguarding the Planet: by fostering collective efforts to protect our global commons and Shaping New Frontiers: by adopting long-term and bold strategies to share benefits of innovation and technological advancement.

 

Sh. Narendra Modi, Prime Minister of India on 21/11/2020, virtually attended the 15th G20 Summit chaired by Saudi Arabia. He stressed on the need to focus on saving citizens, economy from pandemic while keeping efforts to fight climate change. He was of the view that “Climate change must be fought not in silos but in an integrated, comprehensive and holistic way”. India has adopted low carbon & climate-resilient development practices. He also highlighted that India is “exceeding” its Paris Agreement targets and is taking a number of “concrete actions” such as making LED lights popular which is saving 38 million tons of Carbon Dioxide emissions per year and smoke-free kitchens being provided to 80 million households. India has also taken several measures such as elimination of single-use plastics, expansion of forest cover, restoring 26 million hectares of degraded land by 2030, achieving 175 giga watt of renewable energy aimed at reducing carbon footprint and preventing climate change.

 

He also pointed out that International Solar Alliance is “among the fastest growing International Organizations, with 88 signatories” and has plans to mobilise billions of dollars to train thousands of stake-holders, and promote research and development in renewable energy and that “the ISA will contribute to reducing carbon foot-print”. He also called for cooperation and collaboration for further increasing research and innovation in new and sustainable technologies and stressed that “The entire world can progress faster if there is a greater support of technology and finance to the developing world. For humanity to prosper, every single individual must prosper”.

 

The G20 Summit 2020 under the Saudi Presidency concluded on Sunday, Nov’ 22nd with a goal to create free, fair, predictable, and stable trade and investment environment and committed to ensuring that global transportation routes and supply chains remain open, safe, and secure to ensure economic recovery following the adverse impact of Covid-19. The leaders emphasized urgent need to bring the spread of the virus under control, which is key to supporting global economic recovery. The G20 further announced that top 20 economies have mobilized resources to address the immediate financing needs in global health to support the research, development, manufacturing, and distribution of safe and effective COVID-19 diagnostics, therapeutics and vaccine.

 

 

References :

 

https://www.arabnews.com/node/1767781

https://www.globaltimes.cn/content/1207732.shtml

https://www.cnbc.com

https://www.mynewsdesk.com

 

Anuradha Bajpayee

Senior  Manager (Environment)

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   0 comment

MANAGING PLASTIC WASTE IN INDIA- A BRIEF

Image source : https://earth911.com, www.business-standard.com,  www.downtoearth.org.in, www.indiaspend.com

 

Growing mountains of non-biodegradable garbage mainly plastic has become a menace. It is choking our drains, our rivers and our streets. Stagnant water on road leads to unhygienic conditions as plastic waste clog drains and therefore inhibit proper drainage. Plastic has become the most ubiquitous and necessary material that humankind has created for itself. The biggest increase in the use of plastic has come in the packaging industry. The pandemic of 2020 has only made matters worse: the use of plastic — particularly single-use and disposable — has increased manifold as a protection against the infection.

 

Moreover, tiny fragments have been found in tap water and air we breathe. Plastic breaks up or crushes under sunlight which then eventually enters and contaminate our environment and bodies.

There are options for disposing plastic waste such as recycle (but the secondary product produced is not of much economic value) and incineration (but expensive emission control equipments are required to clean polluted air generated). Roughly, 6 per cent of the world’s oil consumption goes into making this wonder substance.

 

The Annual Report on implementation of the Plastic Waste Rules, 2016, which is compiled by the Central Pollution Control Board (CPCB), is the only regular estimation of the quantity of plastic waste that is generated in India. In 2018-19, this report put the plastic waste generated as 3,360,043 metric tons per annum i.e. 3.3 million metric tons per year (roughly 9,200 metric tons per day). Given that the total municipal solid waste generation is 55-65 million metric tons, this would mean that plastic waste is roughly 5-6 per cent of the total solid waste generated in the country. Goa produces 60gm/capita/day and whereas Delhi produces 37gm/capita/day of plastic waste. The national average stands at 8gm/capita/day. An IIT Kharagpur study in July 2018 found more than one-fifth of the silt that clogs Delhi’s drains during the monsoon months to be made up of empty gutkha and pan masala packets. What is generally understood is that polystyrene (PP and PS) and low- density polystyrene (LDPE) are only partially recyclable; most of the times, they are not recycled due to their economic unviability. The 2015 CPCB study had noted that 94 per cent of the total plastic waste was thermoplastics, which — it said — would be recyclable; only 6 per cent was thermoset plastic which could not be recycled.

 

The concept of bio-mining

 

A path-breaking bio-mining concept has helped Kumbakonam Municipality, Tamil Nadu reclaim a vast area that was used as a garbage dump on the outskirts of the temple town. The pioneering dump site bio mining concept is a simple, low-tech, quick and environmental friendly measure to remedy old open waste dumps to achieve near zero emission of landfill gases and leach. Loosened layers of old waste are sprayed with composting bio cultures and then formed into conventional aerobic windrows on the site. The waste is then sterilised, stabilised, and readied for segregation using machinery as organic and inorganic substances which will be later sent for recycling, re-using or composting. The important steps involved can be depicted as below:

 

Handpicking large objects involve aggregates such as coconut shells, plastics, wood, rubber, glass, inert, and soil enriching bio earth. While coconut shells and wood are sold as fuel, rubber and glass are sent for recycling industries. Plastic is supplied to recycling plants and cement plants.

 

 

Multilayer plastic

 

Multilayer plastic is any material used or to be used for packaging and having at least one layer as the main ingredient in combination with one or more layers of materials such as paper, paperboard, polymeric materials, metalised layers or aluminium foil either in the form of a laminate or co-extruded structure. According to Plastic waste management rules, 2016 carry bags made of virgin or recycled plastic shall not be less than 50 microns in thickness. Carry bags are problematic because they are difficult to recycle, and it is almost impossible to regulate their thickness. Recently, the Coimbatore City Municipal Corporation began a drive under the Smart City Initiative to introduce bio-bags that could serve as an alternative. The bags are known to be soluble in water and decompose within three-four months.

 

The statement that India would phase out single-use plastics by 2022 was a reiteration of the commitment that the Indian government had made in 2018. On World Environment Day (June 5), 2018, the then environment minister Sh. Harsh Vardhan had announced that single-use plastics would be phased out in the country by 2020; the deadline was later revised to 2022. The Airports Authority of India has declared 55 out 134 airports as single-use plastics free.

 

Extended producer responsibility

 

Out of the total plastic waste produced from 1950-2015, only 9% has been recycled. The rest has ended up in landfills or in the environment — oceans and water bodies. Low household segregation and weak collection and transportation systems that support source segregation inhibit the recycling of plastics. This is why the world is looking at the system of Extended Producer Responsibility (EPR) — where the producer of plastic would be responsible to take the product back and recycle it. But this is easier said than done.

The Plastic Waste Management Rules, 2016 define EPR as the responsibility of a producer for environmentally sound management till the end of life of the product. The ‘producer’ is defined in such a way that it covers all manufacturers, importers and users (brand owners). Section 9(2) of the Rules says the primary responsibility for collection of used multi-layered plastic sachets or pouches or packaging is of producers, importers and brand owners who introduce the products in the market. They need to establish a system for collecting back the plastic waste generated by their products. Section 13 of the Plastic Waste Management Rules, 2016 also require producers and brand owners to register themselves with the state pollution control board or the CPCB (if operating in more than two states). However, the March 27, 2018 amendment to the Rules, which substituted “non-recyclable multi-layered plastic” with “multi-layered plastic which is non-recyclable or non-energy recoverable or with no alternate use” has further weakened the Rules. This gave producers a loophole to claim that packaging material, if not recycled, can be put to some other use.

 

In the business of waste management, there has been the emergence of Producer Responsibility Organisations (PROs) — a third party that facilitates the responsibility of producers to take back waste from the open market, recycle or process, and file compliance. So, brand owners and other producers of plastic now hire an agent — PRO — to do the work; they pay for both the cost of collection and the cost of ensuring compliance. However, the PRO does not find a mention in the Plastic Waste Management Rules, 2016, nor in the amendment of 2018. So, CPCB withdrew the PRO scheme and the Board advised producers and other stakeholders to plan their EPR implementation as per the requirements of the Plastic Rules of 2016, as amended in 2018, and engage agencies at their discretion.

 

Non-compliance with EPR– On April 24, 2019, the CPCB asked 52 companies and nine industries to submit their EPR plans according to the Plastic Waste Management (PWM) Rules, 2016. The defaulters were made liable for action under the Environment Protection Act (EPA), 1986/National Green Tribunal (NGT) Act, 2010. This was the first time that the CPCB held companies accountable for not complying with the PWM Rules, 2016. The undertaking submitted by these companies takes responsibility to collect back and dispose of 20 per cent of the used multi-layered plastic (MLP) and other plastics produced/used by their brands. This was proposed to be eventually escalated to 100 per cent in three years.

 

On June 25, 2019, the CPCB issued directions for producers/importers/ brand owners (called PIBO) providing an outline for framing the action plan under EPR for plastic waste management. It included three ways-

 

  • Through own distribution channel: The Plastic Producers, Importers and Brand Owners (PIBO) must have a contract with a recycler or can send the waste for disposal to cement plants etc. A documentary proof is to be submitted to the CPCB.

 

  • Through Urban Local Bodies: The ULB would make the contract with the recycler or with a cement plant etc.

 

  • Through an agency, which, in turn, would either contract with a ULB or a recycler or a cement plant for plastic waste management.

 

It is to be noted that in all such cases, waste collected should be equivalent to the estimated quantity of plastic waste generated. The PIBO is required to file quarterly reports on the progress made in waste collection and processing. Manufacturers and PIBOs will share the details about the type of plastic used in packaging and the quantity consumed.

Recycling

 

As per the 2016 Rules, all persons recycling or processing waste or proposing to recycle or process plastic waste are required to apply to the State Pollution Control Board (SPCB) for grant of registration.

 

Agenda

 

  • Inventorise plastic waste– not just in terms of how much we produce, but what happens to the waste after it is used and thrown.

 

  • Ban/restrict multi-layered plastic and sachets that cannot be recycled– we need to take a tough view on this, as the current system provides for industry to continue to manufacture and use plastic that is unfeasible to recycle.

 

  • Minimise, reduce and then work to recycle– Many states in India have come up with bans on what they have categorised as single-use plastic.

 

  • Include the business of plastic waste recycling in policy and provide it incentives.

 

  • Start implementing the EPR system as provided in Plastic Waste Management Rules, 2016

 

  • Ensure enforcement of segregation at source by local governments– It is clear that re-processing, recycling or any kind of material recovery from making a new product or for energy recovery — is only possible if plastic waste is not contaminated and is segregated. This can best (and possibly only) be done at the household/institutional level.

 

References

  1. Managing plastic waste in India- challenges and agenda- A report published by Centre for Science and Environment. https://www.cseindia.org/content/downloadreports/10352
  2. https://www.thehindu.com/news/national/tamil-nadu/kumbakonam-municipality-adopts-bio-mining-reclaims-garbage-dump/article8477773.ece.

 

– Shreya, Deputy Manager (Environment)

 

 

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   1 comment

पर्यावरण शब्दकोष (8)

Image source : https://www.motherearthnews.com/nature-and-environment/preserving-biodiversity-zmaz81mjzraw

क्र. शब्द                                                         अर्थ
1 चेरनोबिल रेडियोधर्मी आपदा (Chernobyl Radioactive Disaster ) 1986 में  यूक्रेन के चेरनोबिल परमाणु ऊर्जा संयंत्र की दुर्घटना एक दोषपूर्ण रिएक्टर डिजाइन का परिणाम थी जो अपर्याप्त प्रशिक्षित कर्मियों के साथ संचालित की गई थी। दुर्घटना के  परिणामस्वरूप विस्फोटक  भाप और आग के साथ रेडियोधर्मी रिएक्टर के 190 मीट्रिक टन यूरेनियम का 30 प्रतिशत पर्यावरण में फ़ैल गया , और सोवियत संघ ने अंततः रिएक्टर के चारों ओर 19 मील-चौड़ा “अपवर्जन क्षेत्र” स्थापित करते हुए 3,35,000 लोगों को विस्थापित किया था । दुर्घटना की रात विस्फोट के कारण चेरनोबिल संयंत्र के  दो श्रमिकों की मृत्यु हो गई और तीव्र विकिरण सिंड्रोम के परिणामस्वरूप कुछ ही हफ्तों में 28 और लोगों की मौत हो गई थी जबकि 100 से अधिक घायल हुए थे । वैज्ञानिकों का अनुमान है कि दुर्घटनाग्रस्त संयंत्र के चारों ओर का क्षेत्र 20,000 वर्षों तक रहने योग्य नहीं होगा।
2 चरमोत्कर्ष समुदाय

(Climax community)

चरमोत्कर्ष समुदाय (Climax community) शब्द का उपयोग किसी पारिस्थितिक समुदाय के  उत्तरवर्तन  (succession)  के अंतिम चरण को व्यक्त करने के लिए किया जाता है। इसमें प्रजातियों की आबादी स्थिर हो जाती है और एक-दूसरे व आपसी पर्यावरण के साथ संतुलन में रहती है। इस प्रक्रिया में अक्सर हजारों और संभवतः लाखों साल लगते हैं।चरमोत्कर्ष समुदाय में परिवर्तन हो सकता है यदि जलवायु में परिवर्तन हो या एक या अधिक प्रजातियों में दीर्घकालिक विकासवादी परिवर्तन हो जाए।
3 क्षोभमंडल

(Troposphere)

क्षोभमंडल पृथ्वी के वायुमंडल की सबसे निचली परत है। वायुमंडल का अधिकांश द्रव्यमान (लगभग 75-80%) क्षोभमंडल में है। क्षोभमंडल का विस्तार क्षोभ-सीमा तक होता है, जो पृथ्वी की सतह से लगभग 10–18 किमी (6–11 मील) ऊपर है।अधिकांश प्रकार के बादल क्षोभमंडल में पाए जाते हैं, और लगभग सभी मौसम परिवर्तन  वायुमंडल की इस परत के भीतर होते हैं। ऊंचाई के साथ घटता तापमान इस मंडल की विशेषता है।
4  

क्षोभ-सीमा

(Tropopause)

क्षोभ-सीमा, क्षोभमंडल  तथा समताप मंडल (stratosphere) के मध्य का सीमा-स्तर है , जहां ताप के ह्रास-दर में यकायक परिवर्तन हो जाता है। इसकी ऊँचाई ऋतुओं एवं मौसमों के अनुसार बदलती रहती है। परंतु विषुवत रेखा पर यह लगभग 18 किलोमीटर तथा ध्रुवों पर 6 किलोमीटर है।
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क्षारीयता/खारापन  

(Alkalinity)

पानी में विघटित क्षारीय पदार्थों की माप (7.0 पीएच से अधिक) क्षारीयता कहलाती है । इससे  पानी द्वारा अम्ल को बेअसर करने की क्षमता का भी पता चलता है।  क्षारीयता के तीन प्राथमिक प्रकार हैं: बाइकार्बोनेट, कार्बोनेट और हाइड्रॉक्साइड। अन्य प्रकार के क्षारीयता भी हैं जो कुल क्षारीयता में योगदान करते हैं, जैसे कि स्यान्यूरेट (cyanurate)  क्षारीयता।
6 जल/पानी

(Water)

जल / पानी एक पारदर्शी, गंधहीन, स्वादहीन तरल, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का एक यौगिक होता है जो 32 ° F या 0 ° C पर जमने वाला और 212 ° F या 100 ° C पर उबल जाता है।  पानी समुद्रों, झीलों, नदियों और वर्षा का निर्माण करता है और यह समस्त जीवों के तरल पदार्थों का आधार है।
7 जलजनित रोग

(Waterborn disease)

जलजनित रोग वे हैं जो दूषित पानी के अंतर्ग्रहण द्वारा संचारित होते हैं। महत्वपूर्ण जलजनित रोगों में डायरिया, हैजा, टाइफाइड, हेपेटाइटिस ए व ई और पोलियोमाइलाइटिस शामिल हैं।
8 जैविक (biotic) एक पारिस्थितिकी तंत्र में जैविक घटक सभी जीवित चीजें होती हैं। इसके अंतर्गत जीव-जंतु, पेड़- पौधे और सूक्ष्मजीव शामिल हैं। जैविक घटकों में जीवित जीव के साथ-साथ मृत जीवों के अपशिष्ट भी शामिल होते हैं।
9 जलोढ़ मिट्टी

(Alluvial soil)

नदियों, बाढ़ आदि द्वारा छोड़ी गई मिट्टी जो रेत और भूमि से मिलकर बनी होती है, जलोढ़ मिट्टी कहलाती है । यह मिट्टी उन स्थानों पर भी पाई जाती है जहाँ कभी नदी बहती थी।
10 जैव-विविधता

(Biodiversity)

जैव-विविधता, विभिन्न स्रोतों से जीवों के बीच की भिन्नता है साथ ही साथ यह हमारे ग्रह की सबसे जटिल और महत्वपूर्ण विशेषता भी है। यह पृथ्वी पर जीवन की समृद्धि और विविधता का वर्णन करती है। इस के बिना पृथ्वी पर जीवन कायम नहीं रह सकता। इसके अंतर्गत स्थलीय, समुद्री और रेगिस्तानी पारिस्थितिक तंत्र के अलावा पृथ्वी पर उपस्थित समस्त पारिस्थितिक तंत्र शामिल है जो साथ मिलकर जैव-विविधता का निर्माण करते हैं।

 

पूजा सुन्डी

उप प्रबंधक (पर्यावरण)

 

Source : Internet/Google

  • https://www.nationalgeographic.com/culture/topics/reference/chernobyl-disaster/
  • dictionary.com
  • https://socratic.org/questions/what-is-a-climax-community
  • https://www.britannica.com/science/troposphere
  • https://hindi.indiawaterportal.org
  • https://blog.orendatech.com/what-is-alkalinity
  • https://www.usgs.gov/
  • https://www.britannica.com/science/water
  • https://www.medicinenet.com/waterborne_bacterial_disease/definition.htm
  • https://study.com/academy/lesson/what-is-biotic-definition-factors-examples.html
  • https://www.collinsdictionary.com/dictionary/english/alluvial
  • https://byjus.com/biology/biodiversity/

 

 

पर्यावरण शब्दकोश (7)

 

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 |    February 23, 2021 |   0 comment

एनएचपीसी में रिमोट सेंसिंग तथा जीआईएस प्रयोगशाला का उद्घाटन

 

एनएचपीसी, निगम मुख्यालय में दिनांक 14/01/2021 को ‘रिमोट सेंसिंग तथा जीआईएस प्रयोगशाला’ का उद्घाटन श्री ए.के. सिंह, सीएमडी, एनएचपीसी द्वारा सभी निदेशकगणों और वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में किया गया।

 

इस अवसर पर श्री ए.के. सिंह ने कहा कि एनएचपीसी आधुनिक तकनीकों के प्रयोग के लिये हमेशा प्रतिबद्ध रहा है और यह प्रयोगशाला हमारे निगम की पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता को भी प्रदर्शित करती है तथा निगम में अंतरिक्ष चित्रों के माध्यम से  पर्यावरण की बेहतर मॉनिटरिंग  और अध्ययन संभव हो सकेगा।

 

अपने स्वागत उद्बोधन में कार्यपालक निदेशक श्री एन एस परमेश्वरण ने यह जानकारी प्रदान की कि विभाग द्वारा प्रयोगशाला का आरम्भ करने के साथ ही रिसर्च एवं डेवलपमेंट के तहत दो परियोजनाओं को अध्ययन के लिये लिया है- पहली: “रंगित परियोजना का निर्माण पश्चात आंकलन और अंतरिक्ष चित्र आधारित पर्यावरण अध्ययन।“ दूसरी: “परियोजना के तहत सेवा-II परियोजना का सामाजिक-आर्थिक अध्ययन” किया जा रहा है।

 

इसी कड़ी में श्री गौरव कुमार, उप महाप्रबंधक (पर्यावरण) ने “रिमोट सेंसिंग एवं जीआईएस प्रयोगशाला की स्थापना एवं उपयोगिता पर एक प्रस्तुति प्रदान की जिसमें समग्रता से प्रयोगशाला के उद्देश्य, संचालित परियोजनायें व अब तक किये गये कार्यों की क्रमवार जानकारी प्रदान की गयी।  कार्यक्रम का समापन में श्री वी आर श्रीवास्तव, महाप्रबंधक (योजना-पर्यावरण) के द्वारा दिये गये धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन श्री राजीव रंजन प्रसाद, वरिष्ठ प्रबंधक (पर्यावरण) द्वारा किया गया।

 

इस रिमोट सेंसिंग प्रयोगशाला की स्थापना एनएचपीसी के पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग द्वारा की गयी है।  इसे आरम्भ किये जाने का उद्देश्य अपनी सभी परियोजनाओं के पर्यावरण पर सतत निगरानी रखना है साथ ही इस माध्यम से रिसर्च और डेवलपमेंट कार्यों को आगे बढाना है। रिमोट सेंसिंग एक ऐसी उन्नत तकनीक है जिसके माध्यम से बिना किसी भौतिक सम्पर्क के पृथ्वी के धरातलीय रूपों और संसाधनों का अध्ययन, वैज्ञानिक विधि से किया जाता हैं। कोविड की परिस्थितियों को देखते हुए यह कार्यक्रम विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सम्पन्न हुआ।

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 |    February 23, 2021 |   0 comment

इस अंक की तस्वीर

एनएचपीसी  के निगम मुख्यालय में दिनांक 14/01/2021 को पर्यावरण एवं विविधता प्रबंधन विभाग द्वारा स्थापित

रिमोट सेंसिंग तथा जीआईएस प्रयोगशालाका उद्घाटन करते हुए श्री .के. सिंह, सीएमडी, एनएचपीसी

Category:  Environment


 |    February 23, 2021 |   0 comment

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